उत्तराखंड में देवी की शक्ति का रहस्य

टिहरी जिले में देवी मां का चंद्रबदनी मंदिर स्थित है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यहां पर सती के पार्थिव शरीर का धड़ का हिस्सा गिरा था, इसलिए इस मंदिर में सती के धड़ की पूजा की जाती है, लेकिन श्रद्वालुओं को धड़ के दर्शन नहीं कराए जाते हैं।

उत्तराखंड में स्थित चंद्रबदनी देवी का पीठ।

देवभूमि उत्तराखंड 52 शक्तिपीठों का उद्गम स्थल माना जाता है। देवभूमि उत्तराखंड के टिहरी जिले में एक साथ तीन शक्तिपीठ हैं। इन शक्तिपीठों के जीर्णोद्धार का कार्य आदि जगतगुरु शंकराचार्य ने अपनी हिमालय यात्रा के दौरान कराया था। उत्तराखंड में टिहरी जनपद ऐसा और एक मात्र स्थान है जहां पर तीन शक्तिपीठ स्थापित हैं।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार तीर्थनगरी हरिद्वार के कनखल में राजा दक्ष द्वारा कराए गए यज्ञ में शिव की पत्नी और राजा दक्ष की बेटी ने अपने पति का अपमान होने के बाद यज्ञ कुंड में आत्मदाह किया था। यज्ञ विध्वंस के बाद सती की पार्थिव देह लेकर भगवान शिव बेसुध स्थिति में जब विश्व भ्रमण को निकले तो भगवान विष्णु ने उन्हें इस अवस्था से मुक्ति दिलाने के लिए पार्थिव शरीर के टुकड़े अपने सुदर्शन चक्र से किए। जहां-जहां सती के देह के टुकड़े गिरे, वहां वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई।

कुंजापुरी शक्तिपीठ
टिहरी जिले के नरेंद्र नगर के पास स्थित पर्वतमाला में सती के कुंज यानी सिर के बाल गिरे थे तो यह स्थल पवित्रता में बदल गया और सिद्धपीठ मां कुंजापुरी तीर्थस्थल कहलाया जो 52 शक्तिपीठों में से एक सिद्धपीठ माना जाता है। यहां पर आज सिद्धपीठ मां कुंजापुरी का विशाल का मंदिर है, यहां हर साल चैत्र और शारदीय नवरात्रि पर राज्य सरकार द्वारा कुंजापुरी पर्यटन विकास मेले के नाम से मेला होता है।

सिद्धपीठ कुंजापुरी मंदिर में 1974 से मेला शुरू हुआ था जो आज भी जारी है। पर्यटन और प्राकृतिक सौंदर्य की दृष्टि से यह क्षेत्र तीर्थयात्रियों और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र तो है ही साथ में सिद्धपीठ साधकों के लिए भी मुख्य आकर्षण का केंद्र है। कई सिद्ध साधक यहां पर अपनी साधना को सफल बनाने के लिए कठोर तपस्या करते हैं। प्राकृतिक दृष्टि से बंदर पूंछ, चौखंबा, नीलकंठ, सुंरकंडा के विहंगम दृश्य यहां से देखने को मिलते हैं व धार्मिक स्थलों के दर्शन होते हैं। इससे सिद्ध पीठ कुंजापुरी मंदिर में सुबह शाम विधिवत पूजा की जाती है।

रोजाना प्रात:काल देवी को स्नान करवाने के बाद पूजा-अर्चना की जाती है। सिद्धपीठ मां कुंजापुरी प्रसिद्ध सिद्धपीठों में एक है। माता के प्रति लोगों को की इतनी अटूट श्रद्धा है कि दूरदराज क्षेत्रों से माता के दर्शन करने के लिए लोग यहां आते हैं। जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से माता के पास आता है उसकी सभी मनाकामनाएं पूर्ण होती है।

माता के कपाट वर्षभर श्रद्धालुओं के लिए खुले रहते हैं। यहां पर हर वर्ष नवरात्रि में नौ दिन का सिद्धपीठ कुंजापुरी पर्यटन व विकास मेले का आयोजन होता है। यह शिवालिक रेंज में 13 शक्तिपीठों में से एक है और जगदगुरु शंकराचार्य द्वारा टिहरी जिले में स्थापित तीन शक्तिपीठों में से एक है। जिले के अन्य दो शक्तिपीठों में एक सुरकंडा देवी का मंदिर और चन्द्रबदनी देवी का मंदिर है। कुंजापुरी, इन दोनों पीठों के साथ एक पवित्र त्रिकोण बनाता हैं। जो तंत्र साधना के उपासको के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

सुरकंडा मंदिर शक्तिपीठ
सुरकंडा मंदिर शक्तिपीठ टिहरी जिले के सुरकंडा पर्वत माला पर है। मान्यता है कि यहां पर जिस स्थान पर माता सती का सिर गिरा वह सिरकंडा कहलाया जो कालान्तर में सुरकंडा नाम से प्रसिद्ध हो गया। यह देवी के 52 शक्तिपीठों में एक पीठ मानी जाती है जो देवी की पूजा करने वालों के लिए श्रद्धा का सबसे बड़ा केंद्र है। नवरात्र में विशेष पूजा होती है।

चंद्रबदनी देवी मंदिर शक्तिपीठ
टिहरी जिले में देवी मां का चंद्रबदनी मंदिर स्थित है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यहां पर सती के पार्थिव शरीर का धड़ का हिस्सा गिरा था, इसलिए इस मंदिर में सती के धड़ की पूजा की जाती है, लेकिन श्रद्वालुओं को धड़ के दर्शन नहीं कराए जाते हैं। चंद्रबनी मंदिर देवप्रयाग से हिंडोलाखाल और नरेंद्रनगर मार्ग पर स्थित है। तंत्र साधकों के लिए यह विशेष स्थान रखता है।

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