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Brij Holi 2020: ब्रज की अनूठी होली, गुलाल, लड्डू, फूल, लाठी, कोड़ा…

HOLI 2020: बृज की होली आध्यात्मिक प्रेम की पराकाष्ठा है। तन पर रंग की वर्षा से तो सिर्फ शरीर ही रंगता है लेकिन बृज में होने वाली प्रेम की वर्षा से तो जीवों के अंदर ईश्वरीय प्रेम जागृत हो जाता है।

मथुरा में यमुनातट पर विश्राम घाट, स्वामी घाट, बंगाली घाट आदि क्षेत्रों में होली की छटा कुछ अलग ही देखने को मिलती है।

पवन गौतम

मूचे बृज क्षेत्र में होली के हुड़दंग की धूम मची हुई है। हजारों सालों से बृज की धरती पर होली खेली जाती रही है। हमारी संस्कृति और परंपराओं में बदलाव आता रहा, किंतु बृज के कण-कण में आज भी राधा-कृष्ण का प्रेम और नटखट कन्हैया और श्री राधा रानी की प्रेमभरी होली जनमानस के मन पर अमिट छाप लिए बनी हुई है। कान्हा की मधुर बांसुरी की धुन और राधा रानी के नूपुरों की झनकार और उनके नृत्य आज भी हमें उनके हमारे बीच ही उपस्थिति का अहसास कराते रहते हैं।

बृज में वसंत पंचमी से ही होली शुरू हो जाती है। होलिकाष्टक लगने के साथ ही होली का उल्लास अपने चरम पर पहुंच जाता है। फाल्गुन मास शुक्ल पक्ष अष्टमी तिथि से अगले आठ दिन तक होलिकाष्टक शुरू हो जाते हैं। इस दौरान किसी भी तरह का कोई भी शुभ कार्य प्रतिबंधित रहता है। माना यही जाता है कि बृज में ये आठ दिन हर नर और नारी, वृद्ध और बच्चे के लिए सिर्फ होली खेलने के लिए निमित्त हैं। इसी दिन श्यामा और श्याम को गुलाल लगाकर शृंगार करने की परंपरा निभाई जाती है।

बृज में चारों ओर होली की अनूठी परम्पराओं के दर्शन होते हैं। कहीं रंग गुलाल की होली होती है तो कहीं अंगारों की, कहीं फूलों की तो कहीं लाठियों और कोड़ों की होली होती है। गोकुल और रावल इलाके में छड़ीमार होली खेली जाती है। माना जाता है कि जब हुरियारिनें बालक श्रीकृष्ण से होली खेलने की जिद करती हैं तो माता यशोदा मनुहार करती हैं कि कान्हा अभी छोटा है। तब, हुरियारिनें छोटी-छोटी डंडियों से कान्हा के साथ ठिठोली करती हैं। इसे ही छड़ी होली कहा जाता है। रावल में भी बाल स्वरूप श्रीकृष्ण के साथ छड़ी होली खेली जाती है। नंदगांव और बरसाना तक आते-आते बाल श्रीकृष्ण इतने बड़े हो गए थे कि अब वह हुरियारिनों के लट्ठों के वार को भी झेल सकते थे। नंदगांव, बरसाना, श्रीकृष्ण जन्मस्थान आदि जगहों पर इसी भाव के साथ लट्ठमार होली होती है।

नंदगांव की होली के अगले दिन फाल्गुन शुक्ल एकादशी को रंगभरनी एकादशी पर्व पर मथुरा, वृंदावन, गोवर्धन आदि के मंदिरों में रंग और गुलाल के ऐसे बादल उड़ते हैं जिससे बचकर किसी का भी निकलना मुश्किल होता है। मंदिरों में होने वाली सतरंगी होली का आनंद भक्त और भगवान के बीच में खेला जाने वाला होली के वास्तविक आनंद की अनुभूति कराता है। बृज की होली को बेहद अनूठा इसलिए माना जाता है क्योंकि यहां ठिठोलियों के साथ आध्यात्मिकता का समावेश कुछ इस तरह से होता है कि यह पता ही नहीं चल पाता कि कब हम अपने अराध्य को गाली दे रहे हैं और कब उसकी पूजा कर रहे हैं। मानो सब कुछ कान्हा को समर्पित हो।

मथुरा में यमुनातट पर विश्राम घाट, स्वामी घाट, बंगाली घाट आदि क्षेत्रों में होली की छटा कुछ अलग ही देखने को मिलती है। जगह-जगह घाटों की बुर्जियों में लोग भांग-ठंडाई बड़ी-बड़ी सिलों पर पीसते हैं। इसके शौकीन मथुरा के चतुर्वेदी समाज के लोग बादाम, पिस्ता, काजू, मुनक्का, खरबूज की मींग, सौंफ, काली मिर्च, गुलकंद आदि को पीसकर एक गोले का रूप दिया जाता है। इसके बाद मनों दूध में इस मिश्रण को मिलाकर सभी देवताओं का आह्रान करके फिर उपस्थित लोग प्रसाद के रूप में इसका सेवन करते हैं। भांग की तरंग और ठंडाई की उमंग के साथ सभी मस्ती में डूब जाते हैं।

निकटवर्ती कोसीकलां क्षेत्र के गांव फालैन का होलिका दहन अनूठा है। यहां आज भी प्रहलाद कुंड है। इसी कुंड में स्नान कर पंडा भक्त प्रहलाद के रूप में जलती होली में प्रवेश करते हैं और सकुशल निकल आते हैं। बृज की होली की यह परंपरा उन कई चमत्कारों में शामिल है जिनका जवाब पाने में विज्ञान आज भी जुटा हुआ है। इसी दिन, मथुरा में होली गेट और होलीवाली गली का होलिकादहन देखने के लिए भी लोग दूरदराज से आते हैं। दिन में चतुर्वेदी समाज का डोला पूरा आकर्षण चुरा लेता है। दुल्हड़ी के मौके पर होली का हुड़दंग अपने चरम पर पहुंच जाता है तो अगले दिन होली का कारवां भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भ्राता भगवान बलभद्र के आंगन में पहुंच जाता है। भगवान बलभद्र मल्ल विद्या में निपुण थे। यहां हुरियारिनें हुरियारों के कपड़े फाड़कर उनके कोड़े बनाती हैं और फिर शुरू होती है हुरियारों की पिटाई। अब तक खेली जाती रही होली भगवान बलभद्र के आंगन में हुरंगा में तब्दील हो जाती है। जटवारी का हुरंगा देहाती होली का अनूठा उदाहरण है। इस तरह के तमाम कार्यक्रम बृज में जगह-जगह चलते रहते हैं। आखिर में होली के समापन पर हुरियारे गा उठते हैं, ‘ढप धरिदे यार गई पर की’ यानी अब तो अगले साल ही होली खेलने को मिलेगी। मुखराई, ऊमरी, रामपुर, अहमल कलां, बछगांव, सौंख आदि आठ गांवों में चरकुला नृत्य का अयोजन होता है। यह बृज का परंपरागत लोक नृत्य है जिसमें चांदनी रात में सैकड़ों दीपों से जगमगाता 40 से 60 किलो वजन का चरकुला सिर पर रखकर एक नृत्यांगना होली के रसिया गीतों के लय ताल पर थिरकती है। आज भी विशाल नगाड़े की ताल और अलगोजा, थाली, करताल और मंजीरे की मधुर स्वर लहरियों के बीच इस नृत्य की समाप्ति पर नृत्यांगना को जुग-जुग जीने का आशीर्वाद दिया जाता है। दूर से देखने पर जरूर यह लगता है पूरे फाल्गुन मास पूरा बृज होली के उल्लास में डूबा रहता है। लेकिन, बृज की होली का अल्हड़पन अब कहीं खो सा गया है। यहां अब वह होली नहीं होती है जिसके लिए बृज को जाना जाता है।

बेमिसाल बृज
गांव की चौपाल पर रातभर चलने वाली सांखी तो जैसे अब कहानी-किस्सों तक ही सीमित रह गई है। दुखी मन से बुजुर्ग तो यहां तक कहते हैं कि जो खो गया है, वही तो होली थी, जो रह गया है वह तो सिर्फ ‘आयोजन’ है। बरसाना की लट्ठमार होली अब उत्सव हो गई है। प्रशासन ने इसे ‘लट्ठमार होली मेला’ का नाम दे दिया है। बृज की होली मठ मंदिरों तक सिमट कर रह गई है। वह उल्लास जिसे होली कहते हैं किसी मन में टटोलने पर भी नहीं मिल रहा है। सरकार के लिए होली पर्यटकों को आकर्षित करने का उपक्रम बन गया है तो आयोजनकर्ताओं के लिए नफा और नुकसान का महज एक गणित। लेकिन कुछ भी कहिए, बसंत पंचमी से चैत्र कृष्ण नवमी तक चलने वाला 50 दिन का गीत, संगीत, नृत्य, भक्ति और भाव रस, रंग, उमंग का यह त्योहार बृजवासियों को मन तक भिगोकर तृप्त कर देता है। सभी की कामना होती है कि सभी चिरंजीवी हों और बृज में प्रति वर्ष होली खेलकर आनंद की अनुभूति के साथ साथ भगवान कृष्ण और राधा के प्रेम का संदेश जन-जन तक पहुंचाते रहें।

 

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