Krishna Janmashtami 2026 Shubh Muhurat, Nal Chhedan Vidhi: आज देशभर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व मनाया जा रहा है। श्री कृष्ण जन्माष्टमी के दिन कान्हा का जन्मोत्सव हर साल भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र में आधी रात को मनाया जाता है। यह पर्व भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्री कृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। द्रिक पंचांग के अनुसार इस वर्ष भगवान कृष्ण का 5253वां जन्मोत्सव मनाया जा रहा है।
Janmashtami 2026 LIVE Muhurat Puja Vidhi, Mantra
जन्माष्टमी के खास मौके पर मथुरा, वृंदावन, इस्कॉन मंदिरों के साथ अन्य कृष्ण मंदिरों में धूमधाम से उत्सव मनाया जाता है। इस दिन भक्त दिनभर व्रत रखते हैं और कान्हा का जन्मोत्सव मनाने के साथ व्रत खोलते हैं। आइए जानते हैं कि कृष्ण जन्माष्टमी पर किस समय करें कान्हा की पूजा, मुहूर्त, नाल छेदन का विधि, मंत्र, पारण का समय और आरती…
कृष्ण जन्माष्टमी 2026 शुभ मुहूर्त (Krishna Janmashtami 2026 Shubh Muhurat)
द्रिक पंचांग के अनुसार, भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की तिथि 4 सितंबर को रात 2 बजकर 25 मिनट पर शुरू हो चुकी है, जो कि 5 सितंबर की रात 12 बजकर 13 मिनट पर समाप्त होगी।
श्रीकृष्ण की पूजा का मुहूर्त- रात 11 बजकर 57 मिनट से लेकर 12 बजकर 42 मिनट तक
अवधि – 45 मिनट
जन्माष्टमी पर रोहिणी नक्षत्र का समय
रोहिणी नक्षत्र आरंभ – 04 सितंबर 2026 को 12:29 ए एम बजे
रोहिणी नक्षत्र समाप्त – 4 सितंबर 2026 को 11:04 पी एम बजे
जन्माष्टमी पर ऐसे करें लड्डू गोपाल की पूजा
श्री कृष्ण जन्माष्टमी की पूजा के दिन अपने पूजा घर को अच्छी तरह से सजाएं और विधिवत पूजा करें। जन्माष्टमी को मध्यरात्रि के समय लड्डू गोपाल को पंचामृत से स्नान के बाद साफ जल, गंगाजल से स्नान कराएं। इसके बाद भगवान कृष्ण को पीले वस्त्र, आभूषण, मुकुट, मोरपंख करने के साथ संपूर्ण श्रृंगार कर लें। इसके बाद फूल, माला आदि अर्पित करें। इसके बाद भोग में धनिया की पंजीरी, माखन-मिश्री, तुलसी दल आदि से भोग लगाएं। इसके साथ कृं कृष्णाय नम: मंत्र का जप करें। फिर धूप-दीप जलाकर आरती करें। पूजा करने के बाद कान्हा को पालने में विराजमान करें और जयकारे लगाते हुए झूला झुलाएं। इसके साथ ही भजन-कीर्तन करने के साथ ‘नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की’ का जयघोष करें।
जन्माष्टमी पर चांद कब निकलेगा (Janmashthami 2026 Moon Rise)
नई दिल्ली चंद्रोदय समय – 11:29 PM
मथुरा -वृंदावन चंद्रोदय समय – 11:30 PM
नोएडा चंद्रोदय समय – 11:28 PM
चेन्नई चंद्रोदय समय – 11:56 PM
जयपुर चंद्रोदय समय – 11:40 PM
पुणे चंद्रोदय समय – 12:10 AM, सितम्बर 05
हैदराबाद चंद्रोदय समय – 11:53 PM
गुरुग्राम चंद्रोदय समय – 11:30 PM
चण्डीगढ़ चंद्रोदय समय – 11:24 PM
कैसे करें खीरे से नाल छेदन
जन्माष्टमी के दिन शुभ मुहूर्त में रात को खीरा से नाल छेदन करना शुभ माना जाता है। इसके लिए करीब 7 बजे एक टोकरी या बर्तन को पीले रंग या कोई अन्य कपड़ा बिछा दें। इसके बाद इसमें फूल आदि रखकर उसके ऊपर लड्डू गोपाल रख दें। फिर इसे फूलों से ढक दें और बगल में खीरा रख दें। अगर डंठल के साथ खीरा है, तो ज्यादा बेहतर है। इसके बाद इसे कपड़े से ढक दें। रात को 12 बजे कान्हा जी को टोकरी से निकाले। इसके बाद खीरा के ऊपर सिरे को एक सिक्के से काट कर कान्हा का नाल छेदन करें। इसके बाद कृष्ण को अभिषेक करने के साथ-साथ विधिवत पूजा करें। खीरे से नाल छेदन करने की विधि में शहर, क्षेत्र के हिसाब से अलग हो सकती है।
जन्माष्टमी में खीरा का महत्व
जन्माष्टमी पर कान्हा के जन्मोत्सव पर की जा रही परंपराओं में से एक खीरे से नाल छेदन करना भी है। बता दें कि खीरे को एक गर्भनाल के प्रतीक में इस्तेमाल किया जाता है। जैसे एक मां की कोख से बच्चे के जन्म के बाद मां से अलग करने के लिए ‘गर्भनाल’ को काटा जाता है। उसी तरह खीरे और उससे जुड़े डंठल को ‘गर्भनाल’ माना काटा जाता है, जो कृष्ण को मां देवकी से अलग करने के लिए काटे जाने का प्रतीक है। इसके अलावा खीरा बीज से भरा होता है, जिसे गर्भ का प्रतीक माना जाता है। इसे काटने के साथ ये दर्शाता है कि कान्हा का जन्म हो चुका है।
श्री कृष्ण की आरती (Shri Krishna Aarti)
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की
गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला।
श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला।
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली।
लतन में ठाढ़े बनमाली; भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक,
ललित छवि श्यामा प्यारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की।
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं।
गगन सों सुमन रासि बरसै; बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालिन संग;
अतुल रति गोप कुमारी की॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
जहां ते प्रकट भई गंगा, कलुष कलि हारिणि श्रीगंगा।
स्मरन ते होत मोह भंगा; बसी सिव सीस, जटा के बीच, हरै अघ कीच;
चरन छवि श्रीबनवारी की॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू।
चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू; हंसत मृदु मंद,चांदनी चंद, कटत भव फंद।।
टेर सुन दीन भिखारी की॥ श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
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