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Makar Sankranti 2019 Date and Time: जानें इस साल दो दिन क्यों मनाई जा रही है मकर संक्रांति

Makar Sankranti 2019 Date and Time: मकर संक्रांति को कई जगहों पर खिचड़ी, मगही, बिहू, पोंगल अदि अन्य नामों से जाना जाता है। वहीं पश्चिमी भारत के गुजरात में इस दिन लोग बड़े उत्साह से पतंगबाजी करते हैं और गुड़ और तिल से बने मिष्ठान का लुत्फ़ उठाते हैं। बता दें कुम्भ का पहला शाही स्नान भी इसी दिन किया जाता हैं।

Author नई दिल्ली | January 14, 2019 8:24 AM
Makar Sankranti 2019 Date: सांकेतिक तस्वीर।

Makar Sankranti 2019 Date and Time:  देश भर में मकर संक्रांति का पर्व हर साल 14 जनवरी को मनाया जाता है। साल में कुल 12 सूर्य संक्रांति हैं, लेकिन इनमें से मेष, कर्क, तुला और मकर संक्रांति सबसे महत्वपूर्ण होती है। ज्योतिष के मुताबिक संक्रांति सूर्य और चंद्र की गति पर निर्भर करता है। इसके अनुसार मकर संक्रांति के दिन सूर्य उत्तर गोलार्ध की ओर यात्रा करता है इस प्रकार यह तारीख 100 वर्षों के पश्चात बदलती है। इसलिए यह त्यौहार प्रतिवर्ष 14 जनवरी को मनाया जाता है। हालांकि प्रतिवर्ष मकर संक्रांति की तिथि को लेकर यह उलझन बानी रहती है क्योंकि पंचांग के अनुसार सूर्य के उत्तरायण का समय में हर बार 20 मिनट बढ़ जाता है।

वहीं, प्रतिवर्ष की भांति इस बार भी पर्व 14 और 15 जनवरी दो दिन का होगा क्योंकि सूर्य 14 जनवरी को शाम को उत्तरायण करेगा जो अगले दिन तक चलेगी होगी। देशभर में इसी दिन से खरमास  समाप्त हो जाएंगे और शुभ कार्यों की शुरुआत हो जाएगी। खरमास में मांगलिक कार्यों की मनाही होती है, लेकिन मकर संक्रांति (Makar Sankranti) से शादी और पूजा-पाठ जैसे कामों का शुभ मुहूर्त शुरू हो जाता है। यूं तो साल में कुल बारह संक्रांतियां आती हैं लेकिन मकर संक्राति का अपना अगल महत्व है।

इस दिन को मकर संक्रांति इसलिए कहते हैं क्योंकि इस दिन सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है। खगोलशास्त्रियों के अनुसार मकर संक्रांति के दिन सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण करता है और पृथ्वी के बहुत निकट आ जाता है। मकर संक्रांति के बाद मौसम में भी परिवर्तन आने लगता है और दिन बड़े और रातें छोटी होने लगती हैं। मान्यता है कि शनि देव को तिल की वजह से ही उनके पिता, घर और सुख की प्राप्ति हुई, तभी से मकर संक्रांति पर सूर्य देव की पूजा के साथ तिल का बड़ा महत्व माना जाता है।

मकर संक्रान्ति के शुभ समय पर हरिद्वार, काशी आदि तीर्थों पर स्नान का विशेष महत्व माना गया है। इस दिन सूर्य देव की पूजा-उपासना भी की जाती है। शास्त्रीय सिद्धांतानुसार सूर्य पूजा करते समय श्वेतार्क तथा रक्त रंग के पुष्पों का विशेष महत्व है। इस दिन सूर्य की पूजा करने के साथ साथ सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए।

बता दें कि मकर संक्रांति को हिन्दू पंचांग के अनुसार मलमास अथवा खरमास का अंत माना जाता है। दरअसल मलमास को हिन्दू धर्म में किसी भी शुभ कार्य के लिए बुरा माना जाता है लेकिन साल के इस पहले पर्व के साथ अन्य सभी त्योहारों और शुभ कार्यों का सिलसिला शुरू हो जाता है। इस दिन लोग प्रयागराग के त्रिवेणी संगम में स्नान करते हैं। इसके अलावा लोग गंगासागर, हरिद्वार, गढ़मुक्तेश्वर अदि जगहों पर स्नान करके पापों से मुक्ति पाने की परंपरा का पालन करते हैं। मकर संक्रांति के दिन लोग भगवान को खिचड़ी, गुड़ और तिल का भोग चढ़ाते है और प्रसाद में भी गुड़ और तिल बांटते है। संक्रांति के दिन हिन्दू धर्म में गुड़ और तिल का दान किया जाता है। और तिल और खिचड़ी का मुख्य रूप से सेवन किया जाता जाता है।

मकर संक्रांति को कई जगहों पर खिचड़ी, मगही, बिहू, पोंगल अदि अन्य नामों से जाना जाता है। वहीं पश्चिमी भारत के गुजरात में इस दिन लोग बड़े उत्साह से पतंगबाजी करते हैं और गुड़ और तिल से बने मिष्ठान का लुत्फ़ उठाते हैं। बता दें कुम्भ का पहला शाही स्नान भी इसी दिन किया जाता हैं। इस दिन लाखों की संख्या में श्रद्धालु शाही स्नान करने के लिए इकठ्ठा होते हैं। ऐसा कहा जाता है कि आज ही के दिन मां गंगा ने राजा भगीरथ के 60 हजार पूर्वजों को मुक्ति दी थी इसलिए मकर संक्रांति के पर्व को पूर्वजों (पितरों) के आत्मा की शांति के लिए भी पवित्र माना जाता है। मकर संक्रांति के पर्व के साथ ही प्रयाग में लगने वाला माघ मेला भी आरंभ हो जाता है। यह मेला साल का सबसे लम्बा मेला होता है जो कि एक महीने तक चलता है।

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