Shrimad Bhagavatam In Hindi: श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध में एक अत्यंत अलौकिक और ज्ञान-भक्ति से भरपूर कथा बताई गई है। जहां पर श्री कृष्ण और बलराम अपनी माता देवकी और पिता वासुदेव से मिलने के लिए जाते हैं। माता-पिता को पहले ही अपने पुत्र श्री कृष्ण के ब्रह्मज्ञान और उनकी महिमा के बारे में सुन चुके थे। ऐसे में माता देवकी भी अपने भाई कंस द्वारा मारे गए पुत्रों की याद में काफी व्याकुल और विचलित थी। उनको स्मरण करके जब माता की आंखों में आंसू आ गए और उन्होंने बड़े ही करुण स्वर से श्री कृष्ण और बलराम जी मरे हुए पुत्रों से दोबारा मिलवाने के लिए कहा। ऐसे में श्री कृष्ण ने बिना पल सोचे बलराम जी से साथ सुतल लोक जाते हैं। जहां पर राजा बलि उनसे वहीं आने का प्रयोजन पूछते हैं। तब श्री कृष्ण अपने मृत छह भाइयों और उन्हें ब्रह्मा जी से मिले श्राप के बारे में विस्तार से बताते हैं। आइए आज ‘धर्म गाथा’ श्रृंखला में जानते हैं आखिर कौन से श्री कृष्ण के मृत 6 भाई जिन्हें पापी कंस ने एक-एक करके पत्थर में पटक कर मार डाला था…
वास्तव में कौन थे श्री कृष्ण के छह भाई?
श्रीमद्भागवत पुराण में दी गई कथा के अनुसार, स्वयं श्री कृष्ण और बलराम सुतल लोक जाकर अपने भाइयों को लेने जाते हैं। जहां पर उन्होंने राजा बलि को इनके बारे में बताया। उन्होंने कहा कि कंस के हाथों मारे गए वे बालक कोई साधारण बच्चे नहीं थे। बल्कि पूर्वजन्म में वह ब्रह्मा जी के मानपुत्र प्रजापति मरीचि और उनकी पत्नी ऊर्णा के पुत्र थे यानी वह भी उच्च पद के देवता थे जिनके नाम स्मर, उद्गीथ, परिष्वंग, पतंग, क्षुद्रभूत और घृणी था।
ब्रह्मा जी का परिहास करने पर मिला भयंकर श्राप
एक बार ब्रह्मा जी अपनी ही पुत्री सरस्वती के प्रति आकर्षित इतने आकर्षित हो गए और उनसे उद्यत हुए। दृष्टि के रचयिता का इस तरह का अप्रत्याशित रूप और मर्यादा के उल्लंघन को देखकर मरीचि के छह पुत्र अपनी चंचलता और अज्ञानतावश के कारण जोर-जोर से हंसने लगे।
इस तरह से सभी देवताओं और ऋषियों के सामने उनका हंसना और मजाक उड़ाना ब्रह्मा जी को रास नहीं आया और उनके लिए यहीं अपराध भारी पड़ गया। उनके इस कृत से क्रोधित होकर ब्रह्मा जी ने छह भाइयों को श्राप दे दिया…
श्लोक
मरीचेरभवन् पुत्राः षड् जीवन्त्युर्णया युताः ।
प्रहसन् कश्मलं दृष्ट्वा ब्रह्माणं दुहितृगामिनम् ॥
(श्रीमद्भागवत महापुराण – 10.85.47)
तेन शापेन ते जाता हिरण्यकशिपोः सुताः ।
योगमायया च देवक्या जठरं गमिता नृप ॥
(श्रीमद्भागवत महापुराण – 10.85.48)
इस श्राप के अनुसार, प्रजापति मरीचि के छह पुत्र असुर-योनि में पहले राक्षस हिरण्यकश्यप के पुत्र के रूप से उत्पन्न होंगे।फिर योगमाया उन्हें वहां से लाकर देवकी के गर्भ में रख देगी और उनको उत्पन्न होते ही कंस ने मार डालेंगे। ऐसे में कंस के द्वारा मारे गए 6 पुत्र असल में प्रजापति मरीचि के पुत्र थे।
असुर योनि से लेकर माता देवकी के गर्भ तक का सफर
ब्रह्मा जी के शाप के कारण प्रजापति मरीचि के छह पुत्रों का असुरराज हिरण्यकश्यप के पुत्रों के रूप में पैदा हुए। लेकिन कालान्तर में भगवान की दिव्य योगमाया ने अपनी शक्ति से उन्हें वहां से अदृश्य किया। फिर वह कंस की कारागार में बंद माता देवकी के गर्भ से एक-एक करके उत्पन्न हुए। लेकिन पापी कंस ने उन्हें अपना काल समझकर हर एक पुत्र को पत्थर में पटक-पटक कर मार डाला। जहां से वह पुनर्जन्म में कि पापों का प्रायश्चित करते हुए सुतल लोक चले गए।
डिस्क्लेमर: यह लेख पौराणिक ग्रंथों महाभारत के हिंदी अनुवाद और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी भी व्यक्ति, समुदाय या भावना को ठेस पहुंचाना नहीं है, बल्कि शास्त्रों में वर्णित ऐतिहासिक और नैतिक प्रसंगों को पाठकों तक पहुंचाना है। इसकी सत्यता का जनसत्ता से कुछ भी लेना देना नहीं है।
