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प्रवर्तक: स्वामी रामानंदाचार्य हैं समरसता के सेतु

रामानंदाचार्य ऐसे गुरु थे, जिन्होंने जन्म सत्ता की बजाय व्यक्ति सत्ता को महत्त्व दिया। भारतीय समाज को एकजुट करके एक ऐसी राह दिखाई, जिस पर देश आज भी चल रहा है।

Author Updated: February 1, 2021 8:36 AM
Religionस्वामी रामानंदाचार्य भारतीय धर्म पताका को लहराने वाले शीर्ष धर्म गुरु रहे हैं। फाइल फोटो।


शास्त्री कोसलेंद्रदास

छह शताब्दियों पहले बनारस के एक जुलाहे कबीर को एक गुरु की तलाश थी। कबीर के मन में काशी के श्रीमठ में रहने वाले स्वामी रामानन्द को गुरु बनाने की इच्छा जागी। तब स्वामी रामानंद बनारस ही नहीं बल्कि देश-दुनिया के जाने-माने संत थे। उनके हजारों शिष्य थे। उनका रहन-सहन सरल और सहज था। उनका आध्यात्मिक-सामाजिक दायरा विशाल और जात-पांत से परे था।

कबीर जानते थे कि अलसुबह आचार्य रामानंद गंगा स्नान करने के लिए श्रीमठ से पंचगंगा घाट की सीढियां उतरते हैं। कबीर उन्हीं सीढि?ों पर जा लेटेँ स्नान के लिए गंगा घाट उतरे स्वामी रामानंद का पांव कबीर पर पड़ा। बहुत अफसोस और अपराधबोध के साथ रामानंद ने झुककर कबीर को उठाया और कहा, राम-राम बोलो, तुम्हारा सारा दुख दूर होगा।

मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के प्रवर्तक

स्वामी रामानंद ऐसे अद्भुत गुरु थे, जिन्होंने जातियों और वर्गों के खेमों में बंटे भारतीय समाज में उद्घोष किया -जात-पांत पूछे नहीं कोई, हरि को भजे से हरि का होई। यही कारण है कि संत कबीर की भक्ति संवेदना में गुरु रामानंद का स्थान गोविंद से भी बड़ा है। कबीर जब कभी स्वामी रामानंद को याद करते हैं तो वे उनका नाम बड़े गौरव और श्रद्धा से लेते हैं – कहै कबीर दुविधा मिटी गुरु मिल्या रामानंद। सत्रहवीं सदी में हुए इतिहासकार मुहसिन फनी ने अपनी पुस्तक दबिस्तां-ए-मजाहिब में लिखा है कि कबीर जन्म से मुसलमान थे पर वे स्वामी रामानंद के शिष्य बनना चाहते थे क्योंकि रामानंद राम को जानते थे।

जातिसत्ता पर गहरी चोट

स्वामी रामानंद की शिष्य मंडली में कपड़े बुनने वाले कबीर ही नहीं बल्कि उसमेंं चर्मकार रैदास भी शामिल थे। वहांं धन्ना जाट थे तो संत सेन नाई थे। पीपा दर्जी, सदन कसाई, कूबा कुम्हार समेत अनेक उन जातियों के संत-भक्त-कवि रामानंद के चलाए संप्रदाय के हिस्से थे, जो राम-राम की गुंजार फैलाकर समाज में जातिसत्ता पर गहरी चोट मार रहे थे।

जन्म सत्ता के बजाय व्यक्ति सत्ता

रामानंदाचार्य ऐसे गुरु थे, जिन्होंने जन्म सत्ता की बजाय व्यक्ति सत्ता को महत्त्व दिया। भारतीय समाज को एकजुट करके एक ऐसी राह दिखाई, जिस पर देश आज भी चल रहा है। ऊंच-नीच को न मानने वाला भारतीय संविधान तो बाद में बना लेकिन स्वामी रामानंद ने यह नींव 14वीं सदी में ही रख दी थी, जिसे मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के नाम से जाना जाता है।

उन्होंने अपने प्रवचन और लेखन का आधार संस्कृत के साथ देशज भाषाओं को बनाया। अपने संस्कृत ग्रंथ वैष्णव-मताब्ज-भास्कर में उन्होंने घोषणा ही कर दी कि भगवान अपनी भक्ति में जीवों की जाति, बल और शुद्धता की अपेक्षा नहीं करते। सभी समर्थ और असमर्थ जीव भगवान को पाने में समान अधिकारी हैं।


निर्गुण तथा सगुण रामभक्ति परंपरा का श्रीमठ –

रामानंदाचार्य का श्रीमठ निर्गुण तथा सगुण रामभक्ति परंपरा का मूल केंद्र है। कालांतर में इसकी हर शाखा ने वृक्ष का रूप ले लिया और मूल मरता चला गया। विडंबना है कि आज इनमें से कोई परंपरा शायद ही श्रीमठ में खुद को ढूंढ?ा चाहती हो। यह श्रीमठ की समस्या है जिसे अग्रणी संत हल करेंगे। जिस बात पर विवाद है वह यह है कि श्रीमठ को कब व किसने बनाया? कुछ इसे रामानंद का बनाया मानते हैं।

जिस बात पर कोई विवाद नहीं है, वह यह है कि श्रीमठ मध्यकालीन भक्ति आंदोलन का सबसे बड़ा केंद्र था। संत साहित्य के विद्वान सुखदेव सिंह इसे मध्यकालीन भारत की सबसे बड़ी आध्यात्मिक पहचान मानते हैं। रिचर्ड बर्गट ने अपने शोध में पाया था कि आज के उत्तर भारत जो हिंदू धर्म है, उसे ह्यरामानंदी हिंदू धर्मह्ण कहना चाहिए। क्योंकि यदि रामानंद न होते तो इसका अस्तित्व बचे रहना मुश्किल था। आचार्य रामानंद का चलाया हुआ संप्रदाय जातीय आधार पर टूट रहे समाज के बीच एक सेतु है। जहां छुआछूत और खान-पान में कोई भेद नहीं है।

स्वामी भगवदाचार्य के जमाने में 1942 में महात्मा गांधी ने श्रीमठ को ह्यसामाजिक समावेशीह्ण की संज्ञा दी थी। रामानंद का वह विशाल आनंद वन श्रीमठ अब बहुत थोड़ा-सा रह गया है। आश्चर्य कि बात है कि स्वामी रामानंद का वह विशाल श्रीमठ, जहां हजारों फकीर, सैंकड़ों जंगम-जोगड़े, नाथपंथी, वैरागी और संन्यासी रहा करते थे, वहां अब लोगों के घर हैं, तरह-तरह के पड़ाव हैं, मस्जिदें हैं, दुकानें हैं, लोगों के घर हैं। काशी में श्रीमठ के नाम से बहुत जरा-सी पुण्य भूमि बची हुई है, जहां अभी इस संप्रदाय के प्रधान स्वामी रामनरेशाचार्य रहते हैं।

विसंगतियां दूर करने की जरूरत

जिस तत्परता और आसानी से रामानंदाचार्य ने अपने समय में धर्म और धार्मिक चेतना से उस समय के समाज की विसंगतियां दूर की, उसकी आज जरूरत है। मानवता को आधार बनाकर गंदे तथा नकारात्मक विचारों और सांप्रदायिकता के विरुद्ध एक आंदोलन खड़ा करने की जरूरत है। आज क्या पर्याप्त कारण नहीं हैं, धर्म, संस्कृति और राष्ट्र के अंत:संबंधों को केंद्र में रखकर फिर से भक्ति आंदोलन को पुन: परिभाषित करने की? आवश्यकता है एक भाषा, एक मनोवृत्ति और प्रतिबद्धता की, जो परस्पर विरोधी धाराओं को इकट्ठा करके स्वामी रामानंद की तरह रामभक्ति के महासागर में समेट सके।

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