Krishna Janmashtami 2026: आज देशभर में कृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का पावन उत्सव धूमधाम से मनाया जा रहा है। हर साल भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को श्री कृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाती है। यह केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं, बल्कि जीवन में संतुलन, प्रेम, ज्ञान, आनंद और दिव्य चेतना के जागरण का संदेश भी देता है। गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर की कहते हैं कि श्रीकृष्ण जीवन की पूर्णता और उस आनंद के प्रतीक हैं, जो हर व्यक्ति के भीतर विद्यमान है।
जन्माष्टमी भगवान श्री कृष्ण के जन्म का उत्सव है। अष्टमी संतुलन का प्रतीक है – प्रकाश और अंधकार, दोनों के बीच का संतुलन। कृष्ण इसी संतुलन और मध्य मार्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं।
कृष्ण: सर्वाधिक आकर्षक और आनंद के प्रतीक
कृष्ण का अर्थ है – सर्वाधिक आकर्षक। कृष्ण केवल एक ऐतिहासिक व्यक्ति नहीं है बल्कि वे तो प्रत्येक जीव में विद्यमान प्राणशक्ति और आनंद के प्रतीक हैं। कृष्ण का रंग आकाश और महासागर की तरह ही नीला है जो की हमारे भीतर छिपी अनंतता का प्रतीक है। जन्माष्टमी इसी अनंत चेतना के प्रकट होने का उत्सव है।
कृष्ण की बांसुरी: अहंकार से रिक्त होने की सीख
कृष्ण की बांसुरी हमें भीतर से रिक्त और निष्कलंक होने का संदेश देती है। जब हम स्वयं को अहंकार से रिक्त करते हैं, तब हम परमात्मा के वाद्य बन जाते हैं और जीवन में दिव्यता का संगीत गूंजने लगता है। उनका एक चरण भूमि पर और दूसरा सहजता से उठा हुआ होना सांसारिकता और आध्यात्मिकता के बीच संतुलन का प्रतीक है।
कृष्ण का जीवन अनेक रंगों से भरा है। वे कलाकार हैं, जो बांसुरी बजाते हैं और नृत्य करते हैं; योगेश्वर हैं, जो उच्च ज्ञान प्रदान करते हैं और ऐसे मार्गदर्शक भी हैं जो जीवन के भौतिक और आध्यात्मिक दोनों पक्षों को साथ लेकर चलते हैं। भगवद्गीता में पदार्थ, चेतना और उनके संबंध का ज्ञान इसी समग्र दृष्टि को सामने रखता है।
कृष्ण जन्माष्टमी उत्सव पर भगवान श्री कृष्ण के जीवन की महिमा को वर्णित करते कुछ उद्धरण –
- “प्रेम, ज्ञान और नटखटपन – इन तीनों का एक साथ प्रकट होना ही भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का प्रतीक है।”
- “जब आपको यह अनुभव होने लगता है कि आपका जीवन और पूरी दुनिया केवल एक लीला है, एक खेल है, तब आपकी चेतना में श्रीकृष्ण का जन्म होता है।”
- “ ‘कृष्ण’ का अर्थ है – सबसे अधिक आकर्षित करने वाला। दिव्यता वह ऊर्जा है जो हर चीज को अपनी ओर आकर्षित करती है, इसलिए वही सबसे अधिक आकर्षक है।”
- “श्रीकृष्ण जीवन की पूर्णता के प्रतीक हैं। वे सेवा भी कर सकते हैं और राजा भी बन सकते हैं, वे विद्यार्थी भी हैं और युद्धभूमि में ज्ञान देने वाले गुरु भी। उनमें बालसुलभ निर्दोषता है तो आवश्यकता पड़ने पर वे अत्यंत कुशल और चतुर भी हैं। श्रीकृष्ण प्रेम और सम्मान के मूर्त स्वरूप हैं।”
- “भगवान श्रीकृष्ण आनंद, शुद्ध आनंद के प्रतीक हैं इसलिए जन्माष्टमी वह दिन है, जब आनंद का प्राकट्य होता है।”
- “जब श्रीकृष्ण बोलते हैं, तो वह अनंत की वाणी होती है। प्रत्येक व्यक्ति को वर्ष में कम-से-कम एक बार भगवद्गीता अवश्य पढ़नी चाहिए।”
- “श्रीकृष्ण परम आनंद के साक्षात् स्वरूप हैं।”
- “भगवान श्रीकृष्ण का न कभी जन्म हुआ और न कभी उनका प्रस्थान हुआ। अजन्मा होने के बावजूद उनके जन्म का उत्सव मनाना अपने आप में अद्भुत है।”
- “कृष्ण चेतना हैं और जन्माष्टमी मनाने का उद्देश्य यह अनुभव करना है कि कृष्ण हमारे भीतर हैं, हमसे अलग नहीं।”
- “अपनी चेतना में कृष्ण को जागृत करना ही जन्माष्टमी मनाने का सही तरीका है।”
डिस्क्लेमर: इस लेख में गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर से संबंधित विचार और उद्धरण उनके सार्वजनिक रूप से व्यक्त आध्यात्मिक एवं मानवीय दृष्टिकोण के संदर्भ में प्रस्तुत किए गए हैं। लेख का उद्देश्य रक्षाबंधन के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व को समझना है। उद्धरणों का उपयोग केवल संदर्भ एवं संपादकीय उद्देश्य से
