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क्या आपने कभी सोचा कि नंदी के कान में क्यों कही जाती है मनोकामना?

पौराणिक कथा के अनुसार श्रीलाद मुनि ने ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए तप में जीने का फैसला किया था। इससे वंश सामाप्त होता हुआ देख उनके पिता चिंतित हो गए। उन्होंने श्रीलाद को वंश आगे बढ़ाने के लिए कहा।

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जब कभी भी हम शिव मंदिर में जाते हैं तो वहां शिवलिंग के ठीक सामने नंदी को बैठा हुआ पाते हैं। ऐसे में आपके मन में भी यह सवाल उठ सकता है कि शिवालय में नंदी का विराजित होना अनिवार्य क्यों है? क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर ऐसा क्यों है? कहते हैं कि ये एक परंपरा है और इसके पीछे की वजह एक मान्यता है। प्रायः जहां भी शिवालय होता है वहां नंदी विराजित होते हैं। नंदी भगवान शिव के परम भक्त हैं इसलिए ये शिव के वाहन भी हैं। जब भी कोई व्यक्ति शिव मंदिर आता है तो वह नंदी के काम में अपनी मनोकामना कहता है। कभी आपके मन में आया कि नंदी के कान कान में लोग अपनी मनोकामना क्यों कहते हैं? आगे जानते हैं यह प्रसंग।

पौराणिक कथा के अनुसार श्रीलाद मुनि ने ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए तप में जीने का फैसला किया था। इससे वंश सामाप्त होता हुआ देख उनके पिता चिंतित हो गए। उन्होंने श्रीलाद को वंश आगे बढ़ाने के लिए कहा। परंतु तप में व्यस्त रहने के कारण श्रीलाद गृहस्थ आश्रम को अपनाना नहीं चाहते थे। इसलिए संतान की कामना के लिए उन्होंने भगवान शिव को तप से प्रसन्न कर जन्म और मृत्यु के बंधन से हीन पुत्र का वरदान मांगा। भगवान शिव श्रीलाद मुनि की कठोर तपस्या से खुश होकर श्रीलाद के पुत्र रूप में प्रकट होने के वरदान दिया। कुछ समय बाद भूमि जोतते वक्त श्रीलाद को एक बालक मिला। जिसका नाम उन्होंने नंदी रखा। अब उसको बड़ा होते देख भगवान शंकर ने मित्र और वरुण नाम के दो मुनि श्रीलाद के आश्रम में भेजे। जिन्होंने नंदी को देखकर भविष्यवाणी की कि नंदी अल्पायु है।

अब जब नंदी को यह मालूम हुआ तो वो महादेव की आराधना से मृत्यु को जीतने के लिए वन में चला गया। वन में उसने शिव का ध्यान आरंभ किया। इसको देख भगवान शिव नंदी के तप से प्रसन्न हुए और वरदान दिया कि वत्स नंदी तुम मृत्यु और भय से मुक्त अजर और अमर है। भगवान शंकर ने उमा की सम्मति से समस्त गणों, गणेश और वेदों के समक्ष गणों के अधिपति के रूप में नंदी का अभिषेक करवाया। इस प्रकार नंदी, नंदेश्वर हो गए। बाद में मरुतों की पुत्री सुयशा के साथ उनका विवाह हुआ। भगवान शंकर ने नंदी को वरदान दिया कि जहां उनका निवास होगा वहां नंदी भी विराजमान होंगे। कहते हैं कि तभी से हर शिव मंदिर में नंदी की स्थापना की जाती है। साथ ही ऐसा कहा जाता है कि अगर अपनी मनोकामना नंदी के कान में कही जाए तो वे उसे भगवान शिव तक जरूर पहुंचाते हैं।

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