Sri Sri Ravi Shankar Maha Shivratri 2026: महाशिवरात्रि केवल एक पर्व नहीं, बल्कि चेतना के जागरण का पावन अवसर है। यह एक ऐसी रात होती है जब साधन बाहरी की बेकार की चीजों से हटकर अपने भीतर के शिव-तत्त्व को अनुभव करने का प्रयास करता है। आध्यात्मिक गुरु गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर के अनुसार, शिव कोई व्यक्तित्व नहीं, बल्कि वह अनंत चेतना हैं, जो समस्त सृष्टि में व्याप्त है। इस विशेष अवसर पर आइए समझते हैं शिव के उस गहन स्वरूप को, जो समय, रूप और सीमाओं से परे है।
वैश्विक आध्यात्मिक गुरु, गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर द्वारा शिव के सार पर दिए गए गहन ज्ञान के अनुसार, पृथ्वी से लेकर शिव-तत्त्व तक कुल छत्तीस तत्त्व माने गए हैं। पहला पृथ्वी तत्त्व है, फिर जल, अग्नि, वायु और आकाश इस क्रम में आगे मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि तत्त्व आते हैं। इस प्रकार गिनते-गिनते यह संपूर्ण अस्तित्व अंततः शिव-तत्त्व पर आकर टिक जाता है और यह अंतिम शिव-तत्त्व सभी तत्त्वों में व्याप्त है।
कैसे है शिव?
इस सवाल का जवाब देते हुए गुरुदेव कहते हैं कि आकाश जैसे। आकाश में ही सब कुछ समाया हुआ है। आकाश से पृथक होने का कोई उपाय नहीं है। शिव से कोई कभी अलग हो ही नहीं सकता, क्योंकि वे सर्वव्यापी हैं। उनसे कोई छिप नहीं सकता, क्योंकि वे सर्वज्ञ हैं।
शिव महाकाल हैं। काल के अधीन सब कुछ है, पर शिव काल के अधीन नहीं हैं। वे काल के परे हैं, काल के अधिपति हैं। इसी कारण शिव को महाकाल कहा गया है।
महाकाल कैसे हैं?
गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर कहते हैं कि वे ज्योति-रूप में हैं और यह ज्योति योगियों के हृदय में है। वही महाकाल की ज्योति है। ध्यानस्थ होकर अपने हृदय में उस ज्योति के रूप में भगवान का अनुभव करना। यही महाकाल का ध्यान है। यही साधना है।
सामान्यतः हर वस्तु को हम तीन कालों में देखते हैं-भूत, वर्तमान और भविष्य। जो बीत गया, वह भूतकाल; जो अभी नहीं हुआ, वह भविष्य और जो इस क्षण है वही वर्तमान है। ये तीनों काल हर वस्तु को बदलते हैं, पर आत्मा को नहीं छू सकते।
जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं से परे जो तुरीय अवस्था है वह ध्यान की अवस्था है। वहां काल का अनुभव नहीं होता। इसलिए जब आप गहरे ध्यान में होते हैं, तो समय का बोध नहीं रहता। जब हम ध्यान में जाते हैं और महाकाल से जुड़ते हैं, तब अनंत काल की अनुभूति का एक क्षण हमें प्राप्त होता है।
ध्यान में शिव-काल की अनुभूति होती है। यह समय की गहराई है। जब हम इस गहराई में प्रवेश करते हैं, तो ऊर्जा का विस्तार अनुभव में आता है।
महाशिवरात्रि के अवसर पर शिव तत्त्व से जुड़े गुरुदेव द्वारा दिये गये कुछ गहरी अंतर्दृष्टि यहां पढ़ें:
- लोकप्रिय मान्यताओं के विपरीत, ‘शिव’ किसी व्यक्ति विशेष या आकृति का नाम नहीं है। शिव वह सनातन तत्त्व हैं, जो समस्त सृष्टि का मूल आधार है। उसी से सृजन होता है, उसी में पालन होता है और अंततः सब कुछ उसी में विलीन हो जाता है।
- शिव अनादि और अनंत हैं। उनका न कोई प्रारंभ है, न कोई अंत। वे समय और सीमा से परे चेतना का स्वरूप हैं।”
- जहां उत्सव का भाव हो, जहाँ जीवन आनंद से परिपूर्ण हो, वही कैलाश है। जहां शिव-तत्त्व की अनुभूति हो, वहीं सच्चा उत्सव है।”
- शिव को भोलेनाथ कहा जाता है, अर्थात सरल और निष्कपट चेतना के स्वामी। जो चेतना आनंदमयी है, निर्मल है और वैराग्य प्रदान करती है, वही शिव है।”
- यह समस्त जगत निष्कपटता और प्रज्ञा की मंगलमयी लय में गतिशील है। यही लय शिव है।
- शिव उदारता, सत्य और सुंदरता के प्रतीक हैं। शिवरात्रि इन दिव्य गुणों के उत्सव का पर्व है, जब हम प्रकृति, करुणा, सत्य और सौंदर्य का अभिनंदन करते हैं।
- जागरण और शिव-तत्त्व का आत्मानुभव ही वास्तविक शिवरात्रि है। जब बुद्धि निर्मल हो और भावनाएँ पवित्र हों, तभी शिवरात्रि का सच्चा अर्थ प्रकट होता है।”
- इस अवस्था तक पहुंचने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आध्यात्मिक ज्ञान दोनों का संतुलन आवश्यक है।
- शिवरात्रि हमें हमारे अस्तित्व का बोध कराती है हम कहां से आए, इस क्षण कहां हैं और अंततः किसमें विलीन होंगे। इस जागरूकता से ही जीवन का उत्सव पूर्णता पाता है।”
- “जहां सत्य है, वहीं शिव हैं। जहां सुंदरता है, वहीं शिव हैं। जहां उदारता है, वहीं शिव हैं। हम सभी उसी शिव-तत्त्व में स्थित और संचरित हैं।
वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस साल महाशिवरात्रि पर काफी शुभ राजयोगों का निर्माण होने वाला है। इस साल महाशिवरात्रि का पर्व 15 फरवरी को मनाया जाएगा। इस दिन बुधादित्य, लक्ष्मी नारायण, शुक्रादित्य से लेकर नवपंचम राजयोग का निर्माण होगा, जिससे 12 में से इन तीन राशि के जातकों को विशेष लाभ मिलने के योग बन रहे हैं। जानें इन लकी राशियों के बारे में
डिस्क्लेमर : इस लेख में प्रस्तुत विचार और व्याख्याएं आध्यात्मिक गुरु गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर जी के प्रवचनों, उनके गहन ज्ञान और ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ की शिक्षाओं पर आधारित हैं। लेख का उद्देश्य केवल आध्यात्मिक जागरूकता और शिव-तत्त्व के दार्शनिक पक्ष को पाठकों तक पहुंचाना है। यहां दी गई जानकारी किसी भी प्रकार की आधिकारिक धार्मिक घोषणा या वैज्ञानिक दावे का विकल्प नहीं है। आध्यात्मिक अनुभव और ‘तुरीय’ जैसी अवस्थाओं की अनुभूति व्यक्तिगत साधना, अभ्यास और पात्रता पर निर्भर करती है। किसी भी ध्यान प्रक्रिया या योग का अभ्यास करने से पहले किसी प्रमाणित गुरु या प्रशिक्षक का मार्गदर्शन लेना उचित रहता है। यह वेबसाइट या लेखक इस जानकारी के आधार पर होने वाले किसी भी व्यक्तिगत अनुभव या निर्णय के लिए उत्तरदायी नहीं होंगे।”
