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जानिए, राक्षस गायसुर के कारण ‘गया’ कैसे बना मोक्ष प्राप्ति का स्थान

पुराणों के अनुसार गया एक राक्षस हुआ जिसका नाम गायसुर था। कहते हैं कि गायसुर को उसकी तपस्या के कारण वरदान मिला था कि जो भी उसे देखेगा या उसका स्पर्श करेगा उसे यमलोग नहीं जाना पड़ेगा।

सांकेतिक तस्वीर।

गया की धरती मोक्ष भूमि कहलाती है। इस पितृ तीर्थ पर एक ऐसा स्थान है जो हिंदुओं के लिए स्वर्ग और मोक्ष के समान महत्व रखता है। धार्मिक दृष्टि से गया न सिर्फ हिंदुओं के लिए बल्कि बौद्ध धर्म मानने वालों के लिए भी गहरी आस्था का केंद्र है। हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक पूर्वजों को याद करने के साथ उन्हें श्रद्धा के साथ पिंडदान करने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। यही कार्न है कि श्राद्ध के समय में इस स्थान पर हर कोई अपने पितरों के लिए पिंडदान करता है। कहते हैं कि इस पवित्र तीर्थ स्थल पर पितृ के निमित्त किया गया श्राद्ध पितरों को मोक्ष दिलाता है। परंतु क्या आप जानते हैं कि यह तीर्थ स्थान क्यों इतना खास है? साथ ही किस वजह से यह धरती मोक्ष की भूमि कहलाती है? यदि नहीं! तो आगे इसे जानते हैं।

पुराणों के अनुसार गया एक राक्षस हुआ जिसका नाम गायसुर था। कहते हैं कि गायसुर को उसकी तपस्या के कारण वरदान मिला था कि जो भी उसे देखेगा या उसका स्पर्श करेगा उसे यमलोग नहीं जाना पड़ेगा। ऐसा व्यक्ति सीधे विष्णुलोक जाएगा। मान्यता है कि इस वरदान के कारण यमलोग सुना रहने लगा। इससे परेशान होकर यमराज ने जब ब्रह्मा, विष्णु और शिव से यह कहा कि गायसुर के कारण अब पापी व्यक्ति भी वैकुंठ जाने लगा है। इसलिए कोई उपाय कीजिए। यमराज की स्थिति को समझते हुए ब्रह्मा जी ने गायसुर से कहा कि ‘तुम परम पवित्र हो इसलिए देवता चाहते हैं कि हम आपकी पीठ पर यज्ञ करें।’

गायसुर इसके लिए तैयार हो गया। जिसके बाद गायसुर की पीठ पर सभी देवता स्थित हो गए। कहते हैं गायसुर के शरीर को स्थिर करने के लिए इसकी पीठ पर एक बड़ा सा पत्थर भी रखा गया था। यह पत्थर आज प्रेत शिला कहलाता है। गायसुर के इस समर्पण से विष्णु भगवान ने वरदान दिया कि अब से यह स्थान जहां उसके शरीर पर पत्थर रखा गया वह गया के नाम से जाना जाएगा। साथ ही यहां पर पिंडदान और श्राद्ध करने वाले को पुण्य और पिंडदान प्राप्त करने वाले को मुक्ति मिल जाएगी। यही कारण है कि गया को मोक्ष प्राप्ति का स्थान माना जाता है।

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