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श्री कृष्ण को दरिद्र होने से मित्र सुदामा ने बचाया था! जानें कृष्ण के प्रिय कैसे हो गए इतने गरीब

शास्त्रों के अनुसार कहा जाता है कि सुदामा एक भरेपूरे परिवार से थे और उन्हें धन की कोई कमी नहीं थी, लेकिन एक घटना के बाद उन्हें दर-दर जाकर भिक्षा मांगनी पड़ने लगी।

श्रीकृष्ण के परम मित्र सुदामा थे। ( प्रतीकात्मक चित्र)

पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान कृष्ण के मित्र सुदामा को एक दरिद्र ब्राह्मण माना जाता है। श्रीकृष्ण के परम मित्र होने के बावजूद सुदामा दरिद्र जीवन व्यापन करते रहे। कई शास्त्रों और कथाओं के अनुसार कहा जाता है कि सुदामा एक भरेपूरे परिवार से थे और उन्हें धन की कोई कमी नहीं थी, लेकिन एक घटना के बाद उन्हें दर-दर जाकर भिक्षा मांगनी पड़ने लगी।

कथा के अनुसार माना जाता है कि नंद गांव में एक गरीब ब्राह्मणी रहती थी जो भिक्षा मांग कर अपनी जीवन व्यापन करती थी, एक समय उसे पांच दिनों तक किसी से भिक्षा प्राप्त नहीं हुई। छठे दिन उसे चने के कुछ दाने प्राप्त हुए, लेकिन उसने चने उसी समय ग्रहण नहीं करने का फैसला लिया। ब्राह्मणी ने सोचा कि प्रातः काल उठकर वासुदेव को भोग लगाने के बाद उन चने के दानों का सेवन करेगी। ब्राह्मणी उस रात भगवान विष्णु का नाम जपते हुए सो गई। उस रात दो चोर उसकी कोठरी में आए और उन्हें वो चने की पोटली को सोने की सिक्कों की पोटली समझकर चुरा ले गए। चोर छिपने की जगह ढूंढते हुए संदीपन मुनि के आश्रम में आकर छिप गए। इसी आश्रम में भगवान कृष्ण और सुदामा साथ में शिक्षा ग्रहण करते थे। आश्रम में मौजूद गुरुमाता को पता चल गया कि चोर आश्रम में आ गए हैं।

गुरुमाता को आता देखकर चोर पोटली छोड़कर भाग गए। वहीं दूसरी तरफ ब्राह्मणी भूख से तड़प रही थी उसने श्राप दिया कि जो मेरे चनों का सेवन करेगा वो दरिद्र हो जाएगा। आश्रम में गुरुमाता को वो चनों की पोटली मिल जाती है। भगवान कृष्ण और सुदामा जंगल में घास काटने के लिए जाते हैं तो गुरुमाता को चने की पोटली उन्हें दे देती है। सुदामा जैसे ही पोटली हाथ में लेते हैं उन्हें पता चल जाता है कि चने के दाने श्रापित हैं। सुदामा अपने मित्र श्रीकृष्ण से बहुत प्यार करते थे जिस कारण वो चने सुदामा ने खुद ग्रहण कर लिए, जिससे दरिद्रता का श्राप उनके सिर पर आ गया और वो दर-दर भटक कर भिक्षा मांगने लगे।

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