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मन का मौन ही समाधि है

योग साधना का अंतिम और उत्कृष्ट अंग जिसमें मन सांसारिक बाहरी चेतना को विलुप्त कर मौन अवस्था को प्राप्त होकर ब्रह्म में केद्रिंत हो जाता है।

सांकेतिक फोटो।

कमल वैष्णव

योग साधना का अंतिम और उत्कृष्ट अंग जिसमें मन सांसारिक बाहरी चेतना को विलुप्त कर मौन अवस्था को प्राप्त होकर ब्रह्म में केद्रिंत हो जाता है। अस्तित्व से निकल कर आत्म ज्ञान होना ही समाधि है। यूं तो मन का स्वभाव मौन के विपरीत है। मन में प्रतिक्षण विचारों का प्रतिद्वंदचलता रहता है और यही प्रतिद्वंद है जिसके कारण मनुष्य को कभी शांति नहीं मिल पाती। शास्त्र मत है की चंद्रमा भी उसी जल में प्रतिबिंबित होता है जो जल शांत स्थिर होता है। ठीक इसी प्रकार विषयों की लहरों से उपद्रवित मनुष्य मन रूपी सागर में ईश्वरीय स्वरूप कदापि प्रतिबिंबित नही होता। ऐसे में जीव और ब्रह्म में एकाकार नहीं हो सकता। जहां शांति नहीं वहां कुछ भी नहीं ठहरता। अहंकार शून्य जीव का ब्रह्म में विलय होकर आत्मज्ञान करना ही समाधिस्थ पद को पाना है। मन का बाहरी भ्रमण की अपेक्षा ध्यान अंकुश द्वारा अंत:करण की आंतरिक यात्रा से मन को एकाग्र करके मोक्ष प्राप्ति ही समाधि का एकमात्र लक्ष्य है ।

मन एकाग्रता के लाभ :
मन की एकाग्रता जहां मनुष्य की चेतना को जागृत करती है वहीं मनुष्य को शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक बल तथा शांति प्रदान करती है। मनोएकाग्री जीव ही धैर्यवान, सहनशील, चिंतक, संतोषी, संयम, उद्दार तथा ज्ञानी होते हैं। यह संसार में रहते हैं किंतु संसार को अपने भीतर नही रखते। मोह पाश से मुक्त होकर सुख दु:ख में समभाव से रहते हैं।

मन को ब्रह्म (निर्गुण रूप श्रेष्ठ ऊर्जा शक्ति) के विषय में यह ज्ञान हो जाना कि सर्वस्व ब्रह्म में ही निहित है। वही ब्रह्म जीव में है। ब्रह्म को जानने के लिए वन में जाना अनिवार्य नहीं है। अपने निजी परिवारिक और सांसारिक दायित्वों का परित्याग करना भी अनिवार्य नहीं है। अनिवार्य है तो केवल स्वयं में सत्य को जानने की आवश्यकता है किंतु उस सत्य को जानने के लिए जीव को काम, क्रोध, लोभ ,मोह ,अहंकार, मद कि मैल और महत्वाकांक्षाओं जैसे कई आवरणों को छेदन करके ऐसी अवस्था में जाना जहां न अमृत न विष, न सुख न दुख, न स्वर्ग न नर्क की कामना व भय हो वही परमानंद है। उसी परमानंद तक की यात्रा का नाम है समाधि।

समाधि के अंग :
समाधि दो प्रकार की होती है । 1.ध्यान समाधि 2. मरणोपरांत समाधि।
-ध्यान समाधि जिसमें सत्य से अनभिज्ञ मनुष्य ध्यान योग से मन को मौन अवस्था में स्थित करके परोक्ष सत्य ब्रह्म में लीन होकर उससे एकाकार हो जाता है ।
मरणोपरांत समाधि : वैदिक धर्म के अनुसार नश्वर शरीर को अग्निदाह करके पंच तत्वों में विलीन हो जाने की प्रक्रिया है। किंतु साधु-संतों को मरणोपरांत अग्निदाह की अपेक्षा भूमि में देह समाधि देने का विधान कहा गया है जानते हैं क्यों?

समाधि स्थल का महत्व :
आग लगी आकाश में झर झर पड़त अंगार। संत न होते जगत में तो जल मरता संसार।।
सनातन धर्म में संतों को ईश्वरीय वाणी कहा जाता है। ऐसे दिव्य संतों के अंतिम नश्वर विश्राम स्थली ही समाधि स्थल कहलाता है। जीवन में समाधिस्थ पद को प्राप्त साधु संत के नश्वर तपो आभामंडल युक्त देह को समाधि मुद्रा में वैदिक विधि-विधान द्वारा पृथ्वी में समाया जाता है, क्योंकि उनके समस्त जीवन के तपोबल से प्राप्त हुई सकारात्मक ऊर्जा संतों की देह के आभा मंडल में बनी रहती है। यह ऊर्जा सृष्टि संचालन में सहायक होती है। समाधिस्थ साधु संत का आभामंडल योजन योजन तक फैलता है।

ध्यान समाधि मार्ग :
अष्टांग योग शारीरिक मानसिक और आत्मिक शुद्धि के लिए आठ आयामों वाला मार्ग है। जिसके अंग इस प्रकार हैं-यम, नियम,आसन ,प्राणायाम, प्रत्याहार,ध्यान, धारणा और समाधि। अष्टांग योग मार्ग का अनुसरण करते हुए जीव समाधि अवस्था को प्राप्त करने में सफल हो सकता है, किंतु मनुष्य जीवन पर्यंत प्रत्यक्ष सत्य (संसार) को ही सत्य मानकर परोक्ष सत्य से अनभिज्ञ रहता है। यही अज्ञानता उसके सांसारिक बंधनों में उलझे रहने का मुख्य कारण और मोक्ष में बाधा है। सत्य का बोध करने हेतु वेदों का अनुगामी होना अति आवश्यक है।

वेदों का अनुसरण करने से ही निर्गुण को जाना जा सकता है। प्रत्यक्ष सत्य (जो सामने प्रतीत होता है)को ही ज्ञान समझना अज्ञानता का प्रथम लक्षण है।अज्ञानता से अहंकार की उत्पत्ति होती है और अंहकार से भरे हुए मन में ज्ञान कदापि नहीं समाता। यदि मनुष्य स्वयं से नित्य प्रश्न करे :आत्मा के कल्याण का मार्ग क्या है? मुक्ति का साधन क्या है? जीव ब्रह्म से अनभिज्ञ क्यों है और उसे जानने की सही मार्ग क्या है? जहां प्रश्न नहीं वहां जिज्ञासा उत्पन्न नहीं होती। जहां जिज्ञासा उत्पन्न नहीं होती वहां ज्ञान की वृद्धि नहीं हो सकती। वर्तमान समय में संसारिक अज्ञान अंधकार में ज्ञान का मूल स्वरूप कहीं न कहीं खोता जा रहा है। जीव को निज कल्याणनार्थ हेतु व मार्गदर्शन के लिए अज्ञान और ज्ञान की परिभाषा को समझना आवश्यक है। इसके कारण स्वार्थ, अहंकार,विनाश, क्रूरता भ्रांति और भय में वृद्धि हो वह अज्ञान है।

इसी अज्ञान के कारण अज्ञानी जीव अपने सुखों का कारण स्वयं को तथा दु:खों का कारण दूसरों को मानते हैं। दूसरी ओर जो व्यक्ति को उद्धार, निर्भीक, सहनशील और विनम्र बनाए वही ज्ञान है। जिसमें जीव अपने सुख दु:ख का कारण स्वयं जनित कर्मों का फलस्वरूप मानता है। अज्ञान अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करता है जबकि ज्ञान अपनी शक्तियों व सामर्थ्य के द्वारा अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन करते हुए समस्त संसार के कल्याण के लिए प्रेरित करता है। जिस प्रकार कलकल करती निरंतर बहती नदियों की यात्रा सागर में विलय होने पर ही पूर्ण होती है उसी प्रकार जीवात्मा की यह पुन: जन्म मरण रूपी निरंतर यात्रा भी परमात्मा में विलय होने पर ही विराम को प्राप्त होती है। जिसे मोक्ष कहते हैं। अर्थात परोक्ष ज्ञान मार्ग द्वारा मन को अंकुश लगाने वाले ध्यानी पुरुष ही समाधिस्थ होकर मोक्ष पद को प्राप्त करते हैं।

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