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दोलजात्राः पलाश के फूल, दोल उत्सव और कविगुरु

Dol Purnima 2020 Timing: बंगाल में होली के पर्व को दोल के अलावा वसंतोत्सव (Vasantotsav) और दोल पूर्णिमा भी कहते हैं। बंगाल के हर हिस्से में इस दिन रंग और गुलाल से लोग सराबोर दिखते हैं। हिंदीभाषियों की होली से ठीक एक दिन पहले बंगाल में दोल उत्सव होता है।

बंगाल में होली के पर्व को दोल के अलावा वसंतोत्सव और दोल पूर्णिमा भी कहते हैं।

जयनारायण प्रसाद

बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान और उत्तर भारत में जिसे हम होली कहते हैं, पश्चिम बंगाल में यही होली ‘दोल उत्सव’ (dol purnima) के नाम से जानी-पहचानी जाती है। बंगाल में दोल उत्सव की परंपरा कब से है, बताना मुश्किल है। कहते हैं कि 1873 में कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर पहली बार शांतिनिकेतन आए और यहां का वातावरण उन्हें इतना भाया कि वे यहीं के होकर रह गए।

बंगाल में होली के पर्व को दोल के अलावा वसंतोत्सव और दोल पूर्णिमा भी कहते हैं। बंगाल के हर हिस्से में इस दिन रंग और गुलाल से लोग सराबोर दिखते हैं। हिंदीभाषियों की होली से ठीक एक दिन पहले बंगाल में दोल उत्सव होता है। दोल के एक दिन पहले होलिका दहन की परंपरा निभाई जाती है, जिसे बंगाल में ‘नेड़ा-पोड़ा’ कहते हैं। बांस, काठ और घास-फूस से यह परंपरा निभाई जाती है। कुछ जिलों में होलिका दहन की परंपरा को ‘चांचल’ भी कहते हैं।
बंगाल में दोल उत्सव के प्रारंभ के बारे में कहावत है कि दोल पूर्णिमा के दिन ही राधिका और उसकी अन्य सहेलियों के साथ श्रीकृष्ण रंग-गुलाल से सराबोर हो गए थे। दोल पूर्णिमा के दिन ही गंगा के नजदीक महाप्रभु चैतन्य का आविर्भाव हुआ था, इसलिए इस दिन को गौर पूर्णिमा भी कहते हैं। बंगाल के नदिया जिले में गौर पूर्णिमा के दिन दोल उत्सव देखने का आकर्षण ही कुछ और है! महाप्रभु चैतन्य की आविर्भाव-भूमि नदिया जिले में ही है। ढोल-मंजीरे के साथ श्रद्धालु यहां कीर्तन करते हुए दोल उत्सव का पालन करते हैं।

शांतिनिकेतन में दोल उत्सव का आनंद ही कुछ और है। विश्वभारती विश्वविद्यालय की छात्र-छात्राएं शांतिनिकेतन में इस दिन विशेष वेशभूषा में होती हैं और कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर के गीतों के माध्यम से यहां वसंतोत्सव मनाया जाता है। दोलजात्रा या दोल उत्सव के दिन सुबह-सुबह यहां की छात्राएं एक सुमधुर गीत ‘ओरे गृहबासी खोल द्वार खेल’ नामक गाना गुनगुनाती हैं। पीले परिधान में चेहरे पर गुलाल लगाए इन छात्राओं को देखने से लगता है दरवाजे पर वसंत आ गया है। उसी दिन शाम के वक्त शांतिनिकेतन के गौर प्रांगण में रवींद्रनाथ टैगोर के किसी एक नाटक का मंचन भी होता है। शांतिनिकेतन के दोल उत्सव को देखने के लिए विदेशों से भी लोग आते हैं। देश के कोने-कोने से तो लोग आते ही हैं। महीने भर पहले से शांतिनिकेतन के लॉज, होटल और गेस्ट हाउस बुक हो जाते हैं। बंगाल के बीरभूम जिले में पड़ने वाले शांतिनिकेतन की दूरी कोलकाता से लगभग 165 किलोमीटर है। रेलगाड़ी से बोलपुर स्टेशन पर उतरकर शांतिनिकेतन पहुंचा जा सकता है। शांतिनिकेतन के रास्ते में रेलगाड़ी पर ढेर सारे बाऊल संगीत के कलाकार भी दिखाई देते हैं, जिनके एकतारा के संगीत को सुनकर कोई भी मुग्ध हो सकता है। लाइफ, लव और फेथ की ध्वनि को शिद्दत से महसूस कर सकते हैं।

किसी जमाने में शांतिनिकेतन को ‘भुवनडांगा’ भी कहा जाता था। रवींद्रनाथ टैगोर के पिता देवेंद्रनाथ टैगोर ने इसकी नीरवता और यहां की शांति को देखकर इसका नाम शांतिनिकेतन रखा। 15 मई, 1817 को जन्मे देवेंद्रनाथ टैगोर ने 1848 में ब्रह्म समाज की स्थापना भी की थी। देवेंद्रनाथ टैगोर वर्ष 1863 में शांतिनिकेतन आए। कहते हैं कि उसी वर्ष रायपुर के जमींदार ने देवेंद्रनाथ टैगोर को यहां कुछ जमीन दान में दी। उस जमीन पर उन्होंने आश्रम बनाया। इसे ‘छादिम तला आश्रम’ कहा जाता है। रवींद्रनाथ टैगोर, देवेंद्रनाथ टैगोर के सबसे छोटे पुत्र थे। कहते हैं कि अपने पिता के साथ रवींद्रनाथ टैगोर पहली दफा वर्ष 1873 में यहां आए। फिर, 1901 में रवींद्रनाथ टैगोर ने मन बना लिया कि वे शांतिनिकेतन में ही रहेंगे। बाद में इसी शांतिनिकेतन की छत्र-छाया में विश्वभारती विश्वविद्यालय की स्थापना हुई।

1951 के पहले तक विश्वभारती एक कॉलेज होता था। दोल उत्सव के दिन विश्वभारती विश्वविद्यालय में सुबह-सुबह रवींद्र संगीत बजता है। अबीर खेलते हुए छात्राएं आम्रकुंज से निकलती हैं। कलाभवन, संगीत भवन, विश्वविद्यालय के खेल मैदान की परिक्रमा करते हुए अन्य परिसरों में जाती हैं और एक ऐसी शृंखला बनती चली जाती हैं, जिसके आनंद में बाल वृद्ध वनिता सभी मगन हो जाते हैं। सिर पर लाल पलाश के फूल और हल्दी रंग की साड़ियों में छात्राओं को देखना मोहक लगता है।

कहते हैं कि दोल उत्सव शीत को विदा करते हुए नवीन वसंत काल का भी प्रतीक है। वेद, पुराण, शब्दपुराण, महर्षि जैमिनी मीमांसा सूत्र में भी वसंतोत्सव और होली का उल्लेख मिलता है। रवींद्रनाथ टैगोर की पुत्रवधु प्रतिमा देवी ने भी एक जगह लिखा है-दोल पूर्णिमा उत्सव का मतलब है शांतिनिकेतन। बिना शांतिनिकेतन आए, दोल उत्सव का आनंद मिल ही नहीं सकता। दोल पूर्णिमा के दिन बंगाल, दोल उत्सव और रवींद्रनाथ एक-दूसरे में सचमुच एकाकार दिखते हैं।

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