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Narasimha Jayanti 2019 Vrat Katha: नरसिंह जयंती आज, जानिए व्रत कथा और विधि

Narasimha Jayanti 2019 Vrat Katha: नरसिंह चतुर्दशी भगवान और भक्त के बीच पवित्र रिश्ते का दर्शाता है। शास्त्रों के अनुसार नरसिंह चतुर्दशी व्रत प्रदोष व्यापिनी चतुर्दशी को ही करना चाहिए।

Author नई दिल्ली | May 17, 2019 10:57 AM
Narasimha Jayanti 2019 Vrat Katha: नरसिंह जयंती आज, जानिए व्रत कथा और विधि।

Narasimha Jayanti 2019 Vrat Katha: नरसिंह जयंती भगवान विष्णु के चौथे अवतार नृसिंह रूप में मनाई जाती है। नरसिंह जयंती को नृसिंह चतुर्दशी के रूप में भी जाना जाता है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाने वाली नरसिंह जयंती साल 2019 में 17 अप्रैल,शुक्रवार को यानि आज मनाई जा रही है। नरसिंह चतुर्दशी भगवान और भक्त के बीच पवित्र रिश्ते का दर्शाता है।  शास्त्रों के अनुसार नरसिंह चतुर्दशी व्रत प्रदोष व्यापिनी चतुर्दशी को ही करना चाहिए। यदि दोनों दिन ऐसी चतुर्दशी न मिले तो कम से कम त्रयोदशी को छोड़ कर दूसरे ही दिन उपवास करना चाहिए। इन सब के बीच आगे जानते हैं नरसिंह जयंती व्रत-कथा और विधि।

नरसिंह जयंती व्रत-विधि

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार अनुसार प्रथमपूज्य गणेश जी, हनुमानजी, देवी लक्ष्मी की तरह नृसिंह भगवान की भी तुला राशि थी। नरसिंह चतुर्थी की पूजा से निःसंतान को उत्तम संतान की प्राप्ति होती है। इस दिन चतुर्दशी का व्रत करने वाले मनुष्य को सुबह तांबे के पात्र में जल लेना चाहिए। इसके बाद इस मंत्र को पढ़ना चाहिए। ‘नृसिंह देवदेवेश तव जन्मदिने शुभे। उपवासं करिष्यामि सर्वभोगविवर्जित:॥’ इसके बाद दोपहर में तिल, गोमय, मिट्टी और आंवले से अलग-अलग चार बार स्नान करना चाहिए। फिर भक्त जो रोज की पूजा करते हैं उसे भी इसके बाद पूरी करनी चाहिए।

इसके बाद शाम के समय एक वेदी पर अष्टदल बनाकर सिंह, नृसिंह और माता ल्क्ष्मी की सोने की मूर्ति आदि स्थापित कर षोडषोपचार, पंचोपचार आदि से पूजा करना चाहिए। शास्त्रीय मान्यता के अनुसार नरसिंह चतुर्दशी के व्रत में पूर्ण रूप से ब्रहमचर्य का पालन करना चाहिए। इसके अलावा रात में गायन-वादन, पुराण-पाठ, हरि-कीर्तन से जागरण करना चाहिए। सुबह फिर पूजन करें और यथासंभव दान आदि कर प्रसाद-भोजन ग्रहण करें। इससे नृसिंह भगवान हर जगह आपकी रक्षा करेंगे व बलवान संतान प्रदान करेंगे।

नरसिंह जयंती व्रत-कथा

नरसिंह जयंती के बाते में शास्त्रों में जो कथा आती है उसके अनुसार बात बहुत समय पहले की है। महर्षि कश्यप और अदिति के हरिण्यक्ष और हरिण्यकश्यप (हरिण्यकशिपु) दो पुत्र हुए। दोनों बहुत ही शक्तिशाली से और असुरों के राजा थे। हरिण्यक्ष का बहुत आतंक बढ़ा तो भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर उसका वध कर दिया। अब अपने भाई के वध से क्रोधित हरिण्यकशिपु ने भगवान विष्णु से प्रतिशोध लेने की ठानी। हजारों साल तक कड़ा तप कर ब्रह्मा को प्रसन्न किया और उनसे अजेय होने का वरदान पाया और यह वरदान भी मांगा कि उसे कोई नर या पशु उसका वध न कर सके।

ब्रह्मा से वरदान पाकर हरिण्यकशिपु निर्भय हो गया। अब उसने समस्त लोकों पर आक्रमण बोल दिया। स्वर्गलोक से देवताओं को निर्वासित कर दिया और अपना आधिपत्य जमा लिया। कोई उसे पराजित नहीं कर सकता था। हरिण्यकशिपु भगवान विष्णु से प्रतिशोध तो लेना ही चाहते थे उसने प्रजा को उनकी पूजा न करने का फरमान सुना दिया और कहा कि वह स्वयं भगवान है उसके अलावा कोई किसी को नहीं पूजेगा।

एक बार हरिण्यकशिपु एक वट वृक्ष के नीचे तपस्या कर रहे थे तो देवगुरु बृहस्पति तोते का रूप धारण कर उस वृक्ष पर नारायण नारायण की रट लगाने लगे। इस ध्वनि से खिन्न होकर हरिण्यकशिपु अपनी तपस्या बीच में छोड़कर चले आये। जब पत्नी ने तप छोड़कर आने का कारण पूछा तो पूरा वृतांत कह सुनाया। हरिण्यकशिपु की पत्नी ने भी नारायण का जाप किया जिससे उसे गर्भ ठहर गया। अब जिस बालक ने जन्म लिया वह थे भक्त प्रह्लाद। अपने ही घर में विष्णु भक्त पैदा होने पर हरिण्यकशिपु बहुत दुखी थे। छल से बल से हर प्रपंच रचकर प्रह्लाद तो भगवत् भक्ति से विमुख करने के प्रयास किये लेकिन कोई सफलता नहीं मिली। यहां तक उसे अपनी बहन होलिका के जरिये जीवित तक जलाना चाहा लेकिन प्रभु की कृपा से प्रह्लाद सकुशल थे और होलिका जल चुकी थी। अब तो हरिण्यकशिपु के क्रोध का ठिकाना नहीं था।

वैशाख शुक्ल चतुर्दशी का ही दिन था जब पिता पुत्र में पुन: भगवान विष्णु को लेकर बहस हुई। हरिण्यकशिपु ने कहा कहां है तुम्हारा भगवान विष्णु बुलाओ उसे। तो प्रह्लाद शांत होकर बोले प्रभु तो सर्वत्र विद्यमान हैं, कण-कण में समाये हैं। इस पर प्रह्लाद का उपहास उड़ाते हुए कहा तो क्या इस स्तंभ में भी तुम्हारे भगवान मौजूद हैं। प्रह्लाद ने कहा हां कण-कण में मौजूद हैं तो इसमें भी निश्चित रूप से वे समाए हैं। हरिण्यकशिपु को क्रोध आ गया और उसने उस स्तंभ पर अपनी तलवार से वार किया। वार करते ही स्तंभ को चीरकर उसमें से नर और सिंह के संयुक्त रूप का एक प्राणी निकला जिसने अपने नाखून से हरिण्यकशिपु को चीर डाला। कहते हैं इसके बाद जब विष्णु के नरसिंह अवतार का क्रोध कम नहीं हुआ तो उन्हें शांत करने के लिये भगवान शिव को भी शरभावतार धारण करना पड़ा था।

 

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