Janmashtami 2026: आज देशभर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व मनाया जा रहा है। आज भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्री कृष्ण का जन्मोत्सव है। शास्त्रों के अनुसार, भाद्रपद मास से कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र को आधी रात पर लड्डू गोपाल का जन्म हुआ है। आज श्री कृष्ण का जन्मोत्सव मनाने के साथ उनकी बाल लीलाओं का स्मरण करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि श्री कृष्ण के जन्म के समय पूरे ब्रह्मांड में क्या बदलाव देखने को मिले थे। श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध में भगवान कृष्ण के प्राकट्य को लेकर विस्तार से बताया गया है। बता दें कि ये केवल कान्हा के दन्म की कथा नहीं है बल्कि उस दिव्य क्षण का वर्णन है जब भगवान श्रीकृष्ण ने अधर्म से पीड़ित पृथ्वी पर अवतार लिया। आइए ‘धर्म गाथा’ श्रृंखला में जानिए श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध में वर्णित उसी अलौकिक प्रसंग के बारे में…
क्यों लिया था श्री कृष्ण ने जन्म
श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध के अनुसार, जब धरती पर कंस के अत्याचार बढ़ गए थे, तो अधर्म के नाश के लिए श्री कृष्ण का जन्म हुआ था। पुराण के अनुसार, जब अधर्म और अत्याचार बढ़ने लगा, तो देवताओं ने भगवान की शरण ली। पृथ्वी भी गौ का रूप धारण कर देवताओं के साथ ब्रह्मा जी के पास पहुंची। देवताओं ने भगवान से पृथ्वी का भार कम करने की प्रार्थना की। इसके बाद भगवान विष्णु ने देवकी के गर्भ से श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लेने का संकल्प किया।
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जब श्रीकृष्ण के जन्म से पहले इस तरह बदलने लगा प्रकृति का स्वरूप
श्रीशुक देवजी कहते हैं कि परीक्षित, अब समस्त शुभ गुणों से युक्त बहुत सुहावना समय आया। रोहिणी नक्षत्र था। आकाश के सभी नक्षत्र, ग्रह और तारे शान्त-सौम्य हो रहे थे। दिशाएं स्वच्छ प्रसन्न थीं। निर्मल आकाश में तारे जगमगा रहे थे। पृथ्वी के बड़े-बड़े नगर, छोटे-छोटे गांव, अहीरों की बस्तियां और हीरे आदि की खाने मंगलमय हो रही थीं।
नदियों का जल निर्मल हो गया था। रात्रि के समय भी सरोवरों में कमल खिल रहे थे। वन में वृक्षों की पंक्तियां रंग-बिरंगे पुष्पों के गुच्छों से लद॒ गयी थीं । कहीं पक्षी चहक रहे थे, तो कहीं भौरे गुनगुना रहे थे। उस समय परम पवित्र और शीतल मंद सुगंध वायु अपने स्पर्श से लोगों को सुख दान करती हुई बह रही थी। ब्राह्मणों के अग्निहोत्र की कभी न बुझने वाली अग्नियां जो कंस के अत्याचार से बुझ गई थीं, वे इस समय अपने-आप जल उठीं।
संत पुरुष पहले से ही चाहते थे कि असुरों की बढ़ती न होने पाए। अब उनका मन सहसा प्रसन्नता से भर गया। जिस समय भगवान के आविर्भाव अवसर आया, स्वर्ग में देवताओं की दुन्दुभियां अपने-आप बज उठीं। किन्नर और गंधर्व मधुर स्वर में गाने लगे तथा सिद्ध और चारण भगवान के मंगलमय गुणों की स्तुति करने लगे। विद्याधरियां अप्सराओं के साथ नाचने लगीं। बड़े-बड़े देवता और ऋषि-मुनि आनन्द से भरकर पुष्पों की वर्षा करने लगे। जलसे भरे हुए बादल समुद्र के पास जाकर धीरे-धीरे गर्जना करने लगे।
जन्म-मृत्यु के चक्र से छुड़ाने वाले भगवान जनार्दन के अवतार का समय था निशीथ। चारों ओर अंधकार का साम्राज्य था। उसी समय सबके हृदय में विराजमान भगवान विष्णु देवरूपिणी देवकी के गर्भ से प्रकट हुए, जैसे पूर्व दिशा में सोलहों कलाओं से पूर्ण चन्द्रमा का उदय हो गया हो।
पंचतत्वों ने भी किया भगवान का स्वागत
श्रीकृष्ण जन्म प्रसंग में पृथ्वी और प्रकृति के विभिन्न स्वरूपों का अत्यंत सुंदर वर्णन मिलता है। जहां पृथ्वी शांत और मंगलमय हो उठी। वहीं जल निर्मल दिखाई देने लगा। इसके साथ ही वायु में सुगंध फैल गई और आकाश स्वच्छ और प्रकाशमय हो गया। इसके साथ ही वन और उपवन फूलों से सुशोभित हो उठे। इन सबको देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे सृष्टि स्वयं भगवान के आगमन का स्वागत कर रही हो।
भाद्रपद की उस आधी रात का दिव्य क्षण
भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी की रात्रि में मथुरा की कारागार में देवकी के गर्भ से भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य हुआ। भगवान श्रीकृष्ण जब देवकी के सामने प्रकट हुए, तब उनका स्वरूप साधारण नवजात शिशु जैसा नहीं था। उन्होंने दिव्य रूप धारण किया हुआ था। उनके शरीर पर पीतांबर था, वक्षस्थल पर श्रीवत्स का चिह्न था और हाथों में शंख, चक्र, गदा तथा पद्म जैसे दिव्य आयुध शोभायमान थे।
भगवान के इस दिव्य स्वरूप को देखकर देवकी और वसुदेव समझ गए कि उनके सामने स्वयं भगवान विष्णु प्रकट हुए हैं।
देवकी और वसुदेव ने की भगवान की स्तुति
भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य स्वरूप को देखकर देवकी और वसुदेव ने उनकी स्तुति की। देवकी ने भगवान से प्रार्थना की कि वे अपना यह दिव्य रूप छिपाकर साधारण शिशु का रूप धारण कर लें, क्योंकि उन्हें कंस से अपने पुत्र के जीवन की चिंता थी। वसुदेव ने भी भगवान की स्तुति करते हुए उनके दिव्य स्वरूप की महिमा का वर्णन किया।
डिस्क्लेमर: यह लेख धार्मिक एवं पौराणिक मान्यताओं तथा श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध में वर्णित श्रीकृष्ण जन्म प्रसंग पर आधारित है। इसमें दी गई जानकारी का उद्देश्य धार्मिक कथा और उससे जुड़ी मान्यताओं को पाठकों तक पहुंचाना है। विभिन्न ग्रंथों, परंपराओं और विद्वानों के मतों में प्रसंगों के विवरण में अंतर हो सकता है। पाठकों से अनुरोध है कि इसे धार्मिक आस्था एवं परंपरा के संदर्भ में पढ़ें।
