Mahabharat Katha: महाभारत की यह कथा केवल भीषण युद्ध तक ही नहीं सीमित है। बल्कि इसमें कई बड़े-बड़े महारथियों को मिले वरदान, श्राप की भी कहानी है। ऐसे ही एक कथा माता गंगा और राजा शांतनु की है, जो आगे चलकर भीष्म पितामह के माता-पिता बने थे। लेकिन क्या आप इस बात को जानते हैं कि भीष्म पितामह के कुल 7 भाई भी थे, जिनके जन्म होते ही नदी में बहा दिया जाता था। आखिर ऐसा क्या हुआ कि माता गंगा को अपने पुत्रों को जन्म देने के साथ ही उन्हें नदी में बहा देना पड़ता था। आइए आज ‘धर्म गाथा’ श्रृंखला में जानते हैं माता गंगा और राजा शांतनु के उन 7 पुत्रों के बारे में जिन्हें महर्षि वशिष्ठ के श्राप के कारण मनुष्य योनि में जन्म लेना पड़ा था। लेकिन मां गंगा के कारण पुनः: वह देवलोक चले गए। महाभारत ग्रंथ के आदिपर्व (सम्भव पर्व) का वही प्रसंग है, जहां 7 वसुओं के श्राप और भीष्म के जन्म की कथा आती है…
माता गंगा का राजा शांतनु को विवाह के लिए हावी भरना
महाभारत के आदिपर्व में वर्णन मिलता है इसके अनुसार राजा शांतनु बड़े बुद्धिमान, धर्मपरायण, सत्यवादी और पराक्रमी सम्राट थे। एक दिन शांतनु हिंसक पशुओं और जंगली भैंसों को मारते हुए सिद्ध एवं चारणों से सेवित गंगा जी के तट पर अकेले ही विचरण करते थे। जहां पर उनकी मुलाकात गंगा माता से हुई।
राजा शांतनु का मधुर मुस्कान युक्त मनोहर वचन सुनकर यशस्विनी गंगा उनकी ऐश्वर्य-वृद्धि के लिए उनके पास आई। तट पर विचरते हुए उन नृपश्रेष्ठ को देखकर सती साध्वी गंगा को वसुओं को दिए हुए वचन का स्मरण हो आया। साथ ही राजा प्रतीप की बात भी याद आ गयी। तब यही उपयुक्त समय है, ऐसा मानकर वसुओं को मिले हुए श्राप से प्रेरित हो वे स्वयं संतानोत्पादन की इच्छा से पृथ्वीपति महाराज शांतनु के समीप चली आयीं और अपनी मधुर वाणी से महाराज के मन को आनंद प्रदान करती हुई बोलीं कि मैं आपकी महारानी बनूंगी एवं आपके अधीन रहूंगी।
माता गंगा ने शांतनु के सामने रखी ये शर्त
माता गंगा विवाह करने के लिए तैयार हो गई लेकिन उन्होंने एक शर्त रखी। इस बात पर गंगा बोली कि राजन, मैं भला या बुरा जो कुछ भी करूं, उसके लिए आपको मुझे नहीं रोकना चाहिए और मुझसे कभी अप्रिय वचन भी नहीं कहना चाहिए। ऐसा बर्ताव करने पर ही मैं आपके समीप रहूंगी। यदि आपने कभी मुझे किसी कार्य से रोका या अप्रिय वचन कहा तो मैं निश्चित ही आपका साथ छोड़ दूंगी। गंगा की बात सुनकर शांतनु ने उस समय बहुत अच्छा कहकर शर्त मान ली। इसके बाद माता गंगा और शांतनु का विवाह हुआ।
माता गंगा ने अपने पुत्रों को नदी में डुबोया
इच्छानुसार रमण करते हुए महाराज शांतनु ने उसके गर्भ से देवताओं के समान तेजस्वी आठ पुत्र उत्पन्न किए। जो-जो उत्पन्न होता, उसे वह गंगा जी के जल में फेंक देती और कहती कि वत्स, इस प्रकार श्राप से मुक्त करके मैं तुम्हें प्रसन्न कर रही हूं। ऐसा कहकर गंगा प्रत्येक बालक को धारा में डुबो देती थीं। पत्नी का यह व्यवहार राजा शांतनु को अच्छा नहीं लगता था, तो भी वे उस समय उससे कुछ नहीं कहते थे। राजा को यह डर बना हुआ था कि कहीं वह मुझे छोड़कर चली न जाए।
महर्षि के श्राप के कारण पुत्रों को नदी में बहाया
तदनन्तर जब आठवां पुत्र उत्पन्न हुआ, तब हंसती हुई अपनी स्त्री से राजा ने अपने पुत्र का प्राण बचाने की इच्छा से दुखी होकर राजा शांतनु ने कहा कि अरी! इस बालक का वध न कर, तू किसकी कन्या है? कौन है? क्यों अपने ही बेटों को मारे डालती है। पुत्र घातिनि! तुझे पुत्र हत्या का यह अत्यन्त निन्दित और भारी पाप लगा है’।
तब माता गंगा ने कहा कि पुत्र की इच्छा रखने वाले नरेश! तुम पुत्रवानों में हो। मैं तुम्हारे इस पुत्र को नहीं मारुंगी। लेकिन यहां मेरे रहने का समय अब समाप्त हो गया। जैसी कि पहले ही शर्त हो चुकी है। मैं जह्नु की पुत्री और महर्षि द्वारा सेवित गंगा हूं। देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिये तुम्हारे साथ रह रही थी। ये तुम्हारे आठ पुत्र महातेजस्वी महाभाग वसु देवता हैं। वसिष्ठ जी के श्राप दोष से ये मनुष्य-योनि में आये थे। तुम्हारे सिवा दूसरा कोई राजा इस पृथ्वी पर ऐसा नहीं था, जो उन वसुओं का जनक हो सके। इसी प्रकार इस जगत् में मेरी-जैसी दूसरी कोई मानवी नहीं हैं, जो उन्हें गर्भ में धारण कर सके। अत: इन वसुओं की जननी होने के लिए मैं मानव शरीर धारण करके आई थी। राजन्! तुमने आठ वसुओं को जन्म देकर अक्षय लोक जीत लिए हैं।
वसु देवताओं की यह शर्त थी और मैंने उसे पूर्ण करने की प्रतिज्ञा का ली थी कि जो-जो वसु जन्म लेगा, उसे मैं जन्म लेते ही मनुष्य–योनि से छुटकारा दिला दूंगी। इसलिए अब वे वसु महात्मा आपव (वशिष्ठ) के श्राप से मुक्त हो चुके हैं। तुम्हारा कल्याण हो, जब मैं जाऊंगी।
8वां पुत्र नदी में क्यों नहीं बहाया गया?
माता गंगा ने आगे कहा कि मैने 7 वसु को मनुष्य योनि से मुक्त करने का वचन दिया था और ये अब आठवां पुत्र है। अब तुम इस महान व्रतधारी पुत्र का पालन करो। यह तुम्हारा पुत्र सब वसुओं के पराक्रम से संपन्न होकर अपने कुल का आनन्द बढ़ाने के लिए प्रकट हुआ है। इसमें संदेह नहीं कि यह बालक बल और पराक्रम में दूसरे सब लोगों से बढ़कर होगा। यह बालक वसुओं में से प्रत्येक के एक-एक अंश का आश्रय है। संपूर्ण वसुओं के अंश से इसकी उत्पत्ति हुई है, मैंने तुम्हारे लिए वसुओं के समीप प्रार्थना की थी कि राजा का एक पुत्र जीवित रहे। इसे मेरा बालक समझना और इसका नाम ‘गंगादत्त’ रखना।
महर्षि वशिष्ठ ने दिया था वसुओं श्राप
पूर्वकाल में वरुण ने जिन्हें पुत्र रूप में प्राप्त किया था, वे वसिष्ठ नामक मुनि ही ‘आपव’ नाम से विख्यात हैं। गिरिराज मेरु के पार्श्वभाग में उनका पवित्र आश्रम है। जहां पर महर्षि तपस्या करते थे। दक्ष प्रजापति की पुत्री ने, जो देवी सुरभि नाम से विख्यात है, कश्यप जी के सहवास से एक गौ को जन्म दिया, जो आगे चलकर कामधेनु कहलायी।
एक समय देवताओं द्वारा सेवित एक रमणीय वन में पृथु आदि वसु अपनी पत्नियों के साथ विचरण कर रहे थे। वह वन अत्यंत सुंदर, पर्वतों और वृक्षों से सुशोभित था, जहां देवता भी आनंदपूर्वक विहार करते थे। उसी समय उन वसुओं में से एक की पत्नी ने उस वन में एक अद्भुत कामधेनु गाय देखी, जिसका नाम नंदिनी था। वह गाय सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाली थी और अत्यंत पवित्र तथा दिव्य गुणों से युक्त थी। उसके सौंदर्य और गुणों को देखकर वह वसु पत्नी अत्यंत प्रसन्न और आश्चर्यचकित हो गई।
उसने अपने पति वसु से कहा कि यह दिव्य गाय उसकी सखी के लिए प्राप्त की जाए, जिससे वह सखी मनुष्य लोक में वृद्धावस्था और रोगों से मुक्त रह सके। उसने अपने पति से आग्रह किया कि वे इस गाय को लेकर उसकी इच्छा पूर्ण करें। पत्नी के इन वचनों को सुनकर उस वसु ने, अपने भाइयों पृथु आदि वसुओं की सहायता से, उस दिव्य गाय का अपहरण कर लिया।
परंतु वे इस बात का ध्यान नहीं रख सके कि यह गाय महर्षि वशिष्ठ की थी और उनके तपोबल से संरक्षित थी। वे यह भी भूल गए कि ऋषि के क्रोध का परिणाम कितना भयंकर हो सकता है। कुछ समय बाद महर्षि वशिष्ठ फल और मूल लेकर अपने आश्रम लौटे। वहां उन्होंने देखा कि उनकी कामधेनु गाय अपने बछड़े सहित वहाँ नहीं है। तब उन्होंने पूरे वन में खोज की, पर गाय का कोई पता नहीं चला।
तभी उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा और जान लिया कि वसुओं ने उस गाय का अपहरण किया है। यह जानकर वे अत्यंत क्रोधित हो गए और उन्होंने वसुओं को श्राप दिया कि जिसने मेरी कामधेनु गाय का अपहरण किया है, वे सभी वसु मनुष्य योनि में जन्म लेंगे। यह श्राप सुनकर वसु भी दुखी हुए, परंतु महर्षि वशिष्ठ अपने तपोबल और क्रोध के प्रभाव से अपने निर्णय पर स्थिर रहे और पुनः तपस्या में लीन हो गए।
वसुओं को महर्षि वशिष्ठ के श्राप का ज्ञान होने पर वे सभी उनके आश्रम पहुंचे और उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास किया, परंतु वशिष्ठ अपने श्राप पर अडिग रहे और उन्होंने कहा कि द्यु नामक वसु को छोड़कर शेष सभी वसु प्रति वर्ष एक-एक करके मनुष्य योनि से मुक्त हो जाएंगे, जबकि द्यु को अपने कर्म के कारण लंबे समय तक पृथ्वी पर रहना पड़ेगा; उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनका दिया हुआ श्राप असत्य नहीं होगा और वसु धर्मज्ञ, शास्त्रज्ञ तथा ब्रह्मचर्य-प्रिय होंगे, किंतु मानव जीवन में संतान उत्पन्न नहीं करेंगे; इसके बाद सभी वसु माता गंगा के पास जाकर उनसे प्रार्थना करने लगे कि वे जन्म लेते ही उन्हें तुरंत मुक्त कर दें, गंगा ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली और अपने वचन के अनुसार प्रत्येक पुत्र को जन्म के तुरंत बाद जल में प्रवाहित कर दिया, जिससे वे श्राप से मुक्त होकर अपने लोक को लौट गए, केवल आठवां वसु द्यु पृथ्वी पर रह गया और वही आगे चलकर राजा शांतु का पुत्र देवव्रत कहलाया, जो बाद में भीष्म नाम से प्रसिद्ध हुआ।
कौन थे वसु?
वसु आठ देवता हैं जो प्रकृति के मूल तत्वों और संपत्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन्हीं को महर्षि वशिष्ठ ने श्राप दिया था। इन्हीं में से आठवां वसु यानी दयु आगे चलकर भीष्म बने। जो है- अप – जल, ध्रुव – स्थिरता / ध्रुव तारा, सोम – चंद्रमा / अमृत तत्व, धर – पृथ्वी, अनिल – वायु, अनल – अग्नि, प्रभास – प्रकाश / ऊर्जा, द्यु -आकाश / स्वर्गीय प्रकाश
अस्वीकरण (Disclaimer): यह लेख लोक मान्यताओं और शिव महापुराण में वर्णित पारंपरिक पौराणिक कथाओं पर आधारित है। जनसत्ता डॉट कॉम (Jansatta.com) इसके ऐतिहासिक या वैज्ञानिक प्रमाण का दावा नहीं करता है। इसका उद्देश्य केवल पाठकों को सांस्कृतिक और धार्मिक प्रसंगों से अवगत कराना है।
