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नागा दीक्षा की परंपरा

नागा संन्यासियों के सात अखाड़ों में से केवल छह अखाड़ों श्री पंच दशनाम जूना अखाड़ा, श्री पंचायती आवाहन अखाड़ा, श्री पंचायती निरंजनी अखाड़ा, श्री पंचायती आनंद अखाड़ा, श्री पंचायती महानिर्वाणी अखाड़ा और श्री पंचायती अटल अखाड़ा में ही नागा संन्यासी बनाने की परंपरा है।

hinduकुंभ मेलों में आदि जगतगुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित दशनाम संन्यासी अखाड़ों की परंपरा में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण नागा संन्यासी के रूप में दीक्षित किए जाने की परंपरा है। फाइल फोटो।

कुंभ मेलों में आदि जगतगुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित दशनाम संन्यासी अखाड़ों की परंपरा में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण नागा संन्यासी के रूप में दीक्षित किए जाने की परंपरा है। यह केवल चार कुंभ नगरों हरिद्वार, उज्जैन, नासिक तथा प्रयागराज में कुंभ पर्व के अवसर पर ही आयोजित की जाती है। नागा संन्यासियों के सात अखाड़ों में से केवल छह अखाड़ों श्री पंच दशनाम जूना अखाड़ा, श्री पंचायती आवाहन अखाड़ा, श्री पंचायती निरंजनी अखाड़ा, श्री पंचायती आनंद अखाड़ा, श्री पंचायती महानिर्वाणी अखाड़ा और श्री पंचायती अटल अखाड़ा में ही नागा संन्यासी बनाने की परंपरा है।

दशनामी अखाड़ा से जुड़े श्री पंच अग्नि अखाड़ा में नागा संन्यासी बनने की परंपरा नहीं है। वह केवल ब्रह्मचारी ही दीक्षित करते है। अग्नि अखाड़े का कोई ब्रह्मचारी नागा संन्यासी बनना चाहे तो वह दशनाम नागा संन्यासियों के अन्य छह अखाड़ों में से किसी भी अखाड़े से नागा संन्यासी बनने की दीक्षा ले सकता है।

इस बार हरिद्वार कुंभ में दशनाम नागा संन्यासियों के दो अखाड़ों श्री पंच दशनाम जूना अखाड़ा और श्री पंचायती महानिर्वाणी अखाड़ा में नागा संन्यासी बनाए गए, जो आकर्षण का मुख्य केंद्र रहे। नागा संन्यासियों को संन्यास दीक्षा लेने से पहले मढ़ियों में पंजीकरण कराना आवश्यक है। नागा संन्यासी बनने के लिए जो आवेदन-पत्र आते हैं।

उनकी बहुत बारीकी से छानबीन की जाती है और अब उनकी वास्तविक पहचान की खोजबीन के लिए आधार कार्ड की छायाप्रति आवेदन के साथ जमा करवाई जाती है। जो आवेदन पत्र आते हैं, उनमें से किसे नागा संन्यासी की दीक्षा दी जाए इसके लिए वरिष्ठ संतों की एक समिति गठित की जाती है। यह समिति आवेदनों की पड़ताल कर नागा साधु की संन्यास दीक्षा देने के लिए योग्य पात्र का चयन करती है।

इस बार हरिद्वार कुंभ में श्री पंच दशनाम जूना अखाड़ा में एक हजार पुरुषों तथा 200 महिलाओं तथा श्री पंचायती महानिर्वाणी अखाड़ा में 75 पुरुषों को नागा साधु की दीक्षा दी गई। श्री पंच दशनाम जूना अखाड़ा के अंतरराष्ट्रीय संरक्षक श्री महंत हरि गिरि महाराज ने बताया कि नागा संन्यासी बनने के लिए कई कठिन परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है।

इसके लिए सबसे पहले नागा संन्यासी को ‘महापुरुष’ के रूप में दीक्षित कर अखाड़े में शामिल किया जाता है। तीन साल तक ‘महापुरुष’ के रूप में दीक्षित संन्यासी को संन्यास के कड़े नियमों का पालन करते हुए गुरु सेवा के साथ-साथ अखाड़े में विभिन्न कार्य करने पड़ते हंै। तीन वर्ष की कठिन साधना में खरा उतरने के बाद कुंभ पर्व पर उसे नागा साधु बनाया जाता है।

नागा संन्यास दीक्षा समारोह शुरू होने पर सबसे पहले सभी इच्छुक संन्यासी संन्यास लेने का संकल्प करते हुए पवित्र नदी में स्नान करते हैं और स्वयं के जीवित रहते हुए अपना श्राद्ध-तर्पण कर मुंडन कराते हैं। उसके बाद सांसारिक वस्त्रों का त्याग कर कोपीन दंड, कमंडल धारण करते हैं। इस प्रक्रिया के पूर्ण हो जाने के बाद रात भर धर्मध्वजा के नीचे विरजा होम संस्कार में सभी नागा संन्यासी भाग लेते हैं और पुरुष सुक्तके मंत्रों के उच्चारण के साथ आहूति देते हुए साधना करते हैं। यह समस्त प्रक्रिया अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर की देखरेख में संपन्न की जाती है।

प्रात:काल सभी संन्यासी पवित्र नदी तट पर संन्यास धारण करने का संकल्प लेते हुए डुबकी लगाते हैं और गायत्री मंत्र के जाप के साथ-साथ सूर्य, चंद्र, अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, दसों दिशाओं तथा सभी देवी-देवताओं को साक्षी मानते हुए स्वयं को संन्यासी घोषित कर जलाभिषेक करते हैं। इस प्रक्रिया के उपरांत अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर नव दीक्षित नागा संन्यासियों को एक विशेष प्रेयस मंत्र प्रदान करते हैं, जिसे नव-दीक्षित नागा संन्यासी तीन बार दोहराते हैं।

इन समस्त क्रियाओं से गुजरने के बाद गुरुअपने शिष्य की चोटी काटकर विधिवत अपना शिष्य बनाते हुए नागा संन्यासी घोषित करता है। चोटी कटने के बाद नागा शिष्य जल से नग्न अवस्था में बाहर आता है और अपने गुरु के साथ सात कदम चलने के बाद गुरुद्वारा दिए गए कोपीन दंड तथा कमंडल धारण कर पूर्ण नागा संन्यासी बन जाता है।

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