Krishna Janmashtami 2026 Vrat Kholne Ka Samay, Puja Vidhi, Shubh Muhurat: आज देश के साथ-साथ दुनियाभर में श्री कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व धूमधाम और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। शास्त्रों के अनुसार, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान विष्णु के आठवें अवतार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। इसी कारण हर साल इस दिन घरों से लेकर मंदिरों तक कान्हा का जन्मोत्सव हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव आधी रात यानी 12 बजे मनाया जाता है।
ऐसे में भक्त पूरे दिन उपवास रखकर कान्हा की भक्ति में लीन रहते हैं और मध्यरात्रि में विधिवत पूजा-अर्चना कर भगवान का जन्मोत्सव मनाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, किसी भी व्रत को रखने के बाद विधि-विधान से उसका पारण करना आवश्यक माना जाता है। ऐसा करने से व्रत पूर्ण होता है और पूजा का पूरा फल प्राप्त होता है। आइए जानते हैं जन्माष्टमी पर किस शुभ मुहूर्त में और किस विधि से व्रत का पारण करना चाहिए…
जन्माष्टमी व्रत पारण का शुभ मुहूर्त (Krishna Janmashtami 2026 Shubh Muhurat)
पंडित केपी शुक्ल के अनुसार, जन्माष्टमी के दिन दिनभर व्रथ रहने के बाद साधक रात को ही कान्हा का जन्मोत्सव मनाने के साथ व्रत का पारण कर लेते हैं, तो कई लोग अगले दिन अष्टमी तिथि समाप्त होने के बाद करतेहैं।
जन्माष्टमी 2026 व्रत पारण का समय- 5 सितंबर को 06:01 ए एम के बाद
वर्तमान में समाज में प्रचलित पारण समय – रात को 12:43 ए एम के बाद
ऐसे करें जन्माष्टमी के व्रत का पारण (Krishna Janmashtami 2026 Paran Vidhi)
श्री कृष्ण जन्माष्टमी के दिन कई साधक फलाहारी व्रत रखते हैं। अगर आपने भी श्री कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत रखा हैं, तो रात को कान्हा का धूमधाम से जन्मोत्सव मनाने के साथ व्रत का पारण अवश्य करें। अगर आप व्रत का पारण कर रहे हैं, तो प्रसाद खाकर करें। ऐसे में आप प्रसाद में पंजीरी, आटा के पुए या फिर माखन खाकर कर सकते हैं। इसके अलावा अगर आप सुबह के समय पारण कर रहे हैं, तो नित्य कामों से निवृत्त होकर स्नान कर लें। इसके बाद कान्हा की विधिवत पूजा कर लें। इसके उपरांत सात्विक भोजन या फिर प्रसाद खाकर अपना व्रत खोल लें। इस बात का ध्यान रखें कि अपना व्रत लहसुन, प्याज या फिर मांसाहार के साथ न खोलें।
जन्माष्टमी पर करें श्री कृष्ण मंत्रों का जाप
1- ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।
प्रणतः क्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः॥
2- कृष्णाय वासुदेवाय देवकीनन्दनाय च ।
नन्दगोपकुमाराय गोविन्दाय नमो नमः ॥
3- अधरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसितं मधुरं।
हृदयं मधुरं गमनं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं॥
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