व्यावसायिकता के समय में नैतिकता को बचाना जरूरी

यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि इस दौर में अधिकांश लोग नैतिकता पर बात करना नहीं चाहते हैं।

सांकेतिक फोटो।


यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि इस दौर में अधिकांश लोग नैतिकता पर बात करना नहीं चाहते हैं। यह जरूर है कि हमारे घर-परिवार और समाज में बड़े-बुजुर्ग नैतिकता पर भाषण देते नजर आते हैं। इस आधुनिक युग में हम अपनी सोच भी आधुनिक होने का दावा करने लगे। यह एक ऐसा समय है, जिसमें न ही तो हमारे पास नैतिकता की बातें सोचने का समय है और न ही इन बातों पर आगे बढ़ना चाहते हैं। एक कदम आगे बढ़कर नैतिकता की बातों को अव्यावहारिक और खोखला आदर्शवाद कहकर खारिज कर दिया जाता है।

दोस्तों की महफिल में यदि कोई नैतिकता की बातें करता है तो उसे उपदेशक बताकर उस पर व्यंग्य के बाण छोड़े जाते हैं। यानी समाज में जान-बूझकर एक ऐसा वातावरण बनाया जा रहा है, जिसमें अच्छे विचार और व्यवहार के लिए जगह कम हो गई है। दरअसल नैतिकता और अनैतिकता के बीच एक लंबा द्वंद चलता है। किसी एक व्यक्ति के लिए नैतिकता का जो अर्थ होता है, जरूरी नहीं कि दूसरे के लिए भी वही हो। यह व्यक्ति की अपनी सोच और दृष्टि पर भी निर्भर करता है। यह सही है कि नैतिकता और अनैतिकता का अर्थ हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग होता है लेकिन यह इतना पेचीदा एक अनपढ़ व्यक्ति भी यह आसानी से समझ जाता है कि उसके द्वारा किया जा रहा कार्य नैतिक है या अनैतिक। हमारा दिल बार-बार इस तरह के संकेत देता रहता है लेकिन हम बार-बार इन्हें नजरअंदाज करते हैं।

झूठी शान के लिए हम अपने दिल के संकेतों को नजरअंदाज कर अनैतिक कार्य करते रहते हैं। यह सही है कि इस दौर में नैतिकता के अर्थ बदल गए हैं। आज किसी भी क्रियाकलाप को हम नैतिकता के चश्मे से उस तरह नहीं देख सकते हैं, जैसे पुराने जमाने में देखा करते थे। व्यावसायिकता के इस दौर में तो न जाने कितनी अनैतिक बातें नैतिक हो गई हैं। इसके बावजूद हमें नैतिकता के मूल स्वरूप पर ध्यान देना होगा। यानी हमें इस बात पर विचार करना होगा कि किसी भी क्रियाकलाप में हमारी न्यूयतम नैतिकता कैसे बची रहे।

दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि पूंजीवाद के इस दौर में तो न्यूयतम नैतिकता भी नहीं बची है। हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि बड़ी बातें करने से नैतिकता नहीं बचती है। हम नैतिकता को अपने बाहर खोजते रहते हैं लेकिन वह हमारे भीतर मौजूद होती है। अगर हम सब इसको समझ लेंगे तो हमें बाहरखोजने की जरूरत नहीं पड़ेगी। विडम्बना यह है कि हम अपने भीतर की नैतिकता को नहीं समझ पाते हैं इसलिए हमें अपने चारों ओर अनैतिकता पसरी हुई दिखाई देती है। समाज में केवल कुछ लोग अपने अंदर की नैतिकता को समझ लें और अधिकांश लोग यह न समझ पाएं तो भी स्थिति में परिवर्तन की संभावना नहीं है। हम सब मिलकर अपने भीतर झांकने की कोशिश करें तभी समाज से अनैतिकता समाप्त हो सकती है।

नैतिकता से बढ़ती दूरी

दरअसल नैतिकता शब्द सुनते ही हम एक अजीब सी मनोस्थिति में फंस जाते हैं। नैतिकता को हम एक ऐसी प्रक्रिया मान लेते हैं जो किताबों और भाषणों तक ही सीमित रहती है। एक ऐसी प्रक्रिया जो व्यावहारिक रूप से संभव नहीं हो सकती। नैतिकता को हौव्वा और भारी-भरकम प्रक्रिया मानने के कारण ही हम लगातार उससे दूर होते चले जाते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि नैतिकता बहुत बड़ी प्रतिज्ञा, उपदेश या बहुत ऊंचे स्तर के व्यवहार का नाम नहीं है। नैतिकता बहुत छोटी-छोटी प्रक्रियाओं से मिलकर बनती है। इनका असर बड़ा होता है बशर्ते कि इनमें छोटी-छोटी ईमानदारी हों। हम अगर ईमानदारी से अपनी छोटी-छोटी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं तो उससे बड़ी कोई नैतिकता नहीं है। यह समय नैतिकता को लेकर मजाक उड़ाने का नहीं है, बल्कि उसको बचाने का है।

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