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जानिए, क्यों महाभारत के 15 साल बाद युद्ध में मारे गए सभी योद्धा हो गए जीवित?

एक दिन भीम ने धृतराष्ट्र और गांधारी के सामने कुछ ऐसी बातें कह दी जिससे वे बहुत आहत हुए। इसलिए उन्होंने वन में जाकर ताप करने की इच्छा जताई। कुंती ने भी उन दोनों के साथ जाने का निश्चय किया।

Author नई दिल्ली | February 13, 2019 1:24 PM
सांकेतिक तस्वीर।

महाभारत से जुड़ी कुछ ऐसी रोचक बातें हैं जो रहस्यमयी मानी जाती हैं। वैसे तो ये बात सभी जानते हैं कि महाभारत के युद्ध में पांडवों ने भीष्म, द्रोणाचार्य, दुर्योधन, कर्ण आदि योद्धाओं का वध कर दिया था। लेकिन यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि महाभारत युद्ध में मारे गए सभी योद्धा एक रात के लिए फिर से जीवित हुए थे। ये बात पढ़ने में थोड़ी अजीब जरूर लग सकती है, लेकिन इस घटना का पूरा वर्णन महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत ग्रंथ के आश्रमवासिक पर्व में मिलता है। जानते हैं की आखिर क्यों महाभारत के 15 साल बाद युद्ध में मारे गए सभी योद्धा जीवित हो गए?

महाभारत युद्ध के बाद युधिष्ठिर ने राज गद्दी संभाली। माता कुंती, धृतराष्ट्र और गांधारी भी उन्हीं के साथ शांति पूर्वक जीवन व्यतीत कर रहे थे। सभी पांडव भाई गांधारी और धृतराष्ट्र की सेवा में लगे रहते। पर भीम के मन में धृतराष्ट्र के प्रति हमेशा द्वेष भाव ही रहता था। भीम धृतराष्ट्र के सामने कभी-कभी ऐसी बात भी कह देते जो धृतराष्ट्र को बुरा लगता। इस प्रकार धृतराष्ट्र, गांधारी ने पांडवों के साथ रहते-रहते 15 साल गुजार दिए। एक दिन भीम ने धृतराष्ट्र और गांधारी के सामने कुछ ऐसी बातें कह दी जिससे वे बहुत आहत हुए। इसलिए उन्होंने वन में जाकर ताप करने की इच्छा जताई।

कुंती ने भी उन दोनों के साथ जाने का निश्चय किया। कुंती, गांधारी और धृतराष्ट्र के साथ संजय और विदुर भी वन गए। महर्षि वेदव्यास से वनवास की दीक्षा लेकर ये सभी महर्षि सतयुग के आश्रम में निवास करने लगे। वन में धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती घोर तप करने लगे। वहीं विदुर और संजय इनकी सेवा में लगे रहते है तप किया करते। इस प्रकार धृतराष्ट्र आदि को वन में रहते हुए एक साल बीत गया। इधर हस्तीनपुर में राजा युधिष्ठिर के मन में वन में रह रहे अपने परिजनों को देखने की इच्छा हुई। फिर युधिष्ठिर अपने परिवार और हस्तीनपुर के नागरिकों के साथ अपने बुजुर्गों के दर्शन करने गए। धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती अपने पुत्रों और परजनों को देखकर बहुत प्रसन्न हुए।

जब युधिष्ठिर धृतराष्ट्र से मिले तब विदुर तप कर रहे थे। तभी युधिष्ठिर ने विदुर को उनकी तरफ आते देखा। पर विदुर आश्रम में इतने सारे लोगों को देखकर लौट गए। युधिष्ठिर उनसे मिलने के लिए उनके पीछे-पीछे दौड़े तभी विदुर ने एक पेड़ के नीचे अपने प्राण त्याग दिए और विदुर की आत्मा युधिष्ठिर में समा गई। जब युधिष्ठिर ने ये बात आश्रम में आकर सबको बताई तो महर्षि वेदव्यास ने उन्हें बताया कि विदुर धर्मराज के अवतार थे और युधिष्ठिर भी धर्मराज का ही अंश है।

इसलिए विदुर के पान युधिष्ठिर के शरीर में समा गए। इसके साथ ही महर्षि वेदव्यास ने पांडवों और धृतराष्ट्र से कुछ मांगने के लिए कहा। गांधारी, कुंती और धृतराष्ट्र ने महाभारत युद्ध में मारे गए पुत्र और परिजनों को देखने की इच्छा जताई। महर्षि देवव्यास ने अपने तप शक्ति के जरिए कौरव और पांडव दोनों पक्षों से मृत योद्धाओं का गंगा तट पर आवाहन किया। धीरे-धीरे महाभारत युद्ध में मारे गए सभी योद्धा एक-एक कर प्रकट होने लगे। इस प्रकार वेदव्यास महाभारत युद्द में मारे गए सभी योद्धाओं को जीवित कराया था।

 

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