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असुरों का वध करने के लिए हुई थीं मां काली अवतरित, जानें क्या है कालकाजी मंदिर के 12 दरवाजों की कहानी

भारत की राजधानी दिल्ली के दक्षिणी हिस्से में स्थित कालका माता के इस मंदिक के मुख्य 12 द्वार हैं।

नवरात्रि में कालका जी मंदिर में मेला लगता है।

दिल्ली के दक्षिण में विराजमान कालकाजी मंदिर देश के प्राचीनतम सिद्धपीठों में से एक माना जाता है। कालका, देवी काली का ही दूसरा नाम है। इस मंदिर को जयंती पीठ और मनोकामना सिद्ध पीठ के नाम से भी जाना जाता है। इस पीठ का अस्तित्व अनादि काल से माना जाता है। ये मंदिर मां काली को समर्पित है जो धरती पर असुरों का संहार करने के लिए अवतरित हुई थीं। मौजूद मंदिर को बाबा बालकनाथ द्वारा स्थापित माना जाता है। इस मंदिर के लिए मान्यता है कि यहां पर आद्यशक्ति माता भगवती महाकाली के रुप में प्रकट हुई थीं।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार एक बार स्वर्ग के देवताओं ने असुरों के द्वारा सताए जाने पर मां भगवती का पूजन शुरु किया। देवताओं से प्रसन्न होकर मां ने कौशिकी देवी को अवतरित किया। जिन्होनें अनकों असुरों का संहार किया लेकिन रक्तबीज नाम के असुर का वो वध नहीं कर पाईं। इसके बाद मां भगवती ने अपनी भृकुटी से महाकाली को प्रकट किया और रक्तबीज का वध किया। महाभारत काल में युद्ध से पहले भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों के साथ युद्ध में विजय प्राप्ति के लिए मां कालका की आराधना की थी। बाद में बाबा बालकनाथ ने इस पर्वत पर तपस्या की थी और उन्हें माता का साक्षात्कार हुआ था।

भारत की राजधानी दिल्ली के दक्षिणी हिस्से में स्थित कालका माता के इस मंदिक के मुख्य 12 द्वार हैं। ये 12 द्वार 12 माह के प्रतीक माने जाते हैं। मंदिर के हर द्वार के पास माता के अलग भक्तिमय चित्रों को बनाया गया है। मान्यता है कि ग्रहण के दिन सभी ग्रह मां कालिका के अधीन होते हैं। इसीलिए ग्रहण के दिन जब सभी मंदिर बंद होते हैं माता काली का ये मंदिर खुला होता है। सामान्य दिनों में इस मंदिर में वेदों, पुराणों और तंत्र विधि के साथ पूजा होती है। नवरात्रि में इस मंदिर में मेला लगता है। इस मंदिर में अखंड ज्योति प्रज्जवलित रहती है। मान्यता है कि नवरात्रि में लगने वाले मेले में माता अष्टमी और नवमी के दिन मेले में घूमती हैं।

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