Dharm Gatha, Mythological Story Of Garuda: हिंदू धर्मग्रंथों में विभिन्न देवी-देवताओं के स्वरूप, चरित्र से लेकर उनके वाहन के बारे में बताया गया है। जिस तरह से भगवान शिव के वाहन नंदी, मां शेरावाली के शेर है, तो उसी तरह भगवान विष्णु का वाहन गरुड़ का माना जाता है। पक्षीराज गरुड़ अपने साहस और पराक्रम के लिए जाने जाते हैं। आपके गरुड़ के बारे में कई तरह की कथाएं महाभारत के आदिपर्व, श्रीमद्भागवत महापुराण और गरुड़ पुराण में मिल जाएगी। इनमे से ही एक काफी रोचक कथा मानी जाती है, जिसमें स्वयं श्री विष्णु ने उन्हें वाहन के रूप में पाने के लिए वर मांगा था। आइए ‘धर्म गाथा’ श्रृंखला में जानते हैं कि कैसे पक्षीराज गरुड़ ने अपनी मां को दासता से मुक्त कराने के साथ भगवान विष्णु को प्रसन्न कर पाएं थे वर और बनें उनके वाहन…
महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत आने वाले आस्तिक उपपर्व में गरुड़ देव के शौर्य, पराक्रम को लेकर एक काफी रोचक कथा का वर्णन मिलता है। जिसमें गरुड़ देव अपनी माता विनता को नागों की दासता से मुक्त कराने के लिए देवताओं से युद्ध करते अमृत कलश जीतते हैं और भगवान विष्णु से वर मांगते हैं।
माता विनता की दासता का कारण
आदिपर्व में दी गई एक कथा में गरुड़ देव माता से उनके दासता के बारे में पूछते हैं। तब मां माता विनता उन्हें बताती हैं कि नागों की मां कद्रू उनके साथ छल करके उसे हार गई थी। जिसके कारण उन्हें कद्रू की दासी बनना पड़ा था।
दासता से मुक्त कराने के लिए गरुड़ ने सांपों से मांगा उपाय
जब गरुड़ देव को मां की दासता के बारे में पता चला, तो उन्होंने सर्पों से उनके मुक्त करने का प्रस्ताव रखा। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि बताएं कि तुम कौन सी विद्या या ऐसी चीज चाहते हैं, जो मैं तुम्हें लाकर दे सकूं। तब सर्पों ने शर्त रखी कि यदि वे स्वर्ग से अमृत लाकर दे दें, तो उनकी माता को दासता से मुक्ति मिल जाएगी।
भगवान गरुड़ ने किया देवताओं से युद्ध
सर्पों की बात सुनकर गरुड़ देव ने उन्हें अमृत लाने की बात कहकर वह अमृत कलश पाने के लिए निकल पड़े। देवताओं विभिन्न अस्त्र-शस्त्रों से गरुड़ से युद्ध करने वाले हैं। उन अत्यन्त बलवान गरुड़ को देखकर सम्पूर्ण देवता कांप उठे। पक्षीराज के साथ कुछ समय ही युद्ध करने के बाद सभी उनके पंख, चोंच नखों से घायल हो गए और मृत्यु के तुल्य हो गए। गरुड़ से पीड़ित और दूर फेंके गये देवता इधर-उधर भागने लगे। इसके बाद उन्होंने नौ यक्षों के साथ युद्ध किया। सभी हो युद्ध में हराने के बाद वह अमृत कलश रखें स्थान में गए।
देवताओं के चक्रव्यूह और भयंकर सांपों का अंत
पक्षीराज गरुड़ उस स्थान पर पहुंचे जहां पर देवताओं ने अमृत को सुरक्षित रखा था। उन्होंने देखा कि अमृत की रक्षा के लिए एक अत्यंत तीक्ष्ण और निरंतर घूमने वाला लोहे का चक्र लगा रखा था और उसके चारों ओर छुरे लगे हुए हैं। वह घोर चक्र अग्नि और सूर्य के समान जाज्वल्यमान था। देवताओं ने अमृत को सुरक्षित करने के लिए ऐसा किया था। पक्षी गरुड़ उसके भीतर घुसने के बारे में सोच रहे थे और वह अपने पूरे शरीर को संकुचित करके उस चक्र के अरों के बीच से होकर भीतर घुस गये। वहां चक्र के नीचे अमृत की रक्षा के लिए भी देवताओं नेदो श्रेष्ठ सर्प नियुक्त किए गये थे। वह काफी शक्तिशाली होने के साथ चमकती हुई आंखें थी। जिसे वह देख लेते थे, वह तुरंत भस्म हो सकता था। तब पंख वाले गरुड़ जी ने सहसा धूल झोंक कर उनकी आंखें बंद कर दी और उनसे अदृश्य रहकर ही वे सब ओर से उन्हें मारने और कुचलने लगे। विनताकुमार ने वेगपूर्वक आक्रमण करके दोनों सांपों के टुकड़े कर दिए और चक्र को तोड़कर अमृत कलश लेकर आकाश में उड़ चले।
गरुड़ देव के नि:स्वार्थ भाव से प्रसन्न हुए श्रीहरि
पक्षीराज गरुड़ ने अमृत कलश हाथ में होने के बावजूद उन्होंने इसका सेवन नहीं किया, बल्कि अपनी मां को बचाने के लिए उसे सर्पो को सौंपने के लिए तेज वेग के साथ उड़ने लगे। गरुड़ देव के इस महान चरित्र और लोभ-रहित पराक्रम को देखकर भगवान नारायण अत्यंत प्रसन्न हुए और वह गरुड़ के सामने प्रकट होकर कहा कि मैं तुमसे प्रसन्न हूं और मैं तुम्हें वर देना चाहता हूं।
गरुड़ देव ने मांगे दो दिव्य वरदान
भगवान विष्णु की बात सुनकर गरुड़ देव ने अत्यंत विनयपूर्वक उनसे दो वरदान मांगे।
श्लोक
तमुवाचान्तरिक्षस्थो ध्वजे तेऽहं स्थित इति।
अमृतं च विना देव स्यां ममाजरमरणमिति॥
अर्थ- हे देव! मैं आपके ध्वज (ध्वजा) पर स्थित रहूं और अमृत का पान किए बिना ही मैं अजर (बुढ़ापे से रहित) तथा अमर हो जाऊं।
भगवान विष्णु ने बिना किसी संकोच के उन्हें वर देते हुए कहा ‘एवमस्तु’ (अर्थात ऐसा ही हो)। इस प्रकार गरुड़ देव बिना अमृत पिए ही अमर हो गए और उन्हें भगवान के ध्वज पर सर्वोच्च स्थान प्राप्त हुआ।
जब श्रीहरि विष्णु ने स्वयं मांग लिया वर
वर देने के बाद भगवान विष्णु से गरुड़ से कहा कि देव, मैं भी आपको वर देना चाहता हूं। भगवान भी कोई वर मांगें। तब श्रीहरि ने महाबली गरुत्मान से अपना वाहन होने का वर मांगा। भगवान विष्णु ने गरुड़ को अपना ध्वज बना लिया- उन्हें ध्वज के ऊपर स्थान दिया और मैं चाहता हूं कि तुम मेरे वाहन बनो…
इसके बाद पक्षी गरुड़ ने भगवान नारायण को ‘एवमस्तु’ कहा और वहां से वेगपूर्वक चले गये।
श्लोक
तमुवाच हरी र्दृष्ट एवमस्त्विति खेचरम्।
गरुडोऽपि वरं प्राह देवं वरेति तं हरिः॥
वव्रे वाहनभावं च गरुत्मन्तमूर्ध्वगम्।
कृत्वा ध्वजे च तं प्राह ममोपरि चरिष्यसि॥
अस्वीकरण (Disclaimer): यह लेख लोक मान्यताओं और शिव महापुराण में वर्णित पारंपरिक पौराणिक कथाओं पर आधारित है। जनसत्ता डॉट कॉम (Jansatta.com) इसके ऐतिहासिक या वैज्ञानिक प्रमाण का दावा नहीं करता है। इसका उद्देश्य केवल पाठकों को सांस्कृतिक और धार्मिक प्रसंगों से अवगत कराना है।
