सद्गुरु जग्गी वासुदेव: इस एक घटना ने जग्गी वासुदेव का पूरा जीवन बदल दिया और वे बन गए सद्गुरु

सद्गुरु जब 25 साल के हुए, तब उन्होंने किसी असामान्य घटना के कारण अपने जीवन में सुखो का त्याग कर दिया था। उम्र के इस पड़ाव में उन्होंने चामुंडी पर्वत की चढ़ाई की और वहां किसी विशाल पत्थर पर जाकर बैठ गये। और वहां से उन्होंने आध्यात्मिक अनुभव लेना प्रारंभ किया।

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भारत ही नहीं विश्व भर में प्रसिद्ध सद्गुरु जग्गी वासुदेव एक योगी, रहस्यवादी, लेखक, कवी, दिव्यदर्शी और अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वक्ता है। इनके दुनिया भर में कई संख्या में फोलोअर्स मौजूद है। ये ईशा फाउंडेशन नामक लाभ-रहित मानव सेवा संस्थान के संस्थापक भी हैं। ईशा फाउंडेशन भारत समेत संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैंड, लेबनान, सिंगापुर और ऑस्ट्रेलिया में योग कार्यक्रम सिखाता है साथ ही कई सामाजिक और सामुदायिक विकास योजनाओं पर भी काम करता है। इसे संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक परिषद में विशेष सलाहकार की पदवी भी प्राप्‍त है। सद्गुरु ने 8 भाषाओं में 100 से अधिक पुस्तकों की रचना भी की है।

जग्गी वासुदेव जिन्हें दुनिया भर में सद्गुरु के नाम से जाना जाता है। इनका जन्म 5 सितंबर सन् 1957 को कर्नाटक राज्‍य के मैसूर शहर में हुआ था। बचपन से ही सद्गुरु को प्रकृति से काफी लगाव था। इन्हें प्रकृति से इतना प्यार था कि वे कुछ दिनों के लिये जंगल में गायब हो जाते थे और पेड़ की ऊँची डाल पर बैठकर हवाओं का आनंद लेते थे और गहरे ध्‍यान में चले जाते थे। मात्र ११ साल की उम्र से जग्गी वासुदेव ने योग का अभ्यास करना शुरु कर दिया था। इन्हें योग की शिक्षा श्री राघवेन्द्र राव से मिली।

सद्गुरु जब 25 साल के हुए, तब उन्होंने किसी असामान्य घटना के कारण अपने जीवन में सुखो का त्याग कर दिया था। उम्र के इस पड़ाव में उन्होंने चामुंडी पर्वत की चढ़ाई की और वहां किसी विशाल पत्थर पर जाकर बैठ गये। और वहां से उन्होंने आध्यात्मिक अनुभव लेना प्रारंभ किया। इस दौरान उन्हें कुछ अलग ही महसूस हुआ उन्हें लगा कि वह अपने शरीर में ही नहीं हैं, बल्कि हर जगह चट्टानों में, पेड़ों में, पृथ्वी में फैल गए हैं। उसके बाद उन्हें ऐसा अनुभव बार-बार हुआ। इस घटना से उनकी जीवन शौली पूरी तरह से बदल गई। इसी के चलते जग्गी वासुदेव ने उन अनुभवों को बाँटने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित करने का फैसला किया। इसके बाद तकरीबन 1 साल तक ध्यान और यात्रा करने के बाद उन्होंने अपने आंतरिक अनुभव को बांटकर लोगो को योगा सिखाने का मन बना लिया।

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