Shiv Puran Katha: हिंदू धर्म में भगवान शिव के महादेव, भोलेनाथ जैसे नामों से जाता है। ग्रंथों में उनके विभिन्न स्वरूपों और उनके खास नामों का वर्णन करने के साथ महत्ता बताई गई है। इन्हीं में से कुछ ज्योतिर्लिंग बनें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस जगहों के दर्शन करने मात्र से हर एक दुख-दर्द दूर हो सकता है। ऐसे ही आज धर्म गाथा श्रृंखला में बता रहें है भगवान शिव के ‘कृत्तिवासा’ यानी हाथी की खाल धारण करने वाले स्वरूप के बारे में। भगवान शिव का काशी में सबसे प्रसिद्ध श्री काशी विश्वनाथ मंदिर माना जाता है। जहां पर भोलेनाथ के स्थापित होने की कहानी काफी रोचक है। लेकिन काशी में एक और प्रसिद्ध मंदिर है, जो उन्होंने महिषासुर के पुत्र गजराज का वध करने के बाद उसे वरदान दिया था। शिव पुराण के श्री रूद्र संहिता के पंचम खण्ड में इस प्रसंग के बारे में विस्तार से बताया गया है। आइए जानते हैं इस कथा के बारे में…
शिव पुराण के अनुसार, जब महिषासुर के प्रतापी पुत्र दानवराज गजासुर ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया और देवताओं को प्रताड़ित करना शुरू किया, तब देवाधिदेव महादेव ने धर्म और भक्तों की रक्षा के लिए अपने त्रिशूल से उसका संहार किया। हालांकि, मृत्यु के अंतिम क्षणों में गजासुर की अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर भोलेनाथ ने उसे एक अनूठा वरदान दिया। आइए जानते हैं गजासुर के वध की यह पूरी पौराणिक कथा और क्यों महादेव ने अपने शरीर पर दैत्यराज के चर्म (खाल) को धारण किया।
गजासुर ने पिता के वध का बदला लेने के लिए की कठोर तपस्या
शिव पुराण में दी कथा के अनुसार, सनत्कुमार जी वेद व्यास को इस कथा को सुनाते हैं। वह सनत्कुमार से कहते हैं कि मैं आपको अब भगवान शशि मौलि द्वारा दानव राज गजासुर के संहार की कथा सुनाता हूं। बता दें कि गजासुर महिषासुर का प्रतापी पुत्र था। जब उसे पका चला कि उसके पिता का वध देवताओं की रक्षा के लिए किया गया है, तो वह अति क्रोधित हुआ और इसका बदला लेने के लिए कठोर तपस्या शुरू कर दी। वह लंबे समय तक ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए तपस्या करता रहा। लेकिन वह प्रकट नहीं हुए। ऐसे में गजासुर अपनी तपस्या को बढ़ता गया है। ऐसे में तप से निकल रही ज्वाला से देवता परेशान हो गए।।
ब्रह्मा जी ने गजासुर को दिया ये वरदान
जब गजासुर की तप की अग्नि से चिंतित होने लगे, तो वह ब्रह्मा जी के पास पहुंचे और उन्हें राक्षस को वर देने की बात कहीं। ऐसे में ब्रह्मा जी गजासुर के सामने प्रकट हुए और वरदान मांगने के लिए कहा। ऐसे में गजासुर ने ब्रह्माजी की स्तुति कर उस महाबली और अजेय होने का वरदान प्राप्त किया। इसके बाद ब्रह्मा जी उसे आशीर्वाद देकर चले गें।
वर पाते ही गजासुर ने मचाया हाहाकार
जब गजासुर को वरदान मिल गया है, तो वह चारों दिशाओं में अपने राज्य को बढ़ाने के साथ-साथ तीनों लोकों को भी हासिल कर लिया। इसके साथ ही देवता, असुरों, मनुष्यों से लेकर ऋषि-मुनियों आदि को सताने लगा। एक बार वह अपने राज्य को फैलाते हुए भगवान शिव की प्रिय नगरी काशी पहुंच गया। वहां भी जाकर वह सभी को सताने लगा। ऐसे में सभी ने अपने प्रिय शिव जी आरादन की और कहा कि हे भक्तवत्सल ! हे कृपानिधान! उस गजासुर नामक दैत्य से हमारी रक्षा करें।
भगवान शिव ने त्रिशूल से किया गजासुर का वध
तब शिव और गजासुर के बीच भयानक युद्ध हुआ। तब शिव जी से त्रिशूल से उस पर प्रहार किया। इसके बाद उसे त्रिशूल के सहारे ऊपर उठा लिया। अपना अंतिम समय आने पर दैत्यराज गजराज ने भगवान शिव की आराधना करने लगा और शिवजी को प्रसन्न करने हेतु उनकी स्तुति करने लगा।
शिव जी ने गजासुर पर प्रसन्न होकर दिया ये वरदान
भगवान शिव की स्तुति करते हुए गजासुर ने कहा कि आप देवों के देव महादेव है। आप अपने भक्तों की सदा रक्षा करते हैं। आप हर किसी का कल्याण करने के साथ कष्टों का निवारण करते हैं। आपकी शरण में जो भी आ जाता है, तो आप उसकी इच्छा पूरी करते हैं। ऐसे में देवाधिदेव भगवान महादेव शिव को मैं प्रणाम करता हूं। प्रभो ! मुझ पर प्रसन्न होइए और मेरे कष्टों का निवारण कीजिए।
दैत्यराज गजासुर की भक्ति भावना को देखते हुए भगवान शिव अति प्रसन्न हुए और वर मांगने के लिए कहा। तब शिव जी की बात सुनकर गजासुर ने कहा कि हे महादेव अगर आप वास्तव में मेरी आराधना से प्रसन्न हुए हैं, तो आपने अपने पवित्र त्रिशूल से मेरे शरीर को स्पर्श किया है इसलिए मैं यह चाहता हूं कि मेरे शरीर का चर्म आप धारण करें। भगवान आप सदा मेरी खाल का ही ओढ़ना धारण करें और आज से आप ‘कृत्तिवासा’ नाम से विख्यात हों ।
काशी में प्रसिद्ध हुआ कृतिवासेश्वर के रूप से स्थापित
भगवान शिव ने दैत्यराज गजासुर को उसका इच्छित वरदान प्रदान किया और कहा कि हे गजासुर …तुम्हारे शरीर को आज मेरी प्रिय काशी नगरी में मुक्ति मिलेगी। इसके साथ ही तुन्हारा शरीर यहां मेरे ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित होगा और कृतिवासेश्वर नाम से प्रसिद्ध होगा।
कृतिवासेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शम मात्र से होती है मोक्ष की प्राप्ति
शिव जी आगे कहते हैं कि इस ज्योतिर्लिंग के दर्शम मात्र से व्यक्ति को मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति होगी। यह कहकर भगवान शिव ने गजासुर के शरीर की चर्म को ओढ़ लिया और कृतिवासेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना की।
अस्वीकरण (Disclaimer): यह लेख लोक मान्यताओं और शिव महापुराण में वर्णित पारंपरिक पौराणिक कथाओं पर आधारित है। जनसत्ता डॉट कॉम (Jansatta.com) इसके ऐतिहासिक या वैज्ञानिक प्रमाण का दावा नहीं करता है। इसका उद्देश्य केवल पाठकों को सांस्कृतिक और धार्मिक प्रसंगों से अवगत कराना है।
