दानवीर शिरोमणि हैं महर्षि दधीचि

भारतीय परंपरा में जब भी दानवीरों की महिमा का बखान होता है तो सर्वप्रथम नाम आता है महर्षि दधीचि का।

महर्षि दधीचि।

शास्त्री कोसलेंद्रदास
भारतीय परंपरा में जब भी दानवीरों की महिमा का बखान होता है तो सर्वप्रथम नाम आता है महर्षि दधीचि का। उनके द्वारा किए अस्थिदान ने सहस्राब्दियों से भारतीय जन-मन को सम्मोहित व आप्यायित कर रखा है। आज जब समाज में अंगदान को बढ़ावा देने की बात होती है तो महर्षि दधीचि ही इस समाजोपयोगी कार्य के लिए सबसे बड़े प्रेरक हैं। महाराज शिबि, सूर्यवंशी राजा हरिश्चन्द्र और महात्यागी कर्ण भी इसी परंपरा के वाहक होकर महादानी कहलाए।

वैदिक मंत्रों के दृष्टा दधीचि
महर्षि अथर्वा एवं माता चिति के पुत्र महर्षि दधीचि वेदों के अनेक मंत्रों के दृष्टा (देखने वाले) थे। कुछ पुराणों के अनुसार ये कर्दम ऋषि एवं माता देवहूति की पुत्री सुकन्या के गर्भ से उत्पन्न थे। इस नाते वे कहीं-कहीं महर्षि च्यवन के पुत्र भी माने गए हैं। इतना ही नहीं कुछ ग्रंथों ने तो इन्हें दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य का भी पुत्र कहा है। इनकी पत्नी का नाम सुवर्चा या सुवर्चला या गभस्तिनी था। अथर्ववेद की पैप्पलाद शाखा के दृष्टा महर्षि पिप्पलाद इनके पुत्र थे। निरुक्तकार आचार्य यास्क ने इन्हें उच्च आध्यात्मिक व यौगिक संपदा से अलंकृत महर्षि कहा है।

अश्विनीकुमार को सिखाई मधु विद्या
वैदिक एवं पौराणिक आख्यानों के अनुसार महर्षि दधीचि ने देवराज इंद्र से अनेक दुर्लभ विद्याएं सीखीं पर एक शर्त थी कि यदि ये विद्याएं दधीचि किसी अन्य को सिखाएंगे तो इंद्र उनका सिर काट लेंगे। देवों के वैद्य अश्विनीकुमार इन विद्याओं को दधीचि से सीखना चाहते थे। इंद्र की शर्त को देखते हुए उन्होंने दधीचि का सिर काट सुरक्षित रख लिया और उनके धड़ पर अश्व का सिर लगाया। अश्वमुख दधीचि से अश्विनीकुमारों ने दुर्लभ मधु विद्या प्राप्त की। जब इंद्र को यह पता चला तो उसने दधीचि का मस्तक काट दिया। शल्य चिकित्सा में निपुण अश्विनीकुमारों ने उनका असली सिर पुन: स्थापित कर दिया। इस आख्यान से वे अश्वशिरा ऋषि भी कहलाते हैं।

अस्थियों के दाता दधीचि
महर्षि दधीचि के अस्थिदान का प्रसंग बहुत प्रसिद्ध है। लीलाधर पर्वतीय के संस्कृति कोश में इसके संबंध में दो प्रकार के विवरण मिलते हैं। एक के अनुसार वृत्रासुर का नाश करने के लिए दधीचि ने देव कल्याण हेतु अपनी अस्थियां प्रदान कीं। देवेश इंद्र ने इन्हीं अस्थियों का वज्र बनाकर वृत्रासुर का वध किया। अन्य विवरण के अनुसार देवासुर संग्राम के बाद देवताओं ने अपने अस्त्र-शस्त्र दधीचि के पास रखे थे। जब वे बहुत दिनों तक उन्हें लेने नहीं आए तो उन्हें राक्षसों से बचाने के लिए दधीचि ने उन सभी अस्त्र-शस्त्रों का तेज जल रूप में पी लिया। बाद में जब देवता शस्त्र मांगने आए तो ऋषि दधीचि ने सारी स्थिति बताकर उन्हें अपनी अस्थियां प्रदान कर दीं। दधीचि की अस्थियों से ही इंद्र के आयुध वज्र का निर्माण हुआ, जो अजेय है। दधीचि द्वारा देह दान कर देने के बाद देवताओं ने उनकी पत्नी के सती होने से पूर्व उनके गर्भ को पीपल को सौंप दिया था, जिस कारण उनके पुत्र पिप्पलाद कहलाए। महर्षि दधीचि के वंशज दाधीच कहलाते हैं। ।

महर्षि दधीचि और माता दधिमथी

महर्षि दधीचि से जुड़े कई पवित्र तीर्थ हैं। कुरुक्षेत्र का दधीचि तीर्थ प्रसिद्ध है। नैमिषारण्य में दधीचि मंदिर का शिवलिंग दधीचि द्वारा स्थापित माना जाता है। नागौर के गोठ मांगलोद में शताब्दियों पुराना दधिमथी माता का मंदिर दधीचि महर्षि की सनातन स्मृतियों को सजीव करता है। दधिमथी ऋषि दधीचि की बहन हैं। इतना ही नहीं, मार्कण्डेय पुराण का प्रसिद्ध श्लोक सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोस्तु ते।। दधिमथी माता के मन्दिर के अभिलेख में ही पाया जाता है, जिसकी तिथि 608 ईस्वी है। महर्षि दधीचि की स्मृति को बनाए रखने हेतु भारत सरकार ने 1988 में उन पर डाक टिकट जारी किया।

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