कांवड़ यात्रा 2019: कैसे शुरू हुई कांवड़ यात्रा? जानें इससे जुड़ी पौराणिक कथाएं

कांवड़ यात्रा 2019: कुछ कथाओं के अनुसार इस कांवड़ यात्रा की परंपरा की शुरुआत भगवान परशुराम ने की थी। सबसे पहले भगवान परशुराम ने उत्तर प्रदेश के बागपत के पास मौजूद ‘पुरा महादेव’ में गढ़मुक्तेश्वर से गंगा जल लाकर शिवलिंग पर चढ़ाया था।

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kawad yatra 2019: पूरे भारत में सावन का महीना हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इस वक्त सभी भक्तजन भगवान शिव की पूजा करते हैं। इस साल सावन का महीना 17 जुलाई से आरंभ हो चुका है। इस महीने शिव भक्त कांवड़ यात्रा पर जाते हैं। कंधे पर गंगाजल लेकर भगवान शिव के ज्योतिर्लिंगों पर चढ़ाने की परंपरा, ‘कांवड़ यात्रा’ कहलाती है। यह यात्रा भक्तों को भगवान से जोड़ती है। महादेव को प्रसन्न कर मनोवांछित फल पाने के लिए कांवड़ यात्रा की जाती है। इसमें सभी कांवड़िए पवित्र नदियों के जल को भर कर लाते हैं और शिव जी का उससे अभिषेक करते हैं। लेकिन कैसे शुरु हुई इस कावड़ यात्रा की शुरुआत, जानिए इससे संबंधित कुछ पौराणिक कथाएं…

– ऐसा माना जाता है कि समुंद्र मंथन के दौरान निकले हलाहल विष से सभी देवता और असुर घबरा गए थे। कोई इस विष को नहीं लेना चाहता था। तब भगवान शिव ने सभी को इसके दुष्प्रभावों से बचाने के लिए इसे धारण करने का मन बनाया। जैसे ही महादेव इस विष को निगलने लगे थे तभी माता पार्वती ने उन्हें बीच में रोक दिया। जिस कारण से वह विष शिव जी के गले में ही अटक गया और शिव को नाम मिला – नीलकंठ। परन्तु उस विष के कारण शिव जी छटपटाने लगे और अपने मन और तन को शांत करने के लिए हिमालय की ओर भागने लगे। जिसके बाद सभी देवता गण उन्हें शांत करने के लिए मटके में जल भरकर देने लगे। जिसके बाद उनका मन शांत हो गया। तभी से शिव के भक्तों द्वारा उनपर जल चढ़ाने की परम्परा आरंभ हो गई थी।

– कुछ कथाओं के अनुसार इस कावड़ यात्रा की परंपरा की शुरुआत भगवान परशुराम ने की थी। सबसे पहले भगवान परशुराम ने उत्तर प्रदेश के बागपत के पास मौजूद ‘पुरा महादेव’ में गढ़मुक्तेश्वर से गंगा जल लाकर शिवलिंग पर चढ़ाया था। और जिस समय उन्होंने यह कार्य किया था उस समय सावन माह चल रहा था। इसी कारण सावन माह में गढ़मुक्तेश्वर यानी ब्रजघाट से जल लाकर श्रद्धालु शिव पर चढ़ाते हैं।

– एक कहानी ये भी है कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने भी भगवान शिव को कांवड़िया बनकर जल चढ़ाया था। श्री राम ने बिहार के सुल्तानगंज  से जल भरकर झारखंड के देवघर में स्थित बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का अभिषेक किया था।

– वहीं कुछ विद्वानों की मानें तो सर्वप्रथम त्रेतायुग में श्रवण कुमार ने कांवड़  यात्रा की थी। उनके अंधे माता-पिता ने उनसे मायापुरी यानि हरिद्वार में गंगा स्नान करने की इच्छा जताई थी। माता-पिता की इच्छा की पूर्ति हेतु श्रवण कुमार अपने माता-पिता को कावड़ में बैठा कर हरिद्वार ले आए और उन्हें गंगा स्नान कराया। वापस लौटते हुए वह गंगाजल को भी साथ ले गए। इसे ही कावड़ यात्रा की शुरुआत माना जाता है।

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