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ब्रेकअप के दुख से कैसे निकलें बाहर? जानिए सद्गुरु जग्गी वासुदेव से

सद्गुरु के अनुसार ये बहुत महत्वपूर्ण है कि युवा इस बात को समझें कि वह अपने शरीर का संवेदनशील तरीके से इस्तेमाल करें जिससे यह असाधारण तरीके से चीजें करे, वरना यह मामूली काम ही करेगा।

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आज कल के दौर में जितनी जल्दी लोग रिश्ते बनाते हैं उतनी ही जल्दी उन रिश्तों को तोड़ भी देते हैं। तो ऐसे में एक सवाल जो हर युवा के मन में आता है वो यह है, कि अगर किसी से ब्रेकअप हो जाए तो इस दुख से कैसे बाहर निकले? इस बारे में सद्गुरु जग्गी वासुदेव जी का कहना है कि कोई और आगे बढ़ चुका है अगर आप उसी जगह पर रुके रहे तब भी दूरी आ जाएगी। सद्गुरु कहते हैं कि इस बात को जीवन के संदर्भ में समझते हैं। मनुष्य के शरीर में जबरदस्त याददाश्त होती है। ये याददाश्त कई स्तरों पर होती है। क्रमिक विकास की याददाश्त, वंश की याददाश्त और कर्मों की याददाश्त। याददाश्त के चेतन और अचेतन स्तर होते हैं। इसके स्पष्ट और अस्पष्ट स्तर भी होते हैं। अगर आपकी नाक आपके परदादा की जैसी है जिसे आपने कभी नहीं देखा तो निश्चित रुप से आपके शरीर में याददाश्त का बहुत जटिल तत्व है।

तो अगर इस शरीर में इतनी जटिल याददाश्त रखने की काबिलियत है। तो आपको लगता है कि आप जिसे भी छुते या महसूस करते हैं और संबंध रखते हैं उससे आपका शरीर याददाश्त नहीं बटोर रहा है। आप हर दिन बहुत सारी याददाश्त जमा कर रहे हैं। अगर इस याददाश्त में खास तरह का तालमेल हो तो यही याददाश्त लाभदायक बन जाएगी। अगर इस याददाश्त में उथल-पुठल होगी तो भले ही आप सब कुछ जान जाएं, मगर यह याददाश्त आपके खिलाफ काम करेगी। क्योंकि इसके अंदर तकराव और विरोधाभास है।

ये बहुत महत्वपूर्ण है कि युवा इस बात को समझें कि वह अपने शरीर का संवेदनशील तरीके से इस्तेमाल करें जिससे यह असाधारण तरीके से चीजें करे, वरना यह मामूली काम ही करेगा। इसलिए किसी भी चीज को छूने और खुद को उसमें शामिल करने से पहले इस को समझें कि आप उसमें कितनी भागीदारी चाहते हैं और आपके ऊपर उसका क्या प्रभाव पड़ेगा। वो इस जीवन के लिए अच्छा काम करेगा या इस जीवन के खिलाफ। इसलिए अपने जीवन में बौद्धिक, भावनात्मक और शारीरिक समग्रता लाना जरूरी है। अगर उसके बाद भी गलत हो तो यह समझें कि दुनिया में आये अकेले हो और जाना भी अकेला है।

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