Magh Purnima Vrat Kath In Hindi (माघ पूर्णिमा व्रत कथा): हिंदू धर्म में पूर्णिमा तिथि का विशेष महत्व है। साल में कुल 12 पूर्णिमा पड़ती है और हर एक पूर्णिमा का अपना-अपना महत्व है। ऐसे ही ही माघ मास का पूर्णिमा तिथि का विशेष महत्व है। इस साल माघ पूर्णिमा 1 फरवरी 2026 को पड़ रही है। इस दिन रवि पुष्य के साथ सर्वार्थ सिद्धि योग का निर्माण हो रहा है। ऐसे में पवित्र नदी में स्नान करने के साथ-साथ दान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। इस दिन गंगा स्नान के साथ सूर्य देव को अर्ध्य देने के अलावा साधक भगवान सत्यनारायण का पाठ भी कराते हैं। आप भी इस दिन भगवान विष्णु की विधिवत पूजा पाठ करने के साथ-साथ माघ पूर्णिमा की व्रत कथा का पाठ करें या फिर सुनें। इससे शुभ फलों की प्राप्ति होती है। आइए जानते हैं माघ पूर्णिमा की संपूर्ण व्रत कथा…
माघ पूर्णिमा के दिन पढ़ें ये व्रत कथा (Magh Purnima Vrat Katha 2026)
माघ पूर्णिमा की प्राचीन कथा के अनुसार कांतिका नगर में धनेश्वर नाम का एक निर्धन ब्राह्मण निवास करता था। वह भिक्षा मांगकर अपने जीवन का निर्वाह करता था। उसके जीवन में एक बड़ा दुख यह था कि उसकी कोई संतान नहीं थी। संतानहीन होने के कारण ब्राह्मण और उसकी पत्नी दोनों ही अत्यंत दुःखी रहते थे।
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एक दिन ब्राह्मण की पत्नी नगर में भिक्षा मांगने निकली, लेकिन लोगों ने उसे संतानहीन होने के कारण ताने दिए और भिक्षा देने से इंकार कर दिया। इस अपमान और पीड़ा से वह अत्यंत व्यथित हो गई। उसी समय किसी शुभचिंतक ने उसे मा काली की सोलह दिनों तक विधिपूर्वक पूजा करने का उपाय बताया।
ब्राह्मण दंपत्ति ने पूर्ण श्रद्धा, नियम और संयम के साथ लगातार सोलह दिनों तक मां काली की आराधना की। उनकी कठोर साधना से प्रसन्न होकर सोलहवें दिन माता काली ने उन्हें दर्शन दिए और ब्राह्मणी को संतान प्राप्ति का वरदान दिया। साथ ही माता ने यह भी कहा कि तुम पूर्णिमा के दिन एक दीपक जलाओ और प्रत्येक पूर्णिमा पर दीपकों की संख्या बढ़ाते जाना, जब तक कि कम से कम बत्तीस दीपक न हो जाएं। इसके साथ ही माता ने दोनों को जीवनभर पूर्णिमा का व्रत रखने का भी आदेश दिया।
माता के आदेशानुसार ब्राह्मण दंपत्ति ने पूर्णिमा व्रत रखना आरंभ किया और हर पूर्णिमा को दीपक जलाने लगे। कुछ समय बाद ब्राह्मणी गर्भवती हुई और कालांतर में उसने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम उन्होंने देवदास रखा।
जब देवदास बड़ा हुआ, तो उसके माता-पिता ने उसे शिक्षा के लिए उसके मामा के साथ काशी भेज दिया। काशी में रहते समय किसी दुर्भाग्यपूर्ण घटना के कारण देवदास का विवाह अनजाने में हो गया। कुछ समय पश्चात उसके जीवन पर संकट आ गया और उसकी मृत्यु का समय समीप आ पहुंचा।
उसी समय उसके माता-पिता ने संतान प्राप्ति के कारण पूर्णिमा का व्रत रखा हुआ था और माता काली की कृपा उनके साथ थी। पूर्णिमा व्रत और माता की कृपा के प्रभाव से काल भी देवदास का कुछ न बिगाड़ सका और उसे जीवनदान प्राप्त हुआ।
ऐसा माना जाता है कि तभी से माघ पूर्णिमा के दिन व्रत रखने की महिमा प्रचलित हुई। जो व्यक्ति श्रद्धा और विश्वास के साथ पूर्णिमा का व्रत करता है, उसे सभी संकटों से मुक्ति मिलती है और उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
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