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इस तरह हनुमान ने किया था शनिदेव को परेशान, जानिए रोचक प्रसंग

पर्वतों से दबे हुए शनिदेव जब पूरी तरह परेशान हो गए तो हनुमान जी से यह बोले कि "आप इन पर्वतों को नीचे उतारिए। मैं आपसे संधि करने के लिए तैयार हूं।"

Author नई दिल्ली | April 16, 2019 11:57 AM
हनुमान जी और शनिदेव।

भगवान सूर्य के पुत्र शनिदेव के बारे में सभी जानते हैं। शनिदेव को न्याय का देवता भी माना गया है क्योंकि ये इंसान के हर कार्य का लेखा-जोखा रखते हैं। साथ ही यदि इंसान कोई गलत या अनैतिक कार्य करता है तो शनिदेव उसे दंड देते हैं। दंड स्वरूप में यदि शनि की दशा शुरू हो जाए तो व्यक्ति को साढ़े सात साल तक इसका खामिजाया भुगतना पड़ता है। परंतु ऐसा कहा जाता है कि हनुमान जी के भक्तों को शनिदेव से डरने की जरुरत नहीं होती। कहते हैं कि महाबली हनुमान ने एक बार शनिदेव को इतना अधिक परेशान किया कि इसके बाद हनुमान जी से शनिदेव दूरी बनाए रखते हैं। शनिदेव के ऐसा क्यों कहा जाता है? आगे हम इसे जानते हैं।

बात कलियुग की है। एक बार हनुमान जी शाम के समय अपने आराध्य श्रीराम का स्मरण कर रहे थे। उसी समय शनिदेव उनके पास आकर आग्रह पूर्वक लेकिन कर्कश आवाज में यह बोले थे कि “मैं आपको यहां सावधान करने आया हूं कि भगवान श्रीकृष्ण ने जिस समय अपनी लीला का समापन किया था, उसी वक्त से धरती पर कलियुग का आगमन हो गया था। इस कलियुग में कोई भी देवता पृथ्वी पर नहीं रहते हैं। क्योंकि जो भी इस पृथ्वी पर रहता है उस पर मेरी साढ़ेसाती की दशा प्रभावी होती है। इसलिए मेरी यह साढ़ेसाती की दशा आप पर भी प्रभावी होने वाली है।

शनिदेव की यह बात सुनकर हनुमान जी ने तब उनसे यह कहा था कि जो मनुष्य या देवता भगवान श्रीराम के चरणों में होते हैं उनपर तो काल का प्रभाव भी नहीं होता है। इसलिए आप मुझे छोड़कर कहीं और चले जाएं। क्योंकि मेरे शरीर पर भगवान राम के अलावा कोई प्रभाव नहीं डाल सकता है। हनुमान जी की यह बात सुनकर शनिदेव ने तब यह कहा था कि- “मैं सृष्टिकर्ता के विधान से विवश हूं। आप भी इसी पृथ्वी पर रहते हैं इसलिए आप भी मेरे प्रभुत्व से कैसे बच सकते हैं?” आपके ऊपर मेरी साढ़ेसाती अभी से प्रभावी हो रही है। इसलिए मैं आज और अभी आपके शरीर पर आ रहा हूं। इसे कोई भी टाल नहीं सकता है।

यह बात सुनकर हनुमान जी ने यह कहा था-ठीक है, आपको आना ही है तो आ जाइए। मैं आपको रोकुंगा नहीं। परंतु ये बता दीजिए आप मेरे शरीर में कहां रहेंगे? “इस पर शनिदेव ने बड़े गर्व से हनुमान जी से कहा कि “मैं अपनी साढ़ेसाती में ढाई साल मनुष्य के सिर पर बैठकर उसकी बुद्धि को विचलित करता रहता हूं। फिर ढाई साल मनुष्य के पेट में बैठकर उसके शरीर को अस्वस्थ्य बनाता हूं। साथ ही अपने साढ़ेसाती के अंतिम ढाई वर्षों में मनुष्य के पैरों में रहकर उसे भटकाता हूं।

इतना कहकर शनिदेव हनुमान जी के माथे पर बैठे थे। जिससे हनुमान जी के सिर में खुजली होने लगी थी। तब हनुमान जी ने अपनी उस खुजली को मिटाने के लिए एक बड़ा सा पर्वत उठाकर अपने सिर पर रख लिया था। तब शनिदेव उस पर्वत से दबकर घबराते हुए हनुमान जे से यह बोले थे कि यह क्या कर रहे हैं आप? तब हनुमान जी शनिदेव से यह कहा- “जिस तरह सृष्टि कर्ता के विधान से विवश है। उसी प्रकार मैं भी अपने स्वभाव से विवश हूं। मैं अपने सिर की खुजली इसी प्रकार मिटाता हूं। आप अपना कम करते रहिए, मैं अपना काम कर रहा हूं’।” यह कहकर हनुमान जी ने एक और बड़ा पर्वत उखाड़कर अपने सिर पर रख लिया था।

जिससे शनिदेव और भी अधिक दबने लगे थे। पर्वतों से दबे हुए शनिदेव जब पूरी तरह परेशान हो गए तो हनुमान जी से यह बोले कि “आप इन पर्वतों को नीचे उतारिए। मैं आपसे संधि करने के लिए तैयार हूं।”  शनिदेव के ऐसा कहने पर हनुमान जी ने एक तीसरा बहुत बड़ा पर्वत भी उठाकर अपने सिर पर रख लिया। कहते हैं कि तीसरे पर्वत के बोझ से दबकर शनिदेव चिल्लाने लगे और यह बोले कि “मुझे छोड़ दो, मैं कभी आपके नजदीक भी नहीं आऊंगा। लेकिन फिर भी हनुमान जी नहीं माने और चौथा पर्वत भी उठाकर अपने सिर पर रख लिया। तब इस बुड़ी विपत्ति में फंसे शनिदेव ने हनुमान जी की विनती करते हुए कहा कि मुझे छोड़ दो पवनपुत्र मैं कभी भी उनलोगों के समीप भी नहीं जाऊंगा जो आपका स्मरण करते होंगे।” शनिदेव की यह विनती सुनकर हनुमान जी ने पर्वतों को अपने सिर से हटकर उन्हें मुक्त किया था।

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