Mahabharat Katha: महाभारत का युद्ध कौरव तथा पांडवों के बीच हुआ। कौरवों ने छल से जुए में पांडवों को हराकर उन्हें वनवास भेज दिया था। युधिष्ठिक, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव के साथ द्रौपदी भी वनवास के लिए गई। जहां पर उन्होंने कौरवों को हराने के लिए खूब तपस्या करके विभिन्न तरह से अशस्त्र-शस्त्र और वरदान पाएं। इन्हीं पांडवों में से तीसरे नंबर के अर्जुन धनुर्विघा में अव्वल थे। हर भाई को उनपर काफी विश्वास था कि उनके साथ हुए अन्याय का बदला अर्जुन अवश्य लेंगे। ऐसे में उनके बड़े भाई धर्मराज युधिष्ठिर ने कहने पर वह इंद्रदेव के दर्शन पाने और उनके शस्त्र विद्या लेने के लिए स्वर्ग गए। देव समुदाय से पूजित हो पाण्डुकुमार अर्जुन अपने पिता इंद्र के घर में रहने और उनसे उपसंहार सहित महान अस्त्रों की शिक्षा ग्रहण करने लगे।

सभा में अर्जुन के एकटक उर्वशी को देखने पर इंद्र को लगा कि वह उनसे मोहित हो गए हैं। ऐसे में उन्होंने शिक्षा ग्रहण कराने के बाद अर्जुन को खुश करने से अप्सरा उर्वशी को भेजा। लेकिन उनके न कहने पर उर्वशी ने उन्हें भयानक श्राप दे दिया और फिर एक वर्ष के लिए कुंती पुत्र अर्जुन ने बृहन्नला का स्वरूप धरा। आज ‘धर्म गाथा’ श्रृंखला में जानें उर्वशी से किस कारण अर्जुन को दिया श्राप और कैसे इंद्रदेव ने अर्जुन के इस श्राप को वरदान में बदल दिया।

महाभारत के वन पर्व में उर्वशी और अर्जुन के प्रसंग को विस्तार से बताया है। जब इंद्रदेव के कहने पर गन्धर्वराज चित्रसेन उर्वशी के पास पहुंचते हैं और अर्जुन का गुणगान करते गहैं। इसके साथ ही वह कहते हैं कि जाकर अर्जुन का सेवा सत्कार करें। इस बार चित्रसेन को विदा करके पवित्र मुस्कान वाली उर्वशी ने अर्जुन से मिलने के लिये उत्सुक हो स्नान किया।

इंद्र के आदेश पर अर्जुन से मिलने पहुंची उर्वशी

इंद्र के आदेश को मानते हुए उर्वशी अच्छी तरह से तैयार होकर अर्जुन के पास पहुंचती है। नरश्रेष्ठ जनमेजय महल के द्वार पर पहुँचकर वह ठहर गयी। उस समय द्वारपालों ने अर्जुन को उसके आगमन की सूचना दी। तब सुन्दर नेत्रों वाली उर्वशी रात्रि में अर्जुन के अत्यन्त मनोहर तथा उज्ज्वल भवन में उपस्थित हुई।

उर्वशी को अपने आते हुए देखकर अर्जुन के नेत्र लज्जा के कारण झुक जाते हैं और वह उर्वशी को गुरु के सामान सेवा सत्कार देते हुए अंदर लाते हैं। इसके बाद अर्जुन बोले कि हे देवि.. श्रेष्ठ अप्सराओं में भी आपका सबसे ऊंचा स्थान है। मैं तुम्हारे चरणों में मस्तक रखकर प्रणाम करता हूं। इसके साथ ही अर्जुन कहते हैं कि मैं आपका सेवक हूं। बताइएं मेरे लिए क्या आज्ञा है मैं उसका पालन करना सही मानूंगा।

अर्जुन की यह बात सुनकर उर्वशी के होश-हवास गुम हो गये और उन्होंने गन्धर्वराज चित्रसेन की कही हुई सारी बातें कह सुनाई। उन्होंने आगे कहा कि उन्होंने मुझसे कहां कि तुम उसे सुनकर महेन्द्र का, मेरा तथा मुझसे अपना भी प्रिय कार्य करो। जो संग्राम में इन्द्र के समान पराक्रमी और उदारता आदि गुणों से सदा सम्पन्न हैं। उन कुंतीनन्दन अर्जुन की सेवा तुम स्वीकार करो।’ इस प्रकार चित्रसेन ने मुझसे कहा था।

इसी के कारण मैं तुम्हारे पिता इंद्रदेव की आज्ञा मानकर मैं आपकी सेवा में आई हूं। आपके गुणों ने मेरे चित्त को अपनी ओर खींच लिया है। मैं कामदेव के वश में हो गयी हूं। हे वीर मेरे हृदय में भी चिरकाल से यह मनोरथ चला आ रहा था।

अर्जुन ने उर्वशी को माना गुरु के सामान

जब उर्वशी इस तरह की बातें कह रही थी, तो अर्जुन काफी लज्जा में आ गए और उन्होंने कहा कि आप ये जिस तरह की बातें कह रही है, उसे सुनना भी मेरे लिए बड़े दु:ख की बात है। निश्चय ही आप मेरी दृष्टि से देखें, तो आप भी गुरुपत्नियों के समान पूजनीय हो। मेरे लिए जिस तरह महाभागा कुंती और इन्द्राणि शची हैं। उसी प्रकार आप भी है। इसलिए आप अपने मन में इस तरह का विचार बिल्कुल भी न लाएं। वैसी ही तुम भी हो। इस विषय में कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये।’

अर्जुन ने बताया आखिर उन्होंने सभा में क्यों देखा एकटक

अर्जुन आगे कहते हैं कि आप सोच रही हो कि जब आपको गुरु माता के सामना मानता हूं, तो फिर सभा में एकदम दृष्टि से क्यों दे रहा था, तो आपको इसका उत्तर भी दे देता हीं। यह आनंदमयी उर्वशी की पूरुवंश की जननी है। ऐसा समझकर मेरे नेत्र खिल उठे और इस पूज्य भाव को लेकर ही मैंने तुम्हें वहां देखा था। इसलिए तुम मेरे विषय में कोई अन्यथा भाव मन में न लाओ। तुम मेरे वंश की वृद्धि करने वाली हो। इसलिए आप भी गुरु से भी अधिक गौरवशालिनी हो। मैं तुम्हारे चरणों में मस्तक रखकर तुम्हारी शरण में आया हूं। इसलिए तुम लौट जाओ। मेरी दृष्टि में तुम माता के समान पूजनीय हो और तुम्हें पुत्र के समान मानकर मेरी रक्षा करनी चाहिए।

उर्वशी ने अर्जुन को दिया नपुंसक होने का श्राप

जब अप्सरा उर्वशी ने अर्जुन की बात सुनी, तो वह अचानक क्रोधित हो गए और कहा कि अर्जुन.. तुम्हारे पिता इंद्र के कहने से मैं स्वयं तुम्हारे घर पर आए और कामबाण से घायल हो रही हूं। लेकिन तुन मेरा आदर नहीं कर रहे हैं। इसलिए मैं तुम्हें श्राप देती हूं कि तुम्हें स्त्रियों के बीच में सम्मानरहित होकर नर्तक बनकर रहना पड़ेगा। तुम नपुसंक कहलाओगे और तुम्हारा सारा आचार-व्यवहार हिजड़ों के ही समान होगा।’ इतना कहकर वह वहां से चली जाती है।

यस्मात्त्वामभिकामान्तां पितामहीमनिन्दिताम्।
न सम्भावयसे वीर कामबाणप्रपीडिताम्।। 48।।

तस्मात्त्वं नर्तकः पार्थ स्त्रीमध्ये परिभूयसे।
नपुंसकाकृतिश्चेष्टो विचेष्टः कुलविह्वलः।। 49।।

एवमुक्त्वा स्फुरद्वक्त्रा निःश्वसन्ती मुहुर्मुहुः।
उर्वशी शापमुत्सृज्य प्रजगाम गृहं प्रति।। 50।।

देवराज इंद्र ने ऐसे ही अर्जुन की मदद

जब उर्वशी ने अर्जुन को ये श्राप दिया, तो वह काफी परेशान हो गए और चित्रसेन के पास जाकर सबकुछ बतला दिया। इसपर वह चित्रसेन ने भी सारी घटना देवराज इन्द्र से निवेदन की। इसके बाद इंद्र ने अर्जुन को बुला सांत्वना दी और कहा कि

हे अर्जुन, तुम सत्पुरुषों के शिरोमणि हो, तुम-जैसे पुत्र को पाकर कुंती वास्तव में श्रेष्ठ पुत्र वाली है। तुमने अपने धैर्य से ऋषियों को भी पराजित कर दिया है। हालांकि उर्वशी ने तुम्हें श्राप दिया है। लेकिन परेशान न हो, ये श्राप तुम्हारे अभीष्ट अर्थ का साधक होगा।।

13 साल के अज्ञातवास के समय 1 साल नर्तकी के रूप में गुजारेंगे समय

इंद्र ने आगे कहा कि तुम पृथ्वी पर पूरे 13 ,साल का अज्ञातवास गुजारेंगे। ऐसे में उर्वशी के दिए हुए श्राप को तुम उसी वर्ष में पूर्ण कर दोगे। नर्तक वेष और नपुंसक भाव से एक वर्ष तक इच्छानुसार विचरण करके तुम फिर अपना पुरुषत्व प्राप्त कर लोगे’।

इन्द्र के ऐसा कहने पर शत्रु वीरों का संहार करने वाले अर्जुन को बड़ी प्रसन्नता हुई। फिर तो उन्हें श्राप की चिंता छूट गई। पाण्डुपुत्र धनंजय महायशस्वी गन्धर्व चित्रसेन के साथ स्वर्गलोक में सुखपूर्वक रहने लगे।

डिस्क्लेमर: यह लेख पौराणिक ग्रंथों महाभारत के हिंदी अनुवाद और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी भी व्यक्ति, समुदाय या भावना को ठेस पहुंचाना नहीं है, बल्कि शास्त्रों में वर्णित ऐतिहासिक और नैतिक प्रसंगों को पाठकों तक पहुंचाना है। इसकी सत्यता का जनसत्ता से कुछ भी लेना देना नहीं है।