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नारद ने नहीं होने दी भगवान शिव की शादी, बीच रास्ते से वापस लौटी थी बारात

भगवान शिव कैलाश से आधी रात बारात लेकर निकल गए ताकि सुबह सुभ मुहूर्त पर दक्षिण छोर पर पहुंच जाएं। लेकिन इस शादी को रोकने के लिए सभी देवताओं ने एक योजना बनाई।

इस कन्या को भगवान शिव से प्रेम हो गया और उन्होंने शिव जी को पाने के लिए कठोर तपस्या की।

शास्त्रों में कन्याकुमारी से जुड़ी कथा के बारे में बताया गया है। जिसमें बताया गया है कि दक्षिणी छोर का नाम कन्याकुमारी कैसा पड़ा। इसके पीछे एक देव कथा है।  शिवपुराण के अनुसार बानासुरन नाम का एक असुर था। जिसने सभी देवताओं को अपने आतंक से परेशान किया हुआ था। सभी देवता इसे परेशानी से मुक्ति पाने चाहते थे लेकिन कोई उसका वध नहीं कर पा रहे थे। इस असुर का भगवान शिव से वरदान मिला हुआ था कि उनकी मृत्यु केवल एक कुंवारी कन्या के द्वारा ही होगी। इस राक्षस का वध करने के लिए आदि शक्ति के रूप में राजा के घर एक पुत्री का जन्म हुआ। उस राजा के आठ पुत्र और एक पुत्री थी, जिसका नाम ‘कन्या’ रखा गया।

इस कन्या को भगवान शिव से प्रेम हो गया और उन्होंने शिव जी को पाने के लिए कठोर तपस्या की। कन्या की तपस्या से प्रसन्न होकर शिव जी ने शादी का वचन दिया। शादी की सभी तैयारियां हो गई। भगवान शिव बारात लेकर निकले। लेकिन इस बीच इस बात की भनक नारद जी हो गई की यह कन्या कोई साधारण महिला नहीं बल्कि असुर बानासुरन के वध के लिए जन्मी है। उन्होंने इस बात को सभी देवताओं में फैला दी और शादी रोकने का योजना तैयार करने लगे।

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भगवान शिव कैलाश से आधी रात बारात लेकर निकल गए ताकि सुबह सुभ मुहूर्त पर दक्षिण छोर पर पहुंच जाएं। लेकिन इस शादी को रोकने के लिए सभी देवताओं ने एक योजना बनाई। बारात कन्या के घर पहुंचे इससे पहले ही देवताओं ने रात के अंधेरे में एक मुर्गे की आवाज लगा दी। जिससे भगवान शिव को लगा की वो सही मुहूर्त पर कन्या के घर नहीं पहुंच पाए और उन्होंने बारात कैलाश की और लौटा दी। कन्या की सुंदरता की खबर बानासुरन को हुई और उसने कन्या को विवाह करने का प्रस्ताव भेजा। इससे कन्या क्रोधित हो गई और बानासुरन से युद्ध करने के लिए कहा कि यदि वह हार जाती है तो विवाह कर लेंगे। इसके बाद दोनों के बीच युद्ध हुआ और बानासुरन मारा गया। लेकिन कन्या कुंवारी रह गई। माना जाता है जिसके बाद से ही दक्षिणी छोर का नाम कन्याकुमारी पड़ा।

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