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जानिए, हिन्दू धर्म में सिर पर चोटी रखने का क्या है धार्मिक और वैज्ञानिक कारण?

चोटी रखने का सर्वप्रमुख वैज्ञानिक कारण यह है कि शिखा वाला भाग जिसके नीचे सुषुम्ना नाड़ी होती है। जो कपाल तंत्र के अन्य खुली जगहों की अपेक्षा अधिक संवेदनशील होती है।

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हमारे समाज में प्राचीन कल से ही लोग सिर पर शिखा (चोटी) रखते आए हैं खासकर ब्राह्मण और पंडित। सिर पर चोटी रखने का महत्व इतना अधिक माना गया है कि इस कार्य को आर्यों की पहचान बताई गई। यदि हम यह सोचते हैं कि चोटी केवल परंपरा और पहचान का प्रतीक है तो ये कहीं न कहीं गलत है। सिर पर शिखा रखने के पीछे बहुत बड़ी वैज्ञानिकता है। जिसे आधुनिक समय में वैज्ञानिकों द्वारा सिद्ध भी किया गया है। परंतु क्या आप जानते हैं कि सिर पर चोटी रखने का वैज्ञानिक और धार्मिक कारण क्या-क्या हैं? यदि नहीं! तो आगे हम इसे जानते हैं।

चोटी रखने का सर्वप्रमुख वैज्ञानिक कारण यह है कि शिखा वाला भाग जिसके नीचे सुषुम्ना नाड़ी होती है। जो कपाल तंत्र के अन्य खुली जगहों की अपेक्षा अधिक संवेदनशील होती है। जिसे खुली होने के कारण वातावरण से ऊष्मा और अन्य ब्रह्मांडीय विद्युत चुंबकीय तरंगों का मस्तिष्क से आदान-प्रदान बहुत आसानी से हो जाता है। वहीं शिखा न होने की स्थिति में स्थानीय वातावरण के साथ मस्तिष्क का ताप भी बदलता रहता है।

परंतु वैज्ञानिक मस्तिष्क के सुचारु, सर्वाधिक क्रियाशील और उचित उपयोग के लिए इसके ताप का नियंत्रण रहना अनिवार्य होता है। जो शिखा न होने की स्थिति में असंभव है। क्योंकि शिखा इस ताप को आसानी से संतुलित कर सकती है और ऊष्मा की कुचलता की स्थित उत्पन्न करके वायुमण्डल से ऊष्मा के स्वतः आदान-प्रदान को रोक देती है। कहते हैं कि आज से कई हजार वर्ष पहले हमारे पूर्वज इन सब वैज्ञानिक कारणों से भालिभांति परिचित थे। माना जाता है कि जिस स्थान पर शिखा रखी जाती है यह शरीर के अंगों, बुद्धि और मन को नियंत्रित करने का स्थान भी है। इसके अलावा शिखा (चोटी) रखने के पीछे धार्मिक कारण भी शास्त्रों में बताए गए हैं।

इसके लिए शास्त्रों में कहा गया है कि ‘स्नाने दाने जपे होमे संध्यायां देवतार्चने। शिखग्रंथिम विना कर्म न कुर्याद वै कदाचन।।’ यानि स्नान, दान, जप, होम, संध्या, देवतार्चन कर्म में नित्य शिखा बांधनी चाहिए। क्योंकि बिना शिखा बंधन किए ये सारे काम निष्फल हो जाते हैं। साथ ही बिना शिखा बंधन किए ये सारे काम नहीं करने चाहिए। वहीं शिखा बांधने के लिए शास्त्रों में मंत्र का भी जिक्र किया गया है। मंत्र है- चिद्रूपिणि महामाये दिव्यतेजः समन्विते। तिष्ठ देवि शिखामध्ये तेजोवृद्धि कुरुष्व मे।। यानि जो चित्तस्वरूपी महामाया है, जो दिव्यतेजोमयी है, वो महामाया शिखा के मध्य में निवास करें और तेज में वृद्धि करें।

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