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जानिए, आखिर भगवान शिव क्यों लगाते हैं चिता की राख

शास्त्रों में भगवान शिव के स्वरूप का जो वर्णन मिलता है। जिसमें भगवान शिव केवल हिरण की खाल लपेटे और भस्म लगाए हुए हैं।

फोटो क्रेडिट- यूट्यूब।

शास्त्रों में भगवान शिव को अद्भुत और अविनाशी कहा गया है। कहते हैं की भोलेनाथ जीतने सरल हैं उससे कहीं अधिक रहस्यमय भी हैं। शिव का रहन-सहन, आवास और गण आदि सभी देवताओं से अलग हैं। शास्त्रों में भगवान शिव के स्वरूप का जो वर्णन मिलता है। जिसमें भगवान शिव केवल हिरण की खाल लपेटे और भस्म लगाए हुए हैं। कई लोगों ने उज्जैन के महाकाल की भस्म आरती देखी होगी। लेकिन क्या आपको पता है कि भगवान शिव चिता की राख क्यों लगाते हैं? यह भस्म क्या होता है? आगे इस बारे में जानते हैं।

शास्त्रीय मान्यता है कि भगवान शिव का प्रमुख वस्त्र भस्म है। क्योंकि शिव का पूरा शरीर भस्म से ढका रहता है। संतों का भी एक मात्र वस्त्र भस्म ही होता है। ऐसा देखने को मिलता है कि अघोरी, सन्यासी या अन्य साधु भी अपने शरीर पर भस्म ही रमाते हैं। भगवान शिव का भस्म रमाने के पीछे कुछ वैज्ञानिक और आध्यात्मिक कारण भी हैं। भोलेनाथ का अपने शरीर पर भस्म लपेटने का दार्शनिक अर्थ ये है कि यह शरीर जिस पर हम गर्व करते हैं, भस्म के समान ही अंत में इसे हो जाना है। भस्म की एक विशेषता यह है कि ये शरीर के रोम छिद्रों को बंद कर देता है। साथ ही इसका मुख्य गुण ये है कि यदि कोई व्यक्ति इसे शरीर पर लगाता है तो गर्मी में गर्मी और सर्दी में ठंड नहीं लगता है।

भगवान शिव को चिता भस्म लगाने की प्रथा सदियों पुरानी है। कहते हैं कि एक बार भगवान शिव ने देखा कि कुछ लोग राम-नाम कहते हुए एक शव को लेकर जा रह थे। इस पर भगवान शिव ने कहा कि ये तो मेरे प्रभु राम का नाम ले रहे हैं और शव को श्मशान ले जा रहे हैं। जब श्मशान में उस शव का अंतिम संस्कार करके लोग चले गए। तब महादेव ने श्रीराम का स्मरण करते हुए उस चिता भस्म को अपने शरीर पर धरण कर लिया। माना जाता है कि तब से यह परंपरा चली आ रही है।

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