Arjuna 10 names meaning: महाभारत के विराट पर्व की वह कथा प्रसिद्ध है, जब धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने चार भइयों और महारानी द्रौपदी के साथ मत्स्य देश में अज्ञातवास व्यतीत किया था। महापराक्रमी भीमसेन ने द्रौपदी के अपमान करने वाले कीचक और उसके बंधुओं का वध कर दिया। इसके उपरांत त्रिगत देश के राज सुशर्मा ने मत्स्य देश पर आक्रमण कर दिया। उस समय बृहन्नना का रूप धारण किए अर्जुन को छोड़कर शेष चारों पांडव राजा विराट के साथ युद्ध करने निकल पड़े। अवसर का लाभ उठाकर हस्तिनापुर की सेना ने दूसरी ओर से मत्स्य देश पर आक्रमण उनकी गायों को अपने साथ ले जाना चाहा। कौरवों की सेना में पिहामह भीष्म, द्राणाचार्य, कृपाचार्य, राजा दुर्योधन, दुशासन, कर्ण और अश्वत्थामा जैसे अज्ञेय महायोद्धा शामिल थे। यहां हम रिलीजन क्रानिकल सीरीज में बात करने जा रहे हैं अर्जुन के 10 नामोंं के रहस्य के बारे में…
उत्तर का उत्साह
जब मत्स्य देश के राजकुमार भूमिंजय उत्तर को इस आक्रमण का समाचार मिला, तो वह उत्हास में आकर उन महावीर योद्धाओं को पराजित करने की डीगें हांकने लगे। तब सैरंध्री के रूप में महारानी द्रौपदी ने बृहन्नला को उसका सारथी बनाने का सुझाव दिया। द्रौपदी के परामर्श पर राजकुमार उत्तर ने बृहन्नला के वेष में परमवीर अर्जुन को सारथी बनाकर युद्ध के लिए प्रस्थान किया।
भय और क्षत्रिय धर्म
कौरवों की विशान सेना को देखकर राजकुमार उत्तर का उत्साह क्षीण हो गया। उनके युद्ध करने का विचार त्याग दिया और रणभूमि छोड़कर भागने लगा। तभी अर्जुन ने उसे रोका और कहा कि वह सारथी के स्थान पर बैठकर रथ चलाए। अर्जुन ने उत्तर से यह भी कहा कि उत्तर युद्ध से मुख मोड़कर भले ही भाग सकता है, किंतु वे क्षत्रिय धर्म के प्रतिपालक होने से युद्ध में कभी पीठ हीं दिखा सकते। इसके पश्चात अर्जुन उसे श्मशान में स्थिति शमी अर्थात खेजड़ी के वृक्ष के पास ले गए और उत्तर से उस वृक्ष पर पहले से ही सुरक्षित रखे पांडवों के शस्त्रों को उतारने को कहा।
अर्जुन द्वारा स्वयं का परिचय
शस्त्रों को देखकर राजकुमार उत्तर भयभीत हो गए और अर्जुन से पूछने लगा कि यदि ये पांडवों के अस्त्र हैं तो स्वयं पांडव इस समय कहां हैं। तब अर्जुन ने अज्ञातवास कर रहे पांडवों का परिचय देते हुए कहा कि महाराज विराट के यहां उपस्थित कंक नामक ब्राह्राण की धर्मराज युधिष्ठिर हैं। रसोई में बल्लव के रूप में कार्य करने वाले भीम हैं। नकुल अश्वशाला तथा सहदेव गोशाला में हैं। महारानी सुदेष्णा के महल में द्रौपदी केश- प्रसाधिका सैरंध्री के रूप में निवास कर रही हैं। उत्तर ने दोबारा प्रश्न किया- गांडीवधारी अर्जुन कहां हैं। जब अर्जुन ने उत्तर दिया कि द्रोणाचार्य का शिष्य अर्जुन मैं स्वयं हूं। इस पर उत्तर ने कहा कि यदि आप ही अर्जुन हैं, तो अपने दस नाम और उनका रहस्य बताइए। तब अर्जुन ने अपने दसों नामों क स्वयं उल्लेख किया और यह भी बताया कि वे नाम उन्हें किन- किन ने मिले हैं।
अर्जुन का ही नाम है कृष्ण
गांडीवधारी अर्जुन ने उत्तर से कहा- मैंने समस्य देशों को जीतकर उनके कर-रूप में केवल धन प्राप्त किया और इसलिए लोग मुझे धनंजय कहते हैं। जब मैं संग्राम- भूमि में रणोन्मत्त योद्धाओं का सामना करने के लिए जाता हूं, तब उन्हें परास्त दिए बिना कभी लौटता नहीं हूं। इसी से वीर पुरुष मुझे विजय नाम से जानते हैं। संग्राम में युद्ध करते समय मेरे रथ में स्वर्ण- कवचों से सुसज्जित चार श्वेत वर्ण के अश्व होते हैं, इसीलिए मेरा नाम श्वेतवाहन पड़ाष हिमालिय के शिखर- प्रदेश में उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में दिन के समय मेरा जन्म हुआ, इसलिए मुझे फाल्गुन कहा जाता है। पूर्वकाल में दानवों से युद्ध करते समय देवराज इंद्र ने मेरे मस्तक पर सूर्य के समान प्रकाशित होने वाला किरीट धारण कराया था, इसलिए मझे किरीट कहते हैं। युद्ध करते समय मैं किसी भी प्रकार का बीभत्स अर्थात घृणित कर्म नहीं करता, इसकी कारण देवताओं और मनुष्यों के बीच मेरी बीभत्सु नाम से प्रसिद्धि है। मेरा बाएं और दाहिने, दोनों हाथ गांडीव धनुष की प्रत्यंचा खींचने के समान रूप से समर्थ हैं। इसलिए देवता और मनु्ष्य मुझे सव्यसाची कहते हैं।
नाम- स्मरण से विजय
महाभारत में वर्णित अर्जुन के दस नाम केवल पहचान नहीं, बल्कि विजय के दस सूत्र हैं। अर्जुन ने हस्तिनापुर से आई सारी सेना के साथ सभी योद्धाओं को अकेले ही पराजित कर दिया। अर्जुन के इन दस नामों के नियमित पाठ से शत्रुओं पर विजय मिलती है।
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