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नवरात्रि 2018: आज है पांचवां नवरात्र मां स्कंदमाता का दिन, इस विधि से करें पूजा

Navratri 2018 Maa Skandmata Puja: स्कंदमाता की चार भुजाएं हैं। इनके दाहिने हाथ की ऊपर वाली भुजा में भगवान स्कंद हैं। बाईं तरफ की ऊपर वाली भुजा वरमुद्रा में तथा नीचे वाली भुजा जो ऊपर की ओर उठी है, उसमें कमल-पुष्प लिए हुए हैं।

स्कंदमाता को सृष्टि की पहली प्रसूता स्त्री माना जाता है।

आज (22 मार्च) नवरात्रि का पांचवां दिन है। इस दिन मां स्कंदमाता की पूजा अर्चना की जाती है। स्कंदमाता को सृष्टि की पहली प्रसूता(बच्चा देने वाली) स्त्री माना जाता है। इन्हें मोक्ष के द्वार खोलने वाली माता के रूप में जाना जाता है। इनके चार हाथ हैं, गोद में बालरूप भगवान स्कंद विराजमान होते हैं। इन्हें पद्मासना भी कहा जाता है। इनके हाथ में कमल का फूल होता है। नवरात्र के पांचवें दिन स्कंदमाता और भगवान कार्तिकेय की पूजा विनम्रता के साथ करनी चाहिए। पूजा में कुमकुम, अक्षत और चंदन शामिल करें। तुलसी माता के सामने दीपक जलाएं। पीले रंग के कपड़े पहनें। स्कंदमाता की चार भुजाएं हैं। इनके दाहिने हाथ की ऊपर वाली भुजा में भगवान स्कंद हैं। बाईं तरफ की ऊपर वाली भुजा वरमुद्रा में तथा नीचे वाली भुजा जो ऊपर की ओर उठी है, उसमें कमल-पुष्प लिए हुए हैं। कमल के आसन पर विराजमान होने के कारण इन्हें पद्मासना देवी भी कहा जाता है। सिंह इनका वाहन है।

शेर पर सवार होकर माता दुर्गा अपने पांचवें स्वरुप स्कन्दमाता के रुप में भक्तजनों के कल्याण के लिए सदैव तत्पर रहती हैं। स्कंदमाता को केला बहुत प्रिय है। इन्हे प्रसन्न करने के लिए खीर में केसर डालकर भोग लगाना चाहिए। माना जाता है स्कंदमाता की उपासना से भक्त की सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं। साथ ही जिनके संतान नहीं है उन्हें संतान की प्राप्ति होती है।

महत्व- नवरात्रि-पूजन के पांचवें दिन का शास्त्रों में पुष्कल महत्व बताया गया है। इस चक्र में अवस्थित मन वाले साधक की समस्त बाह्य क्रियाओं एवं चित्तवृत्तियों का लोप हो जाता है। वह विशुद्ध चैतन्य स्वरूप की ओर अग्रसर हो रहा होता है। साधक का मन समस्त लौकिक, सांसारिक, मायिक बंधनों से विमुक्त होकर पद्मासना मां स्कंदमाता के स्वरूप में पूर्णतः तल्लीन होता है। इस समय साधक को पूर्ण सावधानी के साथ उपासना की ओर अग्रसर होना चाहिए। उसे अपनी समस्त ध्यान-वृत्तियों को एकाग्र रखते हुए साधना के पथ पर आगे बढ़ना चाहिए। मां स्कंदमाता की उपासना से भक्त की समस्त इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं। इस मृत्युलोक में ही उसे परम शांति और सुख का अनुभव होने लगता है। उसके लिए मोक्ष का द्वार स्वमेव सुलभ हो जाता है। स्कंदमाता की उपासना से बालरूप स्कंद भगवान की उपासना भी स्वमेव हो जाती है। यह विशेषता केवल इन्हीं को प्राप्त है, अतः साधक को स्कंदमाता की उपासना की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण इनका उपासक अलौकिक तेज एवं कांति से संपन्न हो जाता है। एक अलौकिक प्रभामंडल अदृश्य भाव से सदैव उसके चतुर्दिक्‌ परिव्याप्त रहता है। यह प्रभामंडल प्रतिक्षण उसके योगक्षेम का निर्वहन करता रहता है। हमें एकाग्रभाव से मन को पवित्र रखकर माँ की शरण में आने का प्रयत्न करना चाहिए। इस घोर भवसागर के दुःखों से मुक्ति पाकर मोक्ष का मार्ग सुलभ बनाने का इससे उत्तम उपाय दूसरा नहीं है।

मंंत्र – 

या देवी सर्वभू‍तेषु मां स्कंदमाता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

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