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तुलसी विवाह 2017 शुभ मुहूर्त और पूजा विधि: विवाह से पहले किस कथा का पाठ करना होगा शुभ और किस मुहूर्त में करें पूजा

Tulsi Vivah 2017 Katha, Devutthana EkadashI Puja Vidhi, Muhurat: गमले को वस्त्र से सजाएं और लाल चूड़ी पहनाएं और इसके बाद बिंदी आदि लगाकर श्रृंगार करें, ये विधि करेगी तुलसी माता के विवाह में मदद।

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देवउठानी एकादशी के दिन जो लोग तुलसी विवाह कर रहे हैं वो इस दिन अवश्य ही व्रत करें। तुलसी विवाह के दौरान तुलसी के साथ विष्णु जी की मूर्ति भी उनके साथ अवश्य स्थापित करनी चाहिए। इसके बाद तुलसी के पौधे और विष्णु जी की मूर्ति को पीले वस्त्रों से सजाना चाहिए। इसके बाद तुलसी के गमले को गेरु से सजाएं। गमले के आस-पास शादी का मंडप बनाएं। इसके पश्चात गमले को वस्त्र से सजाएं और लाल चूड़ी पहनाएं और इसके बाद बिंदी आदि लगाकर श्रृंगार करें। इसके साथ टीका करने के लिए नारियल और दक्षिणा के रुप में तुलसी के आगे रखें। इसके बाद भगवान शालीग्राम की मूर्ति का सिंहासन हाथ में लेकर तुलसी के चारों ओर सात बार परिक्रमा करवाएं। इसके बाद आरती करें। विवाह इसके साथ ही संपन्न हो जाएगा। विवाह करवाते समय ऊं तुलस्यै नमः का जाप करते रहना चाहिए। एकादशी की तिथि सोमवार यानि 30 अक्टूबर शाम 7 बजकर 03 मिनट से लग जाएगी। जो लोग व्रत करने वाले हैं वो इस समय के बाद अन्न ग्रहण नहीं कर सकते हैं। एकादशी की तिथि का समय 31 अक्टूबर 6 बजकर 55 मिनट तक रहेगा।

विवाह कथा-
एक समय की बात है जिसमें एक गांव में ननद-भाभी एक साथ रहते थे। ननद का विवाह नहीं हो पा रहा था, लेकिन वो तुलसी माता की बहुत सेवा करती थी। लेकिन उसकी भाभी को ये सब पसंद नहीं था, वो हमेशा अपनी ननद को ताने देती थी कि जब तुम्हारा विवाह होगा तो बरातियों को तुलसी खाने में दूंगी और दहेज में भी तुलसी ही दूंगी। कुछ समय बाद ननद का रिश्ता पक्का हो गया और जब विवाह का समय आया तो जैसा भाभी कहा करती थी वैसा ही उन्होनें किया और तुलसी का गमला उनके आगे फोड़कर खाने के लिए कहा।

ननद तुलसी माता की भक्त थी और उसके प्रार्थना करने पर फूटा हुआ गमला स्वादिष्ट भोजन में परिवर्तित हो गया और भाभी ने अपनी ननद को तुलसी की माला ही गले में पहना दी, लेकिन माता की कृपा से वो भी हीरे और सोने के जवाहरात में बदल गई। वस्त्रों की जगह रखा जनेऊ सुंदर और रेशमी वस्त्रों में बदल गया। इससे ननद की उसके ससुराल में प्रशंसा होती है ये देखकर भाभी अपनी बेटी को भी तुलसी माता की पूजा करने के लिए कहती है, लेकिन उसकी बेटी का मन इसमें नहीं लगता है। जब उसके विवाह का समय आता है तब भाभी वैसा ही व्यवहार करती है जैसे उसने अपनी ननद के साथ किया था लेकिन उस समय कुछ भी नहीं बदलता है क्योंकि उनकी बेटी ने माता तुलसी की पूजा ठीक प्रकार से नहीं की होती है।

भाभी को अपनी ननद से परेशानी होने लगती है और वो उसे कभी घर नहीं बुलाती थी। एक बार भाई को अपनी बहन से मिलने की इच्छा हुई और वो अपनी पत्नी के पास गया तो उसने सिर्फ ज्वार के दाने देकर अपने पति को रवाना कर दिया। भाई रास्ते में सोचता है कि इस तरह का सामान अपनी बहन के ससुराल में कैसे ले जा सकता है तो वो ज्वार के दाने एक गाय के सामने डाल देता है। ये सब एक आदमी देख रहा होता है और भाई से आकर कहता है कि हीरे-जवाहरात एक गाय के सामने क्यों डाल रहे हो तो ये देखकर भाई को आश्चर्य होता है कि ज्वार के दाने कैसे बदल गए। इसके बाद वो अपनी बहन के घर खुशी से जाता है। ये बात भाभी को पता चलती है तब जाकर उसे माता तुलसी के महत्व की समझ जाती है।

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