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जीवन-जगत: निर्विशेष बनना असली आध्यात्मिक साधना है

निर्विशेष बनकर ही कोई स्थितप्रज्ञ की स्थिति में आ सकता है जो कृष्ण ने गीता में पुकार कर कहा कि हानि-लाभ, दुख-सुख, यश-अपयश यह तो आएंगे ही, पर तू अपने में स्थित रह।

Author Updated: February 1, 2021 8:34 AM
Religionआध्‍यात्मिकसाधन और मानवजीवन ।

राधिका नागरथ

नया का सारा झगड़ा झंझट ही विशेष बनने में है। मैं उस पार्टी में गई। मुझे लोगों ने पूछा नहीं, मेरा विशेष सम्मान होना चाहिए था जो हुआ नहीं, किसी दूसरे का हुआ तो परेशानी हो गई। मैं बहुत वरिष्ठ हूं, उम्र में और अनुभव में भी इसलिए आस-पड़ोस के लोगों को मेरी इज्जत करनी चाहिए और जहां किसी ने अनदेखा किया तो हम को चोट पहुंच जाती है। कितना नाजुक खुद को बना लिया है इस विशेष बनने की चाह में हमने। निर्विशेष होकर रहना, अपनी मौज में रहना और उस आनंद को प्रकट करना, जो मैं हूं, यही असली आध्यात्मिक साधना है।

निर्विशेष बनकर ही कोई स्थितप्रज्ञ की स्थिति में आ सकता है जो कृष्ण ने गीता में पुकार कर कहा कि हानि-लाभ, दुख-सुख, यश-अपयश यह तो आएंगे ही, पर तू अपने में स्थित रह। विशेष तो हम हैं ही, आत्मा के नाते, विशेष बनने की क्या जरूरत है? विशेषता का बिल्ला लगाने की जरूरत नहीं है कि मैं विशेष हूं, उच्च हूं, माननीय हूं, सम्मानित हूं।

संसार में किस तरह रहना है यह आंखों से सीख सकते हैं। आंखों के सामने बहुत सुंदर रंग आए या काला-सफेद रहे, उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। वह खून देखें या गुलाब का फूल, वह साक्षी है उन्हें कोई फर्क नहीं। जितनी ज्यादा उपाधियां, जितनी ज्यादा पसंद, उतना ज्यादा दुख। तनिक गौर से सोचे तो दुख किसको होता है, यह जानना भी जरूरी है।

हमारा अधिकार इस पर नहीं है कि दुख क्यों होता है बल्कि यह जानने पर कि दुख किसको होता है। दुख क्यों होता है -क्योंकि वह एक प्रक्रिया है-मानव जन्म हुआ है तो वह देह छोड़ेगा ही। संसार में आए हैं, तो सुख-दुख दोनों को भोगोगे ही, लेकिन यह जानना कि दुख किसको हुआ-यह तो दुख का निवारण बन सकता है, यह कहकर तो हम केवल प्रश्न और उत्तर मैं ही उलझे रहेंगे क्योंकि क्यों का कोई जवाब नहीं है।
रोज इतने लोग मरते हैं कभी बाढ़ से, कभी भूकंप से, लेकिन इन प्राकृतिक आपदा से मरने वालों के लिए हम नहीं रोते और तो और बहुत बार यूं भी कह देते हैं की ऐसी खबरें सुनकर तो मन खराब होता है, ना ही सुनो और यही अगर अपने मोहल्ले में कोई मौत हो तो हमें थोड़ा ताल्लुक होता है। हम पूछने जाते हैं और शायद उसकी चर्चा भी करते हैं कुछ देर ।

लेकिन खाना पीना, सब काम, कोई रुकता नहीं है और वही मौत जब किसी अपने की हो जाए, तो उस दिन गले के नीचे निवाला नहीं उतरता। मरने वाला इनसान ही था पर तीनों स्थिति में हमारी स्थिति अलग थी। जब वह किसी भी देश के किसी कोने में मरता है तो हमें कोई फर्क नहीं पड़ता, जब वह अपने मोहल्ले में मरता है तो थोड़ा फर्क पड़ता है, जब अपना मरता है तो बहुत फर्क पड़ता है।

तो दुखी होने वाला कौन है? मैं तो वही का वही हूं किंतु मेरे से संबंध दुख का कारण है। यदि वह मेरा है तो दुख है, यदि वह मेरा नहीं है तो कोई दुख नहीं है। यह बात अगर हमेशा ध्यान में रहे की मैं एक स्त्री या पुरुष हूं तो कोई दुख नहीं है, किंतु अगर मैं मां हूं, पत्नी हूं, बच्ची हूं, सखा हूं, तो दुख है। इसलिए दुखी कौन हुआ? दुखी पत्नी होती है, मां होती है, बेटी होती है किंतु स्त्री नहीं होती। या यूं कहो- इंसान दुखी नहीं होता, रिश्ता दुखी होता है और अगर यह बात समझ में आ जाए -क्या रिश्ता सदा था या रहेगा, तो दुख नहीं होगा। यह तो प्रकृति का नियम है।

आज जिससे हम बहुत खुशी महसूस करते हैं कल उससे उतना ही दुख महसूस करेंगे क्योंकि यही प्रकृति का नियम है, तो फिर यह जानकर साक्षी भाव से जिया जा सकता है। स्वामी अनुभवानंद कहते हैं कि बार-बार मन को समझाना कि मैं कौन हूं, अगर मैं आत्मा हूं तो सदा आनंद स्वरूप हूं और अगर मैं खुद को एक रिश्तेदार ही मानूं तो सदा सुख-दुख में झूलता रहूं।

चुनाव हमारे हाथ में है- सदा आनंद में रहना या झूठे रिश्तों में खुद को उलझा रखना। इस बात से डरने की जरूरत नहीं है कि अगर हम आनंद स्वरूप, आत्मस्वरूप में रहेंगे तो समाज से कट जाएंगे, दुनिया हमें पागल कहने लगेगी कि हम पर असर नहीं होता। ऐसा कदापि नहीं है। हमारे क्रियाकलाप सब ऐसे ही होते रहेंगे, उसी तरह शादी ब्याह में जाना, उसी तरह श्मशान में संस्कार करना, किंतु अंदर से हम संभले रहेंगे, शांत रहेंगे, विचलित नहीं होंगे। हर स्थिति को एक कुशल प्रबंधक की तरह संभाल सकेंगे, यही जीवन का सफल और उच्च प्रबंधन है।

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