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होली 2018 पूजा शुभ मुहूर्त और विधि: जानें होलिका दहन की कथा और पूजन का शुभ मुहूर्त

Holi 2018, Holika Dahan 2018 Puja Vidhi, Vrat Katha: फाल्गुन माह की पूर्णिमा तिथि को होली का पर्व मनाया जाता है जो दो दिनों तक चलता है। पहले दिन को अधिकतर स्थानों पर छोटी होली के नाम से जाना जाता है, इस दिन ही होलिका दहन किया जाता है।

Holi 2018, Holika Dahan 2018 Puja Vidhi, Vrat Katha: होलिका दहन के दिन को होलिका दीपक के नाम से भी जाना जाता है।

Holi 2018, Holika Dahan 2018 Puja Vidhi, Vrat Katha and Muhurat: भारत को त्योहारों का देश माना जाता है, यहां हर मौसम के लिए विशेष त्योहार होते हैं। इन्हीं में से एक है होली का पर्व। होली वसंत ऋतु के आने और सर्दियों के जाने का प्रतीक मानी जाती है। फाल्गुन माह की पूर्णिमा के दिन होली का पर्व मनाया जाता है। इस पर्व को दो दिनों तक मनाए जाने की परंपरा है। पहले दिन को अधिकतर स्थानों पर छोटी होली के नाम से जाना जाता है, इस दिन को होलिका दहन किया जाता है। होलिका दहन के कारण कई लोग इसे होलिका दीपक भी कहते हैं। इसके अगले दिन रंगों वाली होली खेली जाती है, जिसे धुलंडी कहा जाता है। वर्ष 2018 में होलिका का पर्व 1 मार्च को मनाया जाएगा। होलिका दहन की पवित्र अग्नि जलाकर अच्छी फसल के लिए भगवान से प्रार्थना की जाती है। इस बार होलिका दहन का शुभ मुहूर्त 1 मार्च को शाम 6 बजकर 16 मिनट से लेकर 8 बजकर 47 मिनट तक रहेगा। भद्रा पूंछ का मुहूर्त 15 बजकर 54 मिनट से शाम 4 बजकर 58 मिनट तक रहेगा। भद्रा मुख के लिए शाम 4.58 से लेकर 6.45 तक रहेगा।

होलिका दहन की परंपरा के लिए पुराणों के अनुसार एक कथा शिव और पार्वती से भी संबंधित है। हिमालय पुत्री पार्वती भगवान शिव से विवाह करना चाहती थीं लेकिन भगवान शिव माता सती की मृत्यु के बाद तपस्या में लीन थे। माता पार्वती ने अपनी सहायता के लिए कामदेव को बुलाया। कामदेव ने माता की अवस्था देखकर उनकी मदद करने के लिए भगवान शिव पर प्रेमबाण चलाया और उनकी तपस्या भंग कर दी। शिवजी कामदेव पर क्रोधित हुए और उन्हें अपने तीसरे नेत्र से भस्म कर दिया। इसके बाद शिवजी ने माता को देखा तब उनका सारा गुस्सा शांत हो गया। माता की अवस्था देखकर शिवजी ने उन्हें पत्नी के रुप में स्वीकार किया। इस कथा के आधार पर होली की आग में वासनात्मक आकर्षण को प्रतीकात्मक रुप से जला कर सच्चे प्रेम की विजय का उत्सव मनाया जाता है।

अन्य कथा के अनुसार कामदेव के भस्म हो जाने पर उनकी पत्नी रति ने विलाप किया और शंकर भगवान से कामदेव को जीवित करने की गुहार की। भगवान शिव ने रति की अवस्था देखकर कामदेव को पुर्नजीवित कर दिया। इसी दिन रंगों वाली होली खेली जाती है। कई स्थानों पर इस दिन लोक संगीत के रुप में रति के विलाप को भी गाया जाता है। इसी के साथ चंदन की लकड़ी को अग्निदान दिया जाता है जिससे कामदेव को भस्म होने की अधिक पीड़ा नहीं हो। कामदेव के पुर्नजीवित होने की खुशी में ही रंगों वाली होली खेली जाती है।

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