Mahabharat Katha: महाभारत केवल एक युद्ध की कहानी नहीं थी बल्कि कर्म, भाग्य और परिणामों के बारे में बताया गया है। महाभारत में कई ऐसे श्रापों का वर्णन है जिन्हें पूरे इतिहास को बदल कर रख दिया था। ये श्राप केवल व्यक्तियों को दंड ही नहीं दिया बल्कि कई योद्धाओं के भाग्य को भी बदल दिया। इन योद्धाओं ने कुरुक्षेत्र के युद्ध में अहम भूमिका निभाई थी। फिर चाहे वो कर्ण हो, भीष्म हो या फिर स्वयं श्री कृष्ण हो। श्री कृष्ण की बात करें, तो उन्हें गंधारी से यदुवंश के विनाश का श्राप किया था, जो समय के साथ सही साबित हुआ और पूरा द्वारका ही डूब गई थी। इतना ही नहीं भीष्म की मृत्यु का कारण शिखंडी बने थे। ऐसे में कई श्राप का वर्णन कर रहे हैं, जिन्हें जानकर ये कहना गलत नहीं होगा कि इन्होंने पूरे महाभारत को पलट कर रख दिया था। आइए धर्म गाथा की श्रृंखला में जानते हैं ऐसे ही कुछ श्राप के बारे में…

1-कर्ण को परशुराम का श्राप

इस श्राप के बारे में महाभारत के आदि पर्व के कर्ण-परशुराम प्रसंग में बताया गया है, जो अध्याय 121–123 में है। इस कथा के अनुसार, कर्ण बचपन से ही महान धनुर्धर बनना चाहता था, लेकिन उसे क्षत्रिय होने के कारण परशुराम से शिक्षा नहीं मिल सकती थी, क्योंकि परशुराम केवल ब्राह्मणों को ही शिक्षा देते थे। लेकिन कर्ण उनसे शिक्षा लेना चाहते थे। ऐसे में उन्होंने स्वयं की पहचान छिपाकर खुद को ब्राह्मण बताया और उनसे शस्त्र विद्या सीखने के साथ उनके प्रिय शिष्य बन गए। एक समय की बात है कि एक दिन कर्ण के साथ बात करते हुए परशुराम उनकी की गोद में सिर रखकर सो गए। उसी समय एक कीट कर्ण की जांघ में घुसकर उसे काटने लगा। कर्ण ने गुरु परशुराम की नींद न टूटे, इसलिए दर्द सहते रहें। लेकिन जब परशुराम जागे और उन्होंने खून देखा, तो समझ गए कि यह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं हो सकता। सत्य जानकर उन्होंने कर्ण को श्राप दिया कि जब उसे सबसे अधिक जरूरत होगी, वह अपने अस्त्रों का ज्ञान भूल जाएगा। यहीं महाभारत युद्ध के दौरान कर्ण की मृत्यु का कारण बना। जब कर्ण के रथ का पहिया जमीन में धंस गया, तब वे दुविधा में अस्त्रों का ज्ञान भूल गए और निहत्थे होने के कारण अर्जुन के बाण का शिकार बन गए थे।

2- कर्ण को ब्राह्मण का श्राप (गाय वध)

आदि पर्व में कर्ण कथा प्रसंग में इस कथा के बारे में बताया गया है। इसके अनुसार, एक बार कर्ण ने अभ्यास करते समय गलती से उनके हाथों से एक ब्राह्मण की गाय को मार दिया। दुखी ब्राह्मण ने उसे श्राप दे दिया था कि जैसे उसकी गाय असहाय मरी, वैसे ही समय आने वह असहाय महसूस करेंगे और मारे जाएंगे। ये श्राप कुरुक्षेत्र के समय कर्ण को लगा और उनका रथ का पहिया धरती में धंस जाएगा। फिर अपनी अस्त्र विद्या भूल जाने के कारण वह रथ को निकाल न सके और वह अर्जुन के द्वारा मारे गए।

3- पांडु को ऋषि किंडम का श्राप

महाभारत के आदि पर्व के अध्याय 90 से 92  में पांडु-श्राप प्रसंग में इस कथा को बताया गया है। इस कथा के अनुसार, एक बार राजा पांडु शिकार खेलने वन में गए थे और उन्होंने एक हिरण का शिकार किया। वो हिरण कोई आम पशु नहीं था बल्कि वास्तव में मृग के रूप में ऋषि किंडम और उनकी पत्नी थे। ऐसे में ऋषि किंडम ने मरते वक्त पांडु को श्राप देते हुए का कि पांडु कभी अपनी पत्नी के साथ संबंध बनाएंगे, तो उनकी मृत्यु हो जाएगी। इस श्राप के कारण पांडु संतान उत्पन्न नहीं कर सके। बाद में पांडवों का जन्म देवताओं के वरदान से हुआ था।

4- गांधारी का श्रीकृष्ण को श्राप

भारतीय महाकाव्य महाभारत के अठारह पर्वों (पुस्तकों) में से ग्यारहवां पर्व है जिसे स्त्री पर्व कहा गया है। इसके 25 से लेकर 27 अध्याय में इस शाम के बारे में बताया गया है। जब गांधारी ने अपने 100 पुत्रों यानी कौरवों को युद्ध में मरा हुआ देखा, तो उन्हें काफी शोक हुआ।  गांधारी का मुख्य शोक यह था कि उनके पुत्रों का संहार हो गया, जबकि उनकी सेना युद्ध में अत्यंत बलवान और रणनीतिक थी। उन्हें यह आभास हुआ कि यह केवल कर्तव्य और धर्म का उल्लंघन नहीं था, बल्कि श्री कृष्ण का साथ था। ऐसे में गंधारी से शोक और क्रोध में आकर श्री कृष्ण को श्राप दे दिया था कि जिस प्रकार उनके पुत्रों का संहार हुआ, उसी प्रकार श्रीकृष्ण और उनके वंशजों का भी विनाश होगा।  गांधारी का यह श्राप कुछ समय बाद साकार हुआ। यदुवंश के वंशजों में आंतरिक कलह और विनाश हुआ, और श्रीकृष्ण का भौतिक जीवन भी इसी विनाश के बीच समाप्त हुआ।

5- अंबा (शिखंडी) का भीष्म के विरुद्ध श्राप

आदि पर्व के अंबा कथा में भीष्म के वध को लेकर एक श्राप है। इस श्राप के अनुसार,  अंबा का जीवन भीष्म के कारण नष्ट हो गया था। उसने प्रतिज्ञा ली कि वह अगले जन्म में भीष्म की मृत्यु का कारण बनेगी। वह शिखंडी के रूप में जन्मी और कुरुक्षेत्र युद्ध में

भीष्म के पतन का कारण बनी, क्योंकि भीष्म ने स्त्री या फिर पूर्व जन्म में स्त्री के ऊपर प्रहार न करने की प्रतिज्ञा ली थी।

6- अश्वत्थामा को श्रीकृष्ण का श्राप

सौप्तिक पर्व के उपपांडव वध और  स्त्री पर्व के श्राप प्रसंग में इस श्राप के बारे में बताया गया है। अश्वत्थामा ने क्रोध में आकर पांडवों के पुत्रों का वध कर दिया। इसके बाद उसने पांडवों पर ब्रह्मास्त्र से हमला किया। जवाब में अर्जुन ने भी ब्रह्मास्त्र चलाया। तब महर्षि व्यास ने दोनों अस्त्रों के टकराने से रोकते हुए अर्जुन और अश्वत्थामा से अपने-अपने ब्रह्मास्त्र वापस लेने को कहा। अर्जुन ने अपना अस्त्र वापस ले लिया, लेकिन अश्वत्थामा के पास यह विद्या नहीं थी। इसलिए उसने ब्रह्मास्त्र की दिशा बदलकर अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ की ओर कर दी।

निर्दोष बालकों की हत्या करने के इस अपराध पर भगवान श्रीकृष्ण अत्यंत क्रोधित हुए। उन्होंने अश्वत्थामा को शाम दिया कि वह हजारों वर्षों तक पृथ्वी पर भटकता रहेगा। उसके घाव कभी नहीं भरेंगे और उसे समाज से तिरस्कार मिलेगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माना जाता है कि आज भी अश्वत्थामा इस श्राप के कारण पृथ्वी लोक में भटक रहे हैं।

7- श्रृंगी ऋषि ने दिया राजा परीक्षित को श्राप

महाभारत ग्रंथ के आदि पर्व के 49 और 50 अध्याय में इस कथा के बारे में वर्णन है। इसके अनुसार , पांडव अपना राज-काज अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को सौंपकर स्वर्ग चले गए। इसके बाद उन्होंने राज काम संभाला। राजा परीक्षित केवल धर्म के ज्ञाता ही नहीं थे, वे धर्म के साक्षात् स्वरूप थे। उनके पराक्रम की कहीं तुलना नहीं थी। वे श्री सम्पन्न होकर इस वसुधा देवी का पालन करते थे। जगत उनसे द्वेष रखने वाले कोई न थे और वे भी किसी से द्वेष नहीं रखते थे।

एक बार की बात है कि परीक्षित का सदा महाबाहु पाण्डु की भांति हिंसक पशुओं को मारने का स्वभाव था और युद्ध में वे उन्हीं की भांति सम्पूर्ण धनुर्धर वीरों में श्रेष्ठ सिद्ध होते थे। एक दिन की बात है, वे सम्पूर्ण राजकार्य  का भार अपने मंत्रियों पर रखकर वन में शिकार खेलने के लिये गये। वहां उन्होंने पंखयुक्त बाण से एक हिंसक पशु को बींध डाला। बांधकर तुरंत ही गहन वन में उसका पीछा किया। वे तलवार बांधे पैदल ही चल रहे थे। उनके पास बाणों से भरा हुआ विशाल तूणीर था। वह घायल पशु उस घने वनमें कहीं छिप गया। तुम्हारे पिता बहुत खोजने पर भी उसे पा न सके। साठ वर्षकी आयु और बुढ़ापे का संयोग इन सबके कारण वे बहुत थक गये थे। उस विशाल वन में उन्हें भूख सताने लगी। इसी दशा में महाराज ने वहां मुनिश्रेष्ठ शमीक को देखा। राजेन्द्र परीक्षित ने उनसे मृग का पता पूछा; किंतु वे मुनि उस समय मौनव्रत के पालन में संलग्न थे। उनके पूछने पर भी महर्षि शमीक उस समय कुछ न बोले।

वे काठ की भाँति चुपचाप, निश्चेष्ट एवं अविचल भाव से स्थित थे। यह देख भूख-प्यास और थकावट से व्याकुल हुए राजा परीक्षित को उन मौनव्रत धारी शांत महर्षि पर तत्काल क्रोध आ गया। अतः क्रोध में भरे हुए आपके पिता ने उनका तिरस्कार कर दिया। भरतश्रेष्ठ! उन्होंने धनुष की नोक से पृथ्वी पर पड़े हुए एक मृत सर्प को उठाकर उन महर्षि के कंधे पर डाल दिया। किंतु उन मेधावी मुनि ने इसके लिए उन्हें भला या बुरा कुछ नहीं कहा। वे क्रोधरहित होकर कंधे पर मरा सर्प लिए हुए पूर्ववत शांत भाव से बैठे रहे।

उस समय राजा परीक्षित भूख से पीड़ित होकर शमीक मुनि के कंधे पर मृत सर्प डालकर पुनः अपनी राजधानी में लौट आए। उन महर्षि के शृंगी नामक एक महा तेजस्वी पुत्र था, जिसका जन्म गाय के पेट से हुआ था। वह महान यशस्वी, तीव्र शक्तिशाली और अत्यंत क्रोधी था। एक दिन उसने आचार्यदेव के समीप जाकर पूजा की और उनकी आज्ञा लेकर वह घर को लौटा। उसी समय शृंगी ऋषि ने अपने एक सहपाठी मित्र के मुख से यह सुना कि तुम्हारे पिता द्वारा उनके पिता का तिरस्कार किया गया है। शृंगी को यह ज्ञात हुआ कि उसके पिता काठ की भांति चुपचाप बैठे थे और उनके कंधे पर मृत सर्प डाल दिया गया और वे अब भी उसे धारण किए हुए हैं। जबकि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया था।  फिर भी उनके साथ ऐसा अपमान किया गया।

यह सब जानकर वह बाल्यावस्था में भी वृद्धों के समान तेज धारण करने वाला महातेजस्वी ऋषि कुमार क्रोध से आग बबूला हो उठा और परीक्षित को श्राप दे दिया। शृंगी तेज से प्रज्वलित-सा हो रहा था। उसने हाथ में जल लेकर रोष पूर्वक कहा कि जिसने मेरे निरपराध पिता पर मरा हुआ सांप डाल दिया है, उस पापी को आज से सात रात के बाद मेरी वाणी के प्रभाव से प्रचंड तेजस्वी विषधर तक्षक नाग अपनी विषाग्नि से जला देगा। देखो, मेरी तपस्या का बल। ऐसा कहकर वह बालक उस स्थान पर गया जहाँ उसके पिता बैठे थे और उन्हें यह सारी बात बताई। तब मुनिश्रेष्ठ शमीक ने आपके पिता के पास अपने सुशील और गुणवान शिष्य गौरमुख को भेजा। उसने विश्राम के बाद राजा से कहा मेरे पुत्र ने आपको श्राप दे दिया है अतः सावधान हो जाइए। सात दिन के बाद तक्षक नाग आपको अपने तेज से जला देगा।। यह भयंकर बात सुनकर परीक्षित तक्षक से अत्यंत भयभीत होकर निरंतर सावधान रहने लगे। जब सातवें दिन आया, तब ब्रह्मर्षि कश्यप ने राजा के पास जाने का विचार किया। मार्ग में नागराज तक्षक ने कश्यप को देखा। मैं वहां जा रहा हूं जहां कुरुकुल के श्रेष्ठ राजा परीक्षित रहते हैं। सुना है कि आज तक्षक नाग उन्हें डंसेगा, इसलिए मैं उन्हें नीरोग करने के लिए शीघ्र जा रहा हूं। मेरी रक्षा में वह सर्प राजा का कुछ भी अहित नहीं कर सकेगा। इसके बाद कश्यप ने तक्षक को रोकने की कोशिश के लिए कई प्रलोभन किए। लेकिन ब्राह्मण के चले जाने पर तक्षक ने छल से भूपालों में श्रेष्ठ परीक्षित् के पास पहुंचकर उन्हें अपनी विषाग्निसे  भस्म कर दिया।

डिस्क्लेमर: “यह लेख पौराणिक कथाओं और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल सूचना प्रदान करना है, किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना या अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं है। जंसत्ता इन कथाओं की ऐतिहासिकता या वैज्ञानिक प्रमाण की पुष्टि नहीं करता है।