Holi Bhai Dooj Vrat Katha In Hindi ( होली भाई दूज व्रत कथा): हर साल चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि को भाई दूज का पर्व मनाया जाता है। इसे भ्रातृ द्वितीया भी कहा जाता है। यह पावन पर्व भाई-बहन के अटूट स्नेह और विश्वास का प्रतीक माना जाता है। इस दिन बहनें अपने भाइयों के माथे पर तिलक लगाकर उनकी लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। विवाहित बहनें विशेष रूप से अपने भाइयों को घर आमंत्रित करती हैं, उन्हें सूखा नारियल भेंट करती हैं और प्रेमपूर्वक भोजन कराती हैं।

मान्यता है कि भाई दूज के दिन बहन के घर जाकर भोजन करने से भाई की आयु में वृद्धि होती है तथा जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है। इस शुभ तिथि को यम द्वितीया भी कहा जाता है। धार्मिक दृष्टि से इस दिन की कथा का विशेष महत्व है, जिसे सुनना और सुनाना अत्यंत फलदायी माना गया है।

होली भाई दूज की पौराणिक कथा (Holi Bhai Dooj 2026 Katha)

होली के बाद मनाए जाने वाले भाई दूज से जुड़ी एक लोकप्रचलित कथा इस प्रकार है । एक नगर में एक वृद्धा अपने बेटे और बेटी के साथ रहती थी। समय के साथ बेटी का विवाह हो गया। एक बार होली के बाद बेटे के मन में अपनी बहन से मिलने और उससे तिलक कराने की तीव्र इच्छा जागी। उसने अपनी मां से बहन के घर जाने की अनुमति मांगी। पहले तो मां ने टालने की कोशिश की, लेकिन बेटे के बार-बार आग्रह करने पर उसे जाने की अनुमति दे दी।

घर से निकलते ही रास्ते में उसे एक नदी मिली। नदी मानो बोल उठी कि मैं तुम्हारा काल हूं जैसे ही तुम मेरे जल में उतरोगे, डूब जाओगे। यह सुनकर वह घबरा गया, पर साहस जुटाकर बोला, “पहले मैं अपनी बहन से तिलक करवा लूं, उसके बाद तुम मेरे प्राण ले लेना।

आगे बढ़ने पर जंगल में एक भयंकर शेर मिला। उसने शेर से भी वही विनती की। थोड़ी दूर चलने पर एक सांप ने उसके पैर लपेट लिए। युवक ने उससे भी निवेदन किया कि पहले बहन से मिल लेने दे, फिर जो दंड देना हो दे देना।

किसी तरह वह अपनी बहन के घर पहुंच गया। बहन ने भाई को देखते ही स्नेह से गले लगाया, तिलक किया और प्रेमपूर्वक भोजन कराया। भोजन करते समय भाई को उदास देखकर बहन ने उसके दुख का कारण पूछा। तब भाई ने रास्ते में मिली सभी बाधाओं की बात बता दी।

यह सुनकर बहन तुरंत भाई के साथ चलने को तैयार हो गई। उसने शेर के लिए मांस, सांप के लिए दूध और नदी के लिए ओढ़नी साथ ले ली। लौटते समय सबसे पहले शेर मिला। बहन ने उसके आगे मांस डाल दिया, जिससे वह शांत हो गया। आगे सांप मिला तो उसने उसके सामने दूध रख दिया, और वह भी शांत हो गया। जब वे नदी के पास पहुंचे तो लहरें तेज उठने लगीं। बहन ने श्रद्धा से नदी को ओढ़नी अर्पित की, जिससे नदी भी शांत हो गई और दोनों सुरक्षित पार हो गए।

इस प्रकार बहन ने अपने प्रेम, बुद्धिमत्ता और साहस से भाई पर आने वाली हर विपत्ति को टाल दिया। तभी से मान्यता है कि चैत्र मास की द्वितीया तिथि, अर्थात होली के अगले दिन, भाई दूज का पर्व मनाया जाता है। इस दिन बहनें अपने भाइयों को तिलक कर उनकी लंबी आयु और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।

यमराज और उनकी बहन से जुड़ी पौराणिक कथा

इस पर्व से जुड़ी पहली पौराणिक कथा के अनुसार, भाई दूज के दिन ही यमराज अपनी बहन यमुना के घर पधारे थे। इसी घटना से भाई दूज या यम द्वितीया मनाने की परंपरा की शुरुआत हुई। सूर्यपुत्र यम और यमी (यमुना) भाई-बहन थे। यमुना ने कई बार अपने भाई को घर आने के लिए आमंत्रित किया, और एक दिन यमराज उसके घर पहुंचे। यमुना ने उनका स्नेहपूर्वक स्वागत किया, उन्हें भोजन कराया और तिलक लगाकर उनके सुखमय जीवन की कामना की। विदा लेते समय जब यमराज ने बहन यमुना को वरदान मांगने के लिए कहा, तो उसने कहा कि आप प्रतिवर्ष इस दिन मेरे घर अवश्य आएं और जो बहन इस दिन अपने भाई का तिलक करे, उसे कभी आपका भय न हो।

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