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जानिए कैसे भगवान शिव के आभूषण देते हैं मानव जीवन में सफलता का संदेश

भगवान शिव के त्रिशूल को शरीर की तीन प्रमुख नाड़ियों की तरह माना जाता है, जिससे पूरा शरीर चलता है।

चांद को नशे का प्रतीक माना जाता है।

भगवान शिव का ध्यान करने से एक ऐसी छवि उभरती है जिसमें वैराग माना जाता है। शिव की इस छवि के हाथ में त्रिशूल, दूसरे हाथ में डमरु, गले में सांप और सिर पर त्रिपुड चंदन लगा हुआ है। भगवान शिव की हर छवि में ये सभी चीजें दिखाई देती हैं। भगवान शिव की जटाओं में अर्ध चंद्रमा, सिर से निकलती गंगा आदि बाते हैं जो उनके रुप को विचित्र बनाती हैं। शिव के गले में नाग देवता विराजित हैं। शिव जी के चित्रों में उनके मस्तिष्क पर अंकित तीसरी आंख के कारण उन्हें तीन नेत्रों वाला कहा जाता है। माना जाता है कि मनुष्य की दो आंखे सांसारिक वस्तुओं को दर्शाती हैं। वहीं भगवान शिव की तीसरी आंख सांसारिक वस्तुओं से परे संसार को देखने की शक्ति प्रदान करती हैं। पांच इंद्रियों से अलग शक्ति का परिचय करवाती है भगवान शिव की तीसरी आंख। इसी कारण से उन्हें त्रयंबक कहा जाता है।

भगवान शिव के गले में मौजूद सर्प को नागराज कहा जाता है। इस नाग का नाम वासुकी है। इन्हीं का प्रयोग समुद्र मंथन के दौरान रस्सी के रुप में किया गया था। इनकी भक्ति के कारण ही भगवान शिव ने नागलोक का राजा बनाया था और अपने गले में आभूषण के तौर पर धारण किया था। माना जाता है कि इंसान के गले के गड्ढे में विशुद्धि चक्र होता है जो बाहर के हानिकारक प्रभावों से शरीर को बचाता है। सांप में जहर होता है, गले में धारण करने से विशुद्धि चक्र शरीर को बचाए रखता है। इसी के आधार पर माना जाता है कि बाहरी प्रभाव कितने भी ताकतवर हों, अपने को हमेशा मजबूत रखना चाहिए।

शिव का त्रिशूल मानव शरीर में मौजूद तीन महत्वपूर्ण नसों को दर्शाता है। इन्ही तीन नसों से 72 हजार नसें निकलती हैं। इसी आधार पर माना जाता है कि भगवान शिव के त्रिशूल से पूरे संसार की क्रिया चल रही है। भगवान शिव को शास्त्रों में सोम भी कहा गया है। सोम का अर्थ होता है नशा। नशे में रहने वाले व्यक्ति को भौतिक वस्तुओं की जरुरत नहीं होती है। उसी तरह चांद को भी सोम कहा जाता है। चांद को नशे का स्रोत माना जाता है। भगवान शिव चंद्रमा को आभूषण की तरह धारण करते हैं। किसी भी परेशानी को अपने ऊपर हावी नहीं होने का प्रतीक चांद को माना जाता है।

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