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भगवान शंकर का रूप हैं नंदी! जानें क्यों हर शिव मंदिर के बाहर होते हैं विराजमान

नंदी के नेत्रों का अर्थ है कि भक्ति के साथ मनुष्य में क्रोध, अहम और दुर्गुणों को पराजित करने का सामर्थ्य न हो तो भक्ति का लक्ष्य प्राप्त नहीं होता है।

Author Updated: February 22, 2018 12:27 PM
भगवान शिव की तरह नंदी भी अजर-अमर हैं।

भगवान शिव का ध्यान करने से ही एक ऐसी छवि उभरती है जिसमें वैराग्य है। शिव के एक हाथ में त्रिशूल, वहीं दूसरे हाथ में डमरू, गले में सांप और सिर पर त्रिपुंड चंदन लगा हुआ है। किसी भी शिव मंदिर में भगवान शिव के पास ये चार चीजें हमेशा मिलती हैं। इससे यह सवाल जुड़ा है कि क्या शिव के अवतरण के साथ ही ये सब चीजें प्रकट हुई थीं। भगवान शिव की जटाओं में अर्ध चंद्रमा, जटाओं से निकलती गंगा, उनकी सवारी बैल आदि भगवान शिव को रहस्यमय बनाती हैं। आज इनमें से एक रहस्य को जानते हैं कि शिव के पास नंदी बैल कैसे आए और शिव के हर मंदिर के बाहर नंदी जी क्यों विराजते हैं।

शिवपुराण की कथा के अनुसार, शिलाद मुनि के ब्रह्मचारी हो जाने के कारण वंश समाप्त होता देख उनके पितरों ने चिंता व्यक्त की। मुनि योग और तप आदि में व्यस्त रहने के कारण गृहस्था आश्रम नहीं अपनाना चाहते थे। शिलाद मुनि ने संतान की कामना से इंद्र देव को तप से प्रसन्न कर ऐसे पुत्र का वरदान मांगा जो जन्म और मृत्यु के बंधन से मुक्त हो। इंद्र देव ने इसमें अपनी असर्मथता जाहिर करते हुए भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कहा। भगवान शंकर शिलाद मुनि की कठोर तपस्या से प्रसन्न हुए और स्वयं शिलाद के पुत्र के रूप में प्रकट होने का वरदान दिया। वे नंदी के रूप में प्रकट हुए।

शंकर के वरदान से नंदी मृत्यु, भय आदि से मुक्त हुए। भगवान शंकर ने माता पार्वती की सम्मति से संपूर्ण गणों और वेदों के समक्ष गणों के अधिपति के रूप में नंदी का अभिषेक करवाया। इस तरह नंदी नंदीश्वर में बदल गए। कुछ समय पश्चात नंदी और मरुतों की पुत्री सुयशा का विवाह हुआ। भगवान शंकर ने नंदी को वरदान दिया कि जहां भी नंदी का निवास होगा, उसी स्थान पर शिव भी निवास करेंगे। यही कारण है कि हर शिव मंदिर में नंदी की स्थापना की जाती है। नंदी के नेत्र सदैव अपने इष्ट का स्मरण करते हैं। माना जाता है कि नंदी के नेत्रों से ही शिव की छवि मन में बसती है। नंदी के नेत्रों का अर्थ है कि भक्ति के साथ मनुष्य में क्रोध, अहम, दुर्गुणों को पराजित करने का सामर्थ्य न हो तो भक्ति का लक्ष्य प्राप्त नहीं होता है। नंदी पवित्रता, विवेक, बुद्धि और ज्ञान के प्रतीक माने जाते हैं। उनके जीवन का हर क्षण भगवान शिव को समर्पित है।

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