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पहाड़ की होलीः शिव शंकर खेलत हैं होरी…

उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के अल्मोड़ा जिले के सल्ट में एक अनूठी होली होती है। इस होली में जहां होल्यार होली गाते हैं। वहीं, इस होली में लोक नृत्य से भी समां बांधा जाता है। यहां होली के साथ-साथ न्योली, छपेली और झोड़ा आदि लोगों का मनमोह लेते हैं। उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में होली का त्योहार शास्त्रीय संगीत पर आधारित होता है।

कुमाऊं में तीन तरह की होली होती है। पहली खड़ी होली, दूसरी बैठकी होली और तीसरी महिलाओं की होली होती है।

सुनील दत्त पांडेय

उत्तराखंड के चार क्षेत्रों में होली अलग-अलग तरीके से बनाई जाती है। कुमाऊं, गढ़वाल, जौनसार और मैदानी क्षेत्रों हरिद्वार और उधम सिंह नगर में होली स्थानीय परंपराओं के अनुसार मनाई जाती है। उत्तराखंड में सबसे ज्यादा प्रसिद्ध कुमाऊं की होली मानी जाती है। कुमाऊं की होली पौष मास से शुरू होती है और माघ व फागुन मास में अपने रंग में रंग जाती है और पूरा कुमाऊं होलीमय हो जाता है। फागुन मास की पूर्णिमा को होलिका दहन और चैत्र कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा के दिन धुलेंडी के दिन रंग खेलने के साथ तीन महीने चलने वाला होली का त्योहार संपन्न होता है। तीन महीने तक होल्यार होली के गीत गाते हैं और होली के रंग में डूब जाते हैं।

कुमाऊं में तीन तरह की होली होती है। पहली खड़ी होली, दूसरी बैठकी होली और तीसरी महिलाओं की होली होती है। खड़ी होली, खड़े होकर नृत्य के साथ ढोल, मंजीरा नगाड़े और दमाऊ की लय पर लोक नृत्यों के साथ खेली जाती है। खड़ी होली में सभी देवी-देवताओं से संबंधित अनुष्ठान भक्ति पर रंगारिक नृत्य संबंधित तथा हुड़दंगी होली का रूप देखने को मिलता है। खड़ी होली का प्रारंभ गणेश वंदना के साथ होता है। कुमाऊं के प्रसिद्ध लोकगीत गायक लेखक गिरीश तिवारी गिर्दा ने अपने लेखों में और गीतों में खड़ी होली का विशेष उल्लेख किया है। खड़ी होली को बंजारा होली के नाम से भी जाना जाता है। बैठकी होली कुमाऊं के चंद राजाओं के जमाने से शुरू हुई। इस होली का प्रारंभ पौष माह के पहले रविवार से दार्शनिक और बैरागी गीतों से शुरू होता है जो माघ और फागुन के महीने तक चलता है। बैठकी होली में बसंत ऋतु का वर्णन इस तरह किया जाता है ‘आयो नवल बसंत सखी ऋतुराज कहावे, पुष्प कली सब फूलन लावे फूल ही फूल सुहावे’। वहीं शंकर जी को होली खेलते हुए बैठकी होली के गीतों में इस तरह दर्शाया गया है ‘शिव शंकर खेलत है होरी, अंग विभूति गले मुंड माला, कानन नागन की जोड़ी, शिव शंकर खेलत हैं होरी’।

महिलाओं की होली में महिलाएं टोलियां बनाकर फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी को एक दूसरे के घर जाती हैं और होली गाती हैं। आंवले की पूजा करती हैं और आंवले के वृक्ष में चंदन रोली, अक्षत गुलाल और रंग चढ़ा कर पूजा अर्चना की जाती है और आंवले के फल का सेवन किया जाता है। इस एकादशी के दिन महिलाएं सबसे पहले भगवान विष्णु के वस्त्रों में पूजन करके रंग छिड़कती हैं। उसके बाद महिलाएं अपने और परिवार के सदस्यों के कपड़ों पर रंग छिड़कती है और इन कपड़ों को धूलेंडी के दिन पहनकर परिवार के सदस्य होली खेलते हैं।

गढ़वाल मंडल के पौड़ी जनपद में भी खड़ी होली का प्रचलन अत्यधिक है जबकि इस पर्वतीय राज्य के देहरादून जिले से सटे जौनसार बावर क्षेत्र में होली का गढ़वाल और कुमाऊं के पर्वतीय क्षेत्रों जैसा प्रचलन नहीं है। जौनसार बावर के तराई क्षेत्र विकासनगर कालसी में कहीं-कहीं खड़ी होली मनाई जाती है जबकि देहरादून, हरिद्वार और उधम सिंह नगर जैसे मैदानी क्षेत्रों में होली का मिश्रित रूप देखने को मिलता है। जौनसार बावर में हिमाचल प्रदेश की होली की छाप दिखाई देती है। उत्तराखंड में कुमाऊं में होली का उत्साह देखने को मिलता है, वैसा गढ़वाल और अन्य क्षेत्रों में देखने को नहीं मिलता।

कुमाऊं क्षेत्र में होली 

गायक संगीतज्ञ डॉ प्रदीप जोशी कहते हैं कि उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में होली का ज्यादा प्रचलन है और यह होली लोक गीतों पर आधारित है। कुमाऊं में होली गायन पूरी तरह शास्त्रीय संगीत में निबद्ध कालचक्र के अनुसार प्रारंभ हो जाता है। संपूर्ण होली का गायन पीलू, भीमपलासी,  सारंग, कल्याण, श्याम कल्याण, काफी, जंगला काफी, झिंझोटी, खमाज, बागेश्वरी, शहाना, बिहाग, जैजैवंती, जोगिया भैरवी में मध्यान्ह से लेकर प्रात: काल तक बांट दिया जाता है। होली गायन एक विशिष्ट शैली पर आधारित होता है होली चांचर ठुमरी वर्ग में आता है चांचर ताल चौदह या सोलह मात्रा में बजाई जाती है।

 

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