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तीर्थस्थल: शिवशक्ति का प्रतीक नीलकंठ महादेव मंदिर

हरिद्वार में गंगा की नीलधारा के तट पर स्थित कजरी वन क्षेत्र की नील पर्वतमाला का शिव और पार्वती से गहरा नाता है। पर्वतमाला में शिव का नील नाम का राक्षस भक्त रहता था जिसने कजरी वन में शिव की कठोर तपस्या साधना की थी। शिव ने राक्षस की साधना से प्रसन्न होकर कजरी वन में स्वयंभू शिवलिंग की स्थापना की थी।

Author Updated: February 1, 2021 8:32 AM
नीलकंठ महादेव मंदिर। फाइल फोटो।

सुनील दत्त पांडेय

भारतीय धर्म ग्रंथों के अनुसार सुर और असुरों ने जन कल्याण के लिए समुद्र मंथन किया था। समुद्र मंथन में 14 किस्म के रत्न और विष भी निकला। विष से घबराए देवी-देवता और असुर भगवान शंकर के निवास स्थान हिमालय स्थित कैलाश पर्वत पहुंचे जहां समाधि में लीन शिव की उन्होंने कठोर साधना की। शिव ने आने का कारण पूछा और वरदान मांगने के लिए कहा।

उन्होंने विष के प्रभाव से ब्रह्मांड को बचाने का निवेदन भगवान आशुतोष से किया। भगवान शिव ने विष पी लिया। कंठ में विष धारण करने के कारण भगवान शिव नीलकंठ कहलाए। शिव ने विष को निष्प्रभावी बनाने के लिए कजरी वन की पर्वतमाला में गंगा स्नान किया। विष के प्रभाव से गंगा की धारा व कजरी वन की पर्वत शृंखला नीली पड़ गई और हरिद्वार में प्रवाहित हो रही गंगा की यह धारा नीलधारा के नाम से प्रसिद्ध हो गई। गंगा की है पवित्र पावन धारा आदि श्री दक्षिण काली पीठ चंडीघाट से होती हुई श्यामपुर कांगड़ी के क्षेत्र तक प्रवाहित होती है।

मणि कूट पर्वत पर स्थित नीलेश्वर महादेव मंदिर की भी परिक्रमा महाशिवरात्रि के समय की जाती है। नीलकंठ महादेव मंदिर की पूजा-अर्चना और प्रबंधकीय व्यवस्था दशनाम नागा संन्यासी संप्रदाय के श्री पंचायती महानिर्वाणी अखाड़ा द्वारा की जाती है। श्री पंचायती महानिवार्णी अखाड़ा के सचिव श्री महंत रविंद्र पुरी महाराज बताते हैं कि नीलकंठ महादेव मंदिर में सावन के महीने और हर महीने सोमवार, प्रदोष तथा महाशिवरात्रि के दिन बहुत बड़ा मेला लगता है। नीलकंठ महादेव मंदिर के सामने पर्वतमाला पर शिव की पत्नी पार्वती शक्ति के रूप में विराजती हैं। इस तरह उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल स्थित मणिकूट पर्वतमाला पर शिव शक्ति की पूजा एक साथ की जाती है जो भक्तों के लिए आकर्षण का केंद्र है।

कजरी वन का महत्त्व
हरिद्वार में गंगा की नीलधारा के तट पर स्थित कजरी वन क्षेत्र की नील पर्वतमाला का शिव और पार्वती से गहरा नाता है। पर्वतमाला में शिव का नील नाम का राक्षस भक्त रहता था जिसने कजरी वन में शिव की कठोर तपस्या साधना की थी। शिव ने राक्षस की साधना से प्रसन्न होकर कजरी वन में स्वयंभू शिवलिंग की स्थापना की थी। मान्यता यह है कि शिव नीलेश्वर महादेव के रूप में विराजते हैं। यहां शिव पार्वती के रूप में गौरी शंकर महादेव का मंदिर कजरी वन के नील पर्वत की तलहटी पर स्थित है और यहां पर गौरीकुंड स्थित है जहां पर पार्वती स्नान करने आती हैं।

नील पर्वत की चोटी पर देवी चंडी रूप में विराजमान हैं जिन्होंने झंडू और मुंड नाम के राक्षसों का संहार किया था और पार्वती चंडी देवी मां के रूप में शिला के खंभे से प्रकट हुई थी। आदि जगतगुरु शंकराचार्य ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। इस पर्वतमाला में चंडी देवी मंदिर के पास हनुमान जी की माता जी अंजनी माई का पौराणिक मंदिर है। नील पर्वत पर मां चंडी, मां पार्वती, मां अंजनी और शिव का निवास स्थान है। इसलिए नील पर्वत अत्यंत पवित्र और दुर्लभ पर्वत माना जाता है जहां शिव और पार्वती अपने विभिन्न रूपों में विराजते हैं। पूर्व जन्म में पार्वती ने राजा दक्ष के यहां कनखल में सती के रूप में जन्म लिया था और भगवान शंकर की कैलाश पर्वत से बारात कनखल के लिए प्रस्थान की थी। तब नीलपर्वत की तलहटी पर स्थित गौरी शंकर महादेव मंदिर में शिव की बारात का जनवासा बनाया गया तो शंकर ने यहां अपने विवाह से पूर्व गौरी शंकर महादेव के रूप में शिवलिंग की स्थापना की थी। यह शिवलिंग श्वेत रंग का है और सतयुग काल का माना जाता है। यहां पर शिव का धुना शिव भक्तों के आकर्षण का केंद्र है। गौरी शंकर महादेव में शिव और शक्ति दोनों की पूजा एक साथ एक शिवलिंग में की जाती है।

चंडी देवी मंदिर के मुख्य पुजारी महंत रोहित गिरी का कहना है कि नील पर्वत देवी और शिव के साधकों के लिए महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है जब शिवजी की पत्नी सती अपने पिता राजा दक्ष के यहां बिन बुलाए यज्ञ के आयोजन में पहुंची थी। तब शिव नील पर्वतमाला में स्थित नीलेश्वर महादेव मंदिर में रुक गए थे और यहीं से उन्होंने यज्ञ के विनाश का दृश्य देखा था और सती के यज्ञ कुंड में आत्मदाह करने के बाद उन्होंने इसी पर्वतमाला माला पर अपनी जटाएं पटकी थीं और वीरभद्र नाम के उनके गण प्रकट हुए थे जिन्होंने भगवान शंकर के ससुर और सती के पिता राजा दक्ष की गर्दन काट कर यज्ञ कुंड में डाल दी थी। इस यज्ञ कुंड में सती ने आत्मदाह किया था। इस पर्वतमाला का शिव, सती, पार्वती, अंजनी माता, हनुमान जी और वीरभद्र से गहरा नाता रहा है।

वैष्णव संप्रदाय के संत गौरी शंकर महादेव मंदिर और निलेश्वर महादेव मंदिर के मुख्य पुजारी श्रीमहंत प्रेमदास महाराज कहते हैं कि यह समस्त नील पर्वत शैव मतालंबियों के साथ-साथ भगवान श्री राम के अनुयायी वैष्णव संप्रदाय के साधकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र रहा है। गौरी शंकर महादेव और नीलकंठ महादेव के मंदिरों के संचालन और अन्य पूजा अर्चना की व्यवस्था वैष्णव संप्रदाय के संत करते हैं।

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