Mahabharat Katha In Hindi: महाभारत के महानायक भीष्म का जीवन त्याग, प्रतिज्ञा और कठोर अनुशासन की एक अद्भुत कहानी है। एक ऐसा योद्धा जो अपने परिवार और पिता के लिए अनगिनत परेशानियों, चुनौतियों का सामना किया। इतना ही नहीं अपने पिता राजा शांतनु के सुख के लिए आजीवन ब्रह्मचर्य और राज्य के त्याग का संकल्प भीष्म ने ले लिया। इसके बदले उन्हें पिता से इच्छामृत्यु का वरदान मिला। लेकिन ये वरदान आने वाले समय में उनके लिए सबसे बड़ा अभिशाप बनकर सामने आया। उन्होंने शर-शैया में लेटकर अपने दो कुल का नाश होते हुए देखा। पिता से मिला यही वरदान कुरुक्षेत्र के युद्ध में भीष्म लिए सबसे बड़ी पीड़ा का कारण बन गया। आइए आज ‘धर्म गाथा’ की श्रृंखला में जानते हैं भीष्म की उस प्रतिज्ञा की कहानी, जिसने उन्हें ‘भीष्म’ बनाया और कैसे उनका यह वरदान अंत में एक अभिशाप में बदल गया।
भीष्म की कहानी यह दर्शाती है कि कभी-कभी जो वरदान हमें अत्यंत शक्तिशाली बनाता है, वही हमारे कर्मों और नियति के सामने सबसे बड़ा बंधन भी साबित हो सकता है। अपनी इच्छा से मृत्यु चुनने का वरदान होने के बावजूद भीष्म अपने जीवनकाल में अनेक परिस्थितियों को रोक नहीं सके और उन्हें अपने ही प्रिय हस्तिनापुर के विनाश तथा अपने ही वंश के पारिवारिक संघर्ष और संहार को अपनी आंखों से देखना पड़ा।
माता सत्यवती के पिता ने राजा शांतनु के सामने रखी ये शर्त
महाभारत ग्रंथ के आदि पर्व में दी गई कथा के अनुसार, गंगा के अंतर्धान होने के बाद शांतनु अपने तेजस्वी पुत्र देवव्रत यानी भीष्म को हस्तिनापुर लाकर युवराज बनाते हैं। देवव्रत अपने गुणों और आचरण से सभी को प्रसन्न करते हैं। कुछ समय बाद शांतनु यमुना तट पर एक सुगंधित, अत्यंत सुंदर निषाद कन्या सत्यवती को देखते हैं और उससे विवाह करना चाहते हैं।
सत्यवती के पिता निषादराज शांतनु के सामने एक शर्त रखते हैं कि उसकी संतान ही हस्तिनापुर की राजा बनेगी। शांतनु इस शर्त को स्वीकार नहीं कर पाते और दुखी रहने लगते हैं। उनके पुत्र देवव्रत जब कारण जानते हैं, तो वे स्वयं निषादराज के पास जाकर अपने पिता के लिए सत्यवती का हाथ मांगते हैं। वे यह प्रतिज्ञा करते हैं कि सत्यवती का पुत्र ही राजा बनेगा।
लेकिन निषादराज को संदेह होता है कि देवव्रत के पुत्र भविष्य में इस वचन को तोड़ सकते हैं। तब पिता की इच्छा पूर्ण करने के लिए देवव्रत एक कठोर और अद्वितीय प्रतिज्ञा लेते हैं।
पिता के लिए भीष्म ने ली आजीवन ब्रह्मचर्य रहने की प्रतिज्ञा
भीष्म ने कहा कि नरश्रेष्ठ निषादराज सहित सभा में मौजूद वे सभी ऋषियों, देवताओं और उपस्थित राजाओं को साक्षी मानकर घोषणा करते हैं कि उन्होंने पहले ही राज्य का त्याग कर दिया है और अब वे संतान का भी पूर्ण त्याग करेंगे। अपने पिता शांतनु की इच्छा पूर्ण करने के लिए वे आजीवन अखंड ब्रह्मचर्य का व्रत लेते हैं। वे स्पष्ट कहते हैं कि जीवन भर न तो विवाह करेंगे और न ही संतान उत्पन्न करेंगे, बल्कि नैष्ठिक ब्रह्मचारी बनकर रहेंगे।
देवव्रत आगे कहते हैं कि उन्होंने जीवन में कभी असत्य नहीं कहा है और यह प्रतिज्ञा भी पूर्ण सत्य के साथ कर रहे हैं। उनका उद्देश्य केवल अपने पिता का सुख और वंश की मर्यादा की रक्षा करना है।
उनकी इस कठोर और अद्भुत प्रतिज्ञा को सुनकर निषादराज अत्यंत भावविभोर हो जाते हैं और तुरंत अपनी पुत्री को राजा शांतनु के लिए देने को तैयार हो जाते हैं। इसके बाद भीष्म पिता के मनोरथ की सिद्धि के लिये उस यशस्विनी निषाद कन्या से बोले कि माता जी, इस रथ पर बैठिये। अब हम लोग अपने घर चलें।
इसके बाद भीष्म ने उस भामिनी को रथ पर बैठा लिया और हस्तिनापुर आकर उसे महाराज शांतनु को सौंप दिया।
पिता शांतनु ने भीष्म को दिया इच्छामृत्यु का वरदान
भीष्म ने अपने पिता शांतनु के लिए अत्यंत कठिन ब्रह्मचर्य और राज्य त्याग की प्रतिज्ञा ली, तो सभी उपस्थित राजा और सभासद उनके इस अद्भुत त्याग से अत्यंत प्रभावित हुए। सभी ने एक स्वर में उनकी प्रशंसा करते हुए कहा कि यह राजकुमार वास्तव में ‘भीष्म’ है, अर्थात् जिसकी प्रतिज्ञा अत्यंत कठोर और अटल है।
भीष्म के इस दुष्कर और अद्वितीय कर्म को सुनकर राजा शान्तनु अत्यंत प्रसन्न और संतुष्ट हुए। उन्होंने अपने पुत्र के त्याग और निष्ठा से अभिभूत होकर उन्हें इच्छा-मृत्यु का वरदान प्रदान किया।
भीष्म से राजा शांतनु बोले कि मेरे निष्पाप पुत्र, तुम जब तक यहां जीवित रहना चाहेंगे, तब तक मृत्यु तुम्हारे ऊपर अपना प्रभाव नहीं डाल सकती। तुमसे आज्ञा लेकर ही मृत्यु तुम पर अपना प्रभाव प्रकट कर सकती है’।
भीष्म को मिला ये वरदान बन गया अभिशाप
आरंभ में पिता से भीष्म को मिली यह शक्ति एक अद्भुत वरदान प्रतीत होने लगी थी। ऐसे में वह युद्ध भूमि में अजेय हो गए। उन्हें कोई भी योद्धा मार पाने में असफल था, क्योंकि उनके पास इच्छामृत्यु का वरदान था। लेकिन अंत समय अर्जुन ने शिखंडी को सामने रखकर भीष्म के ऊपर असंख्य तीर बरसाएं। ऐसे में वह तीरों से बनी शर-शैया में रहें। इतने अधिक घायल होने के बावजूद वरदान के कारण उनका अंत नहीं हुआ और उन्होंने महाभारत के युद्ध के दौरान भीष्म ने अपने ही वंश को दो भागों में बंटते और एक-दूसरे के विरुद्ध युद्ध करते देखा। वे चाहकर भी इस विनाश को रोक नहीं सके। मृत्यु उनके नियंत्रण में थी, लेकिन घटनाओं को बदलने की शक्ति उनके पास नहीं थी।
कुरुक्षेत्र युद्ध में जब वे शर-शैया पर गिरे, तब भी उन्होंने मृत्यु को तुरंत स्वीकार नहीं किया। वे उत्तरायण काल की प्रतीक्षा करते रहे और करीब 58 दिनों तक शर-शैया में रहने के बाद सूर्य के उत्तरायण में होने के बाद उन्होंने इच्छा मृत्यु स्वीकार की।
डिस्क्लेमर: यह लेख पौराणिक कथाओं और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल सूचना प्रदान करना है, किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना या अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं है। जंसत्ता इन कथाओं की ऐतिहासिकता या वैज्ञानिक प्रमाण की पुष्टि नहीं करता है।
