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जानिए, सूर्य को जल अर्पण करने का सही तरीका

भविष्य पुराण के मुताबिक मनुष्य की दाईं हाथ की उंगलियों में सबसे आगे वाले पौरों को देवतीर्थ कहा गया है। भगवान सूर्य को जल अर्पण करने के लिए उंगलियों के इसी भाग का उपयोग करना शुभ माना गया है।

Author नई दिल्ली | April 15, 2019 10:51 AM
सूर्य को जल अर्पण करते हुए।

धार्मिक ग्रन्थों और पुराणों में सूर्य को प्रत्यक्ष देवता बताया गया है। वेदों में सूर्यदेव को इस संसार का आत्मा कहा गया है। ऐसा इसलिए क्योंकि इस चराचर जगत को रोशनी प्रदान करने वाले एक मात्र सूर्य देवता ही हैं। साथ ही इस पृथ्वी पर जीवन की आस सूर्य से ही है।

यजुर्वेद में सूर्य को भगवान का आंख कहकर पुकारा गया है। इसके अलावा छान्दोग्य उपनिषद् में उल्लेख मिलता है कि सूर्य की उपासना से निःसंतान को पुत्र प्राप्ति का सौभाग्य प्राप्त होता है। क्या आप जानते हैं कि भगवान सूर्य को जल अर्पण करने का सही तरीका क्या है? यदि नहीं, तो आगे हम इसे जानते हैं।

भविष्य पुराण के मुताबिक मनुष्य की दाईं हाथ की उंगलियों में सबसे आगे वाले पौरों को देवतीर्थ कहा गया है। भगवान सूर्य को जल अर्पण करने के लिए उंगलियों के इसी भाग का उपयोग करना शुभ माना गया है। साथ ही भगवान सूर्य को जल अर्पण करने का यह तरीका बिलकुल सही है। कहते हैं कि सूर्यदेव को इस तरीके से जल अर्पण करने से दुर्भाग्य दूर होता है और जीवन सूर्य के समान कांतिमान रहता है।

ज्योतिष के जानकार ऐसा मानते हैं कि दाएं यानि सीधे हाथ में पांच ऐसी जगह होती हैं जो बहुत ही खास हैं। हिंदू धर्म ग्रन्थों में इन्हें पांच तीर्थ कहा गया है। इन्हीं तीर्थों से मनुष्य देवताओं, पितृ और ऋषियों को जल चढ़ाते हैं। जिस प्रकार देवताओं को जल चढ़ाने के लिए दाईं हथेली का अगला हिस्सा तय है। उसी तरह पितरों को जल अर्पण करने और अन्य कर्म करने के लिए भी हथेली के कुछ विशेष स्थान बताए गए हैं।

देव तीर्थ- इस तीर्थ का स्थान चारों उंगलियों के ऊपरी भाग में होता है। इस तीर्थ से देवताओं को जल अर्पण करने का विधान है।

पितृ तीर्थ- तर्जनी यानि अंगूठे के बाद वाली उंगली और अंगूठे के बीच के स्थान को पितृ तीर्थ कहते हैं। इससे पितरों को जल अर्पित किया जाता है।

ब्रह्म तीर्थ- हथेली के निचले हिस्से से मणिबंध में ब्रह्म तीर्थ होता है। इस तीर्थ से आचमन, शरीर शुद्धि और पानी पाने के काम किए जाते हैं।

सौम्य तीर्थ – यह स्थान हथेली के बीच में होता है। भगवान का प्रसाद और चरणामृत इसी तीर्थ पर लेते हैं।

ऋषि तीर्थ – कनिष्ठा यानि छोटी उंगली के नीचे वाला हिस्सा ऋषि तीर्थ कहलाता है। विवाह के समय हथेली का मिलाना इसी तीर्थ से किया जाता है।

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