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Mahashivratri 2020: जानिए, क्यों मनाई जाती है महाशिवरात्रि, इस दिन क्या करना चाहिए

Mahashivratri 2020 Date: महाशिवरात्रि के दिन शिव के भक्त कांवड़ से गंगाजल लाकर भगवान शिव का अभिषेक करते हैं।

Author नई दिल्ली | Updated: February 17, 2020 2:25 PM
कहते हैं कि महाशिवरात्रि के व्रत से जीवन में पाप और भाग का नाश होता है।

Mahashivratri 2020 Date: शिवरात्रि हर महीने चतुर्दशी तिथि को पड़ती है लेकिन फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी महाशिवरात्रि कहते हैं। महाशिवरात्रि के दिन शिव के भक्त कांवड़ से गंगाजल लाकर भगवान शिव का अभिषेक करते हैं। महाशिवरात्रि का व्रत महिलाओं के लिए खास महत्व का माना गया है। मान्यता है कि अविवाहित कन्या विधिपूर्वक इस व्रत को रखती हैं तो उनकी शादी शीघ्र ही हो जाती है। वहीं विवाहित महिलाएं अपने सुखद वैवाहिक जीवन के लिए भी इस व्रत को धारण करती हैं। महाशिवरात्रि के विषय में धार्मिक मान्यता यह भी है कि इस दिन शिव और पार्वती का विवाह हुआ था। इस साल महाशिवरात्रि 21 फरवरी, शुक्रवार के दिन मनाई जाएगी।

महाशिवरात्रि का महत्व: ईशान संहिता के मुताबिक महाशिवरात्रि के दिन ज्यितिर्लिंग के रूप में शिव प्रकट हुए थे। इसलिए इस पर्व को महाशिवरात्रि के रूप में मनाते हैं। कहते हैं कि महाशिवरात्रि के व्रत से जीवन में पाप और भाग का नाश होता है। इसलिए इस व्रत को व्रतों का राजा कहा गया है।

महाशिवरात्रि पर क्या करना चाहिए: महाशिवरात्रि भगवान शंकर का सबसे अच्छा दिन माना गया है। इसलिए इस दिन भगवान शिव की विधिवत पूजा करनी चाहिए। शिव-पूजन के लिए किसी शुद्ध पात्र (बर्तन) में जल भर कर उसमें गाय का दूध, बेलपत्र, धतूरे, अक्षत डालकर शिव लिंग पर चढ़ाएं। इसके अलावा महाशिवरात्रि पर भगवान शिव को दूध या गंगाजल से अभिषेक करना बहुत शुभ माना गया है।

महाशिवरात्रि के लिए शुभ मुहूर्त

चतुर्दशी तिथि आरंभ- शाम 5 बजकर 20 मिनट पर (21 फरवरी)

चतुर्दशी तिथि समाप्त- शाम 07 बजकर 02 मिनट पर (22 फरवरी)

शिव पूजा में ध्यान रखें ये बातें

महाशिवरात्रि पर शिव की पूजा में विशेष सावधानी रखी जाती है। शिव पूजन के समय शिवलिंग पर भस्म चढ़ाना शुभ माना गया है। शिव को बिल्व पत्र बहुत प्रिय होता है। इसलिए शिव जी को बेल का पत्ता (बिल्व पत्र) अवश्य अर्पण करना चाहिए। इसके अलावा शिव-पूजन में धतूरा का इस्तेमाल भी करना चाहिए।

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।
उज्जयिन्यां महाकालम्ॐकारममलेश्वरम्॥1॥

परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमाशंकरम्।
सेतुबंधे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥2॥

वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यंबकं गौतमीतटे।
हिमालये तु केदारम् घुश्मेशं च शिवालये॥३॥

एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रातः पठेन्नरः।
सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति॥4॥

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