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श्रीमद्भगवत गीता के इन सात बातों से सीखिए जीवन में कैसे लें सही निर्णय

श्रीमद्भगवत गीता के छठे अध्याय में श्रीकृष्ण कहते हैं कि हमें अपने मस्तिष्क को संतुलित करके चलना चाहिए। इसलिए कोई भी निर्णय तब नहीं लेना चाहिए जब हम बहुत ज्यादा खुश या दुखी हैं।

Author नई दिल्ली | Updated: February 7, 2019 3:55 PM
श्रीकृष्ण।

प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में कई निर्णय लेने पड़ते हैं। ये निर्णय हमारे जीवन को सही दिशा प्रदान करते हैं। सही निर्णय हमें सफलता की बुलंदियों तक पहुंचा सकते हैं। वहीं गलत निर्णय सफलता की ऊंचाइयों से हमें जमीन पर भी ला सकते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने भागवत गीता में निर्णय लेने कुछ नियम बताए हैं। जिन्हें अपनाकर हर कोई अपने जीवन में बेहतर निर्णय ले सकता है। श्रीमद्भगवत गीता एक ऐसा धार्मिक ग्रंथ है जो हर इंसान के जीवन को एक सही दिशा दे सकती है। तो आगे जानते हैं कि भगवत गीता की वो सात बातें कौन-कौन सी हैं, जिसे अपनाकर हम जीवन के हर मोड़ पर सही निर्णय ले सकते हैं।

आमतौर पर यह देखा जाता है कि जो जीच हमें अच्छी अनुभूति देती हैं हम उसे ही पसंद करते हैं। गीता के अनुसार अर्जुन युद्ध नहीं लड़ना चाहते थे, क्योंकि उसे अपने गुरु और भाइयों को युद्ध खोने का डर था। परंतु श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्ध लड़ने का मार्ग दिखाया। इसलिए व्यक्ति को भावना में बहकर कोई भी निर्णय नहीं लेना चाहिए। क्योंकि भावनाएं तात्कालिक होती हैं। श्रीमद्भगवत गीता के छठे अध्याय में श्रीकृष्ण कहते हैं कि हमें अपने मस्तिष्क को संतुलित करके चलना चाहिए। इसलिए कोई भी निर्णय तब नहीं लेना चाहिए जब हम बहुत ज्यादा खुश या दुखी हैं। ज्यादा खुश या दुखी की स्थिति में लिया गया निर्णय गलत ही साबित होगा।

जीवन में कोई भी निर्णय लेने से पहले खुद से पूछना चाहिए, कहीं ये निर्णय गुस्से में या किसी से अधिक लगाव के चलते तो नहीं ले रहे। क्योंकि ऐसी परिस्थिति में लिए गए निर्णय आगे पछतावा दिला सकते हैं। भगवत में एक शब्द बार-बार दुहराया गया है, जो है निष्काम कर्म। इसका मतलब होता है बिना फल की ईच्छा किए कर्म करते रहना। इसलिए हमें कोई भी निर्णय लेने से पहले फल का लालच नहीं करना चाहिए।

भगवत गीता में कहा गया है कि मनुष्य को जो भी काम करना है उस पर पूरा भरोसा करना चाहिए। वरना सफलता कभी नहीं मिलती है। कोई भी निर्णय लेने या काम करने से पहले उस पर पूरा विश्वास कर लेना चाहिए। अगर मन में किसी भी तरह की कोई शंका हो तो इस काम को न करें। अपने निर्णय के बारे में दुबारा सोचें। जो भी चीज समाज या बड़े समूह के लिए अच्छी न हो वो चीजें आपके लिए भी कभी फायदेमंद न हो सकती। इसलिए कभी ऐसा कोई निर्णय न लें। गीता में साफ तौर पर कहा गया है कि जो भी व्यक्ति परमात्मा में विश्वास रखता है, उनका स्मरण करता है, वह हमेशा सही निर्णय लेता है। साथ ही उसकी हार कभी नहीं होती है।

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