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कथा: जानिए कैसे संतोषी माता ने लौटाए अपनी प्रिय भक्त के प्राण, हुई जय-जयकार

माता संतोषी खुद अपनी भक्त के लिए तपस्या करने लग जाती हैं, जिसके कारण पूरे देव लोक में तूफान आ जाता है।

Author Published on: November 10, 2017 2:39 PM
जानिए क्या है संतोषी माता की कथा।

संतोषी माता की भक्त संतोषी माता को बहुत मानती थी। इसलिए माता की वो बहुत प्रिय थी। लेकिन स्वर्ग में माता संतोषी से एक देवी पोलमी माता से बहुत चिढ़ती थी। उनकी चिढ़न तब और बढ़ जाती थी जब वो धरती पर संतोषी को माता की पूजा करते देखती थी। इसी कारण से माता संतोषी से बदला लेने के लिए देवी पोलमी धरती पर संतोषी की जीवन में हमेशा कोई ना कोई समस्या खड़ी करती रहती थी। एक बार माता संतोषी को परेशान करने और उन्हें हराने के मकसद से उन देवी ने संतोषी के प्राण लेने का सोचा, लेकिन ब्रह्मा जी द्वारा बनाए गए जीवन पोथी में संतोषी की उम्र पूरी लिखी थी। जिससे यमराज उनके प्राण नहीं ले सकते थे। इसके लिए उन देवी ने षडयंत्र रचा और दीमक राज को डरा-धमका कर उनसे जीवन पोथी से संतोषी के जीवन का कागज नष्ट करने के लिए कहा।

दीमक राज अपने जीवन की रक्षा करने के लिए उनकी बात मानने पर राजी हो गए। जब यमराज ने संतोषी के जीवन में को समाप्त पाया तो वो उसके प्राण लेने चले गए। ये बात जैसे ही संतोषी माता को पता चली कि संतोषी के प्राण ले लिए गए हैं तो वो बहुत क्रोधित हुई। तभी वहां नारद मुनि आ जाते हैं और माता संतोषी उनसे कहती हैं कि जरुर इसके पीछे किसी का षडयंत्र है क्योंकि संतोषी की किसी भी तरह की आकाल मृत्यु नहीं लिखी गई है। नारद मुनि कहते हैं कि फिर तो हमें जरुर ब्रह्म देव के पास जाना चाहिए और इस बात का पता लगाना चाहिए। लेकिन माता संतोषी खुद अपनी भक्त के लिए तपस्या करने लग जाती हैं, जिसके कारण पूरे देव लोक में तूफान आ जाता है।

सभी देवी-देवता वहां जमा हो जाते हैं और माता संतोषी से प्रार्थना करते हैं कि वो तपस्या खत्म कर दें। ब्रह्म देव वहां आते हैं और उन्हें सारी बात पता चलती है। ब्रह्म देव माता संतोषी की बात सुनने पर यमराज को बुलाते हैं और कहते हैं कि संतोषी का जीवन अभी बचा था तो उन्होनें उसके प्राण क्यों ले लिए। यमराज कहते हैं कि उन्होनें जीवन पोथी के अनुसार ही सारा काम किया है। ब्रह्म देव जीवन पोथी देखकर कहते हैं कि इसमें से संतोषी के जीवन पृष्ठ को किसी ने नष्ट किया है। दीमकराज से पूछने पर बताया जाता है कि देवी पोलमी ने उन्हें ये कार्य करने के लिए मजबूर किया था। इसके बाद संतोषी के प्राणों को वापस दिया गया और संतोषी मुख्य अग्नि से पहले मृत्यु शय्या से खड़ी हो जाती है और सभी में माता संतोषी की जय-जयकार होने लगती है।

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