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माता पार्वती करती हैं भगवान शिव के कंठ में निवास, जानें क्यों कहा जाता शिव को नीलकंठ

पौराणिक कथाओं के अनुसार माना जाता है कि क्षीरसागर के मंथन के समय कल्पवृक्ष, कामधेनु गाय जैसी महत्वपूर्ण वस्तुएं प्रकट हुई थी।

भगवान शिव और माता पार्वती।

भगवान शिव का ध्यान करने से ही एक ऐसी छवि उभरती है जिसमें वैराग है। इस छवि के हाथ में त्रिशूल, वहीं दूसरे हाथ में डमरु, गले में सांप और सिर पर त्रिपुंड चंदन लगा हुआ है। किसी भी शिव मंदिर या मूर्ति में भगवान शिव के पास ये चार चीजें हमेशा मिलती हैं। कई सवाल इसके साथ जुड़े हैं कि भगवान शिव के साथ ही ये सब चीजें प्रकट हुई थी। इन सवालों का ये भी उत्तर हो सकता है कि समय के साथ और अलग-अलग घटनाओं के साथ भगवान शिव के साथ ये सब जुड़ता गया हो। भगवान शिव की जटाओं में अर्ध चंद्रमा, सिर से निकलती गंगा आदि ऐसी कितनी बातें हैं जो भगवान शिव को रहस्यमयी बनाती हैं। इसी के साथ भगवान शिव का कंठ नीला पाया जाता है और उन्हें नीलकंठ नाम से भी जाना जाता है। भगवान शिव के नीले कंठ वाले बनने के पीछे एक कथा प्रचलित है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार माना जाता है कि क्षीरसागर के मंथन के समय कई महत्वपूर्ण वस्तुएं प्रकट हुई थी जैसे कल्पवृक्ष, कामधेनु गाय आदि प्रकट हुए और उन्हें देवों और राक्षसों के बीच बांटा गया। क्षीरसागर से अमृत प्राप्त होने पर देवताओं ने चलाकी से उसे ले लिया था। मंथन के दौरान सागर में से भयंकर विष निकला, ये इतना शक्तिशाली था कि उसकी एक बूंद से पूरा संसार नष्ट हो सकता था। इससे सभी देवता और राक्षस डर गए और उनमें प्राण बचाने के लिए खलबली मच गई थी। इसका हल पाने के लिए सभी ने भगवान शिव से प्रार्थना करी।

संसार की समस्या से निपटने के लिए भगवान शिव ने विष का पान कर लिया। इस विष को गले से नीचे ना जाने देने के लिए माता पार्वती भगवान शिव के गले में विराजमान हो गई। जिसके कारण भगवान शिव का गला नीला हो गया और उसके बाद से उन्हें नीलकंठ के नाम से जाना जाने लगा। संपूर्ण मानव जाति की रक्षा के लिए भगवान शिव ने विष को ग्रहण कर लिया था।

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